पतियों की रक्षा के लिए किया जाता है हरितालिका व्रत

हिमाचल के मेले- त्योहार

यह व्रत पतियों की रक्षा के लिए किया जाता है। इसे लड़कियां भी करती हैं, जिससे उन्हें अच्छा पति प्राप्त हो। इस व्रत के बारे में लोक गाथा इस प्रकार है कि पार्वती ने शिवजी को प्राप्त करने के लिए भक्ति की,  परंतु उसके पिता हिमालय ने विष्णु से उसके विवाह की तैयारियां कर लीं…

हिमाचल के मेले व त्योहार

हरितालिका ः यह त्योहार भादों महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह स्त्रियों का त्योहार है। जिसमें वे शिवजी-पार्वती और पक्षियों की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर, उन्हें सजाकर व रंग चढ़ाकर पूजती हैं। यह व्रत पतियों की रक्षा के लिए किया जाता है। इसे लड़कियां भी करती हैं, जिससे उन्हें अच्छा पति प्राप्त हो। इस व्रत के बारे में लोक गाथा इस प्रकार है कि पार्वती ने शिवजी को प्राप्त करने के लिए भक्ति की,  परंतु उसके पिता हिमालय ने विष्णु से उसके विवाह की तैयारियां कर लीं। पार्वती ने आत्महत्या की योजना बना ली, परंतु उसकी एक सहेली उसे चुपके से एक गुफा में ले गई। पार्वती ने एक नदी के किनारे शिवलिंग बनाकर शिवजी की पूजा की। शिवजी को पार्वती के पास  आकर विवाह की प्रतिज्ञा करनी पड़ी। इतनी देर में उनके पिता हिमालय भी वहां पहुंच गए। उन्होंने शिवजी से उनका विवाह करना मान लिया, क्योंकि इस दिन व्रत और पूजा करने से पार्वती को अपनी इच्छा का पति मिला, इसलिए लड़कियां-स्त्रियां इस व्रत को करती हैं।

निर्जला एकादशी: यह त्योहार ज्येष्ठ महीने की शुक्ल एकादशी को मनाया जाता है, जिसमें एकादशी के सूर्यास्त तक अन्न या जल भी ग्रहण नहीं किया जाता, जो गर्मी के दिनों में बड़ी-कड़ी तपस्या है। यह व्रत ऋषि व्यास ने भीम को बताया था, क्योंकि वह अपने भाइयों और मां की भांति हर एकादशी को व्रत नहीं कर सकता था। निर्जला एकादशी के समय कई स्थानों पर मेले भी लगते हैं।

इसके अतिरिक्त चंदनषष्ठी, इसमें भी व्रत रखे जाते हैं, करवाचौथ, जिसमें भी स्त्रियां अपनी पति की भलाई हेतु व्रत रखती है और पति को करवा यानी घी-शक्कर और अखरोट आदि फल खिलाती है। यह पंचभीष्मी पूर्णिमा आदि अन्य उत्सव हैं। किन्नौर और लाहुल-स्पीति में मनाए जाने वाले अन्य त्योहार हैं-लोसर (नववर्ष) ख्वांगरी, नमगान, छेया एवं गिजा।

भुंडा, शांद, भोज : भुंडा में निर्मंड (कुल्लू) का भुंडा अति प्रसिद्ध है यह नरमेध यज्ञ की तरह नरबलि का उत्सव है। सरकार ने अब इस उत्सव में आदमी का शामिल किया जाना बंद कर दिया और आदमी के स्थान पर बकरा बिठाया जाता है, परंतु 20वीं सदी के आरंभ तक भुंडा में आदमी की बलि दी जाती थी। भुंडा की तिथि आने से तीन महीने पहले, ‘वेदा’ जाति के जिस भी व्यक्ति को इस कार्य के लिए चुना जाता है, वह परिवार के सदस्यों सहित गांव देवता के मंदिर में बुला लिया जाता है और उनका खान-पान मंदिर के खजाने से किया जाता है। उत्सव के लिए इलाके के बाकी लोगों से भी अनाज एवं धन आदि इकट्ठा किया जाता है।                              —क्रमशः

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