पानी तेरी बिगड़ी कहानी

Dec 11th, 2017 12:05 am

हिमाचल की कठिन भौगोलिक परिस्थतियों में हर घर तक साफ पानी पहुंचाना आईपीएच  डिपार्टमेंट के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। फिर भी विभाग अपने काम को अंजाम दे रहा है। हां इतना जरूर है कि प्रदेश में दूषित पानी के मामले भी अकसर सामने आते रहते हैं। दखल के इस अंक में प्रदेश में पेयजल व्यवस्था के हाल  बता  रहे हैं…                                                                                                                                              शकील कुरैशी

पहाड़ी राज्य की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच हर घर तक पानी पहुंचाने की बड़ी चुनौती आईपीएच विभाग के सामने है। इस काम में बेशक विभाग के नाम बड़ी सफलता है मगर अभी भी राज्य की 19 हजार ऐसी बस्तियां हैं, जहां पर लोगों को तय मापदंडों के अनुरूप पानी नहीं मिल पा रहा है। हर साल सरकार बस्तियों में पानी पहुंचाने का टारगेट निर्धारित करती है और नई सरकार के लिए भी ऐसा एक टारगेट खड़ा है, जिसे पूरा किया जाना है। वर्तमान में प्रदेश के लोगों को 8416 पेयजल योजनाएं पानी पिला रही हैं।  लोगों को स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बीआईएस के कोड के मुताबिक आईपीएच को पानी देना पड़ता है लिहाजा सभी योजनाओं में फिल्टरेशन अलग-अलग तरीके से किया जाता है। हालांकि गर्मियों व बरसात के दिनों में राज्य में गंदे पानी से होने वाली बीमारियों के मामले बड़ी संख्या में सामने आते हैं, लेकिन  विभाग का दावा है कि उसके द्वारा दिए जाने वाले पानी में कोई खोट नहीं है। वैसे कई दफा उसके दावे खारिज हो चुके हैं। उसके ये दावे हर साल हवा हो जाते हैं जब कहीं न कहीं से  डायरिया, आंत्रशोथ या पीलिया का कोई मामला सामने आ जाता है। ऐसे में गुणवत्ता युक्त पेयजल हर घर तक उपलब्ध करवाना इस विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती मानी जा सकती है।

8416 पेयजल योजनाएं

1559 योजनाएं निर्माणाधीन

264 ट्यूबवेल

6588 ग्रेविटी स्कीम

30978 हैंडपंप

टेस्टिंग लैब को सुदृढ़ बनाने की जरूरत

हिमाचल में वाटर टेस्टिंग के लिए आईपीएच विभाग ने अपनी लैबों की संख्या को बढ़ाया है। पहले यहां 17 विभागीय लैब थीं, जिनकी संख्या अब 40 हो गई है,लेकिन अभी भी कहीं से गंभीर बीमारियों के मामले सामने आते हैं तो सैंपल टेस्टिंग के लिए चंडीगढ़ भेजे जाते हैं। यहां पर एक निजी लैब के साथ आईपीएच विभाग ने पिछले काफी अरसे से समझौता कर रखा है। राज्य में एक स्टेट लैब की जरूरत है जिसमें सभी तरह के आधुनिक उपकरण हों, ताकि वाटर टेस्टिंग के लिए बाहर न जाना पड़े। इसके साथ जिला मुख्यालयों में मौजूद टेस्टिंग लैब को सुदृढ़ करने की बेहद जरूरत है।

यहां-यहां पर है शुद्धता जांचने की सुविधा

हमीरपुर, भोटा, सुन्हेत, धर्मशाला, शाहपुर, पंचरुखी, थुरल, नूरपुर, इंदौरा, जवाली, बिलासपुर, घुमारवीं, ऊना, गगरेट, टारना, सुंदरनगर, पद्धर, बग्गी, करसोग, सरकाघाट, कटराईं, शमशी, बंजार, आनी, केलांग, काजा,  ढली, ठियोग, रोहडू, अर्की, नालागढ़, कंडाघाट, नाहन, पांवटा, नौहराधार, गलयाणी, सिहुंता, बनीखेत, पूह व रिकांगपिओ। इनमें से कुछ लैब जल्दी ही काम करना शुरू कर देंगी। जिन आईपीएच डिवीजनों के तहत अब तक लैब नहीं हैं, उनमें सलूणी, रामपुर, नेरवा, जुब्बल, सुन्नी के नाम शामिल हैं। इनमें वर्ष 2016 में लैब संचालित करने का लक्ष्य रखा गया है।

विश्व बैंक-ब्रिक्स के प्रोेजेक्ट देंगे राहत

प्रदेश के आईपीएच महकमे के सामने इस समय दो महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट हैं, जो कि विश्व बैंक और ब्रिक्स के माध्यम से सिरे चढ़ाए जाने हैं। एक साल से इन दोनों प्रोजेक्ट में कागजी कार्रवाई ही चल रही है, लिहाजा इनको मंजूरी मिलने में अभी भी समय लगेगा। विश्व बैंक से कोल डैम परियोजना महत्त्वपूर्ण है, जो कि शिमला शहर के लिए बनाई जानी है। इसमें शिमला शहर के सीवरेज सिस्टम को भी जोड़ा गया है  और दोनों के लिए 600 करोड़ से अधिक का प्रोजेक्ट है। इस पर अभी तक डीपीआर बनाए जाने का काम किया जा रहा है और लगातार विश्व बैंक की टीमें यहां का दौरा कर रही हैं।

राजधानी शिमला में आगे कई सालों तक पानी की कमी नहीं रहेगी यदि यहां पर कोल डैम से पानी आएगा। उधर, न्यू डिवेलपमेंट बैंक ब्रिक्स से 3200 करोड़ रुपए के करीब का प्रोजेक्ट है, जिसके पहले चरण को सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है। पहले चरण में 670 करोड़ रुपए की योजना है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ किया जाएगा। इससे पुरानी योजनाओं का संवर्द्धन होगा। वहीं नई योजनाएं तैयार की जाएंगी। अभी तक इस प्रोजेक्ट में भी कागजी कार्रवाई ही चल रही है और अगले साल तक ही इस पर काम शुरू हो सकेगा। ये दोनों प्रोजेक्ट आईपीएच के साथ-साथ नई सरकार के लिए भी चुनौती से कम नहीं हैं।

क्वालिटी कंट्रोल विंग जल्द आएगा एक्शन में

सरकार ने तैयार होने वाली योजनाओं की गुणवत्ता के निर्धारण के लिए अलग से क्वालिटी कंट्रोल विंग स्थापित करने का फैसला लिया है। सरकार द्वारा इसका गठन कर दिया गया है, जो कि अगली सरकार में काम शुरू कर देगा। इसमें विभाग के ही पूर्व अभियंताओं को बतौर क्वालिटी मानिटर रखा जाएगा, जिसके आदेश जल्द ही होने वाले हैं। इससे संबंधित प्रस्ताव विभाग ने सरकार को भेजा है। यह विंग लोक निर्माण विभाग की तरह ही काम करेगा। इस विंग के सामने गुणवत्ता के निर्धारण की चुनौती है, जिसके लिए मापदंडों का निर्धारण किया जा रहा है। इससे विभागीय कार्यों में कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।

पेयजल व्यवस्था और होगी मजबूत

लोगों को सुचारू, बेहतर व मापदंडों के अनुरूप पानी पहुंचाने के लिए विभाग दृढ़ता से काम कर रहा है। यह कहना है विभाग के प्रमुख अभियंता अनिल कुमार बाहरी का। ‘दिव्य हिमाचल’ से बातचीत में उन्होंने कहा कि प्रदेश के लिए कई अहम प्रोजेक्ट तैयार किए गए हैं,जिनकोे सिरे चढ़ाने के लिए डटकर काम किया जा रहा है। विश्व बैंक व ब्रिक्स प्रोजेक्ट से राज्य में पेयजल की व्यवस्था और अधिक सुदृढ़ हो सकेगी, जिसके लिए तेजी के साथ काम हो रहा है। उनका कहना है कि विभाग के सामने जो कमियां पेश आ रही थीं,उनको दूर करने का प्रयास किया गया है, जिससे विभाग को भी फायदा हुआ और सकारात्मक नतीजे मिले हैं। आने वाले समय में 19 हजार बस्तियों तक तय मात्रा में पानी पहुंचाने की अहम चुनौती है, जिसके लिए योजना बनाई गई है। आने वाले सालों में हिमाचल प्रदेश जैसा पहाड़ी राज्य बेहतर पेयजल व्यवस्था के लिए जाना जाएगा यह तय है। उन्होंने बताया कि 43 सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट हैं, जिनकी अपग्रेडेशन के लिए केंद्र सरकार को प्रोजेक्ट भेजा है। इसके मंजूर होते ही यहां पर काम शुरू कर दिया जाएगा। सरकार से जो टारगेट मिले उसे विभाग पूरी तरह से हासिल कर रहा है।

सिंचाई के लिए 338 करोड़ का प्रोजेक्ट

विभाग के माध्यम से प्रदेश में लागू की जा रही प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना भी अहम है। इसमें भी पहले चरण का प्रोजेक्ट मंजूर हो चुका है जिसमें 338 करोड़ से अधिक की राशि प्रदेश को मिली है। अभी जिला स्तर पर इसके तहत बनी योजनाओं के टेंडर किए जाने शेष हैं। इस प्रोेजेक्ट से खेत की नालियां, बेहतर जल संरक्षण, फसलों में विविधिकरण एवं एकीकृत कृषि को बल मिलेगा।

स्वां के अलावा पांच और तटीकरण योजनाएं फंसीं

केंद्र सरकार नहीं दे रही पैसा, आईपीएच विभाग को 14वें वित्त आयोग से भी मायूसी बरसात के दिनों में कहर बरपाती नदियों का तटीकरण बेहद जरूरी है। प्रदेश के लिए यह गंभीर मसला है परंतु केंद्र सरकार इस पर गंभीर नहीं है। यही कारण है कि प्रदेश की तटीकरण योजनाओं के जो प्रोजेक्ट दिल्ली में पड़े हैं, उन पर कोई फैसला नहीं हो रहा है। यहां तक कि यूपीए सरकार में मंजूर स्वां चैनलाइजेशन के काम को भी केंद्र सरकार पैसा नहीं दे रही है।

इससे राज्य के सामने विकट स्थिति बन गई है। हर साल बरसात में ये खड्डें व नदियां लोगों पर कहर बरपाती हैं। जहां फसलों का नुकसान होता है, वहीं सरकारी व निजी संपत्ति भी प्रभावित होती है। स्वां चैनलाइजेशन का काम बंद होने के बाद पांच अन्य तटीकरण योजनाएं भी ठंडे बस्ते में पड़ी हुई हैं जिनको मोदी सरकार ने कुछ नहीं दिया। इनमें तीन योजनाओं को केंद्र सरकार ने अपनी मंजूरी प्रदान नहीं की है । वहीं दो अन्य योजनाओं को मंजूरी के बाद भी पैसा नहीं दिया गया। विधानसभा में भी तटीकरण का ये अहम मुद्दा बार-बार उठता रहा है। सुकेती खड्ड के तटीकरण के लिए हिमाचल ने केंद्र सरकार से 650 करोड़ रुपए की धनराशि मांगी थी, जिसमें सुंदरनगर से लेकर मंडी तक ब्यास नदी का तटीकरण किया जाना था। इसके साथ एक प्रोजेक्ट पल्चान से औट तक का भेजा गया था, जिसकी लागत 1150 करोड़ रुपए की बनाई गई थी। इसी तरह से सीर खड्ड के तटीकरण के लिए एक योजना का प्रारूप 95 करोड़ रुपए का भेजा गया। इन तीनों योजनाओं को केंद्र सरकार ने अपनी मंजूरी प्रदान नहीं की है।

इसके साथ पब्बर नदी के तटीकरण की योजना का मसौदा भेजा गया, जो कि 190 करोड़ रुपए का था। इस पर पूर्व की केंद्रीय सरकार ने मंजूरी भी दे दी थी, लेकिन एनडीए सरकार में इसके लिए भी पैसा नहीं दिया गया। वहीं, छौंछ खड्ड जो कि इंदौरा में है, के लिए 180 करोड़ रुपए मांगे गए थे जिसमें से 22 करोड़ रुपए पूर्व में आए और इससे काम भी शुरू किया गया। परंतु इसके बाद आगे पैसा प्रदान नहीं किया गया है। इससे साफ है कि फ्लड प्रोटेक्शन के लिए केंद्र सरकार हिमाचल को पैसा नहीं देना चाहती है। बताते हैं कि केंद्रीय जल मंत्रालय से इन मामलों को कुछ समय पूर्व ही उठाया गया जिन्होंने 14वें वित्तायोग के माध्यम से दी गई राशि की दुहाई दे डाली है। अब राज्य को 14वें वित्तायोग से जो पैसा मिला है, उसमें से भी यहां आईपीएच विभाग को फ्लड प्रोटेक्शन के लिए पैसा मंजूर नहीं किया गया है। इस कारण से अब ये तटीकरण योजनाएं सपना बन गई हैं और बरसात में इनका कहर बरपाना यूं ही जारी रहेगा।

19 हजार बस्तियों को नहीं मिलता पर्याप्त जल

राज्य में यूं तो विभागीय दावे के अनुसार  सभी बस्तियों तक पानी पहुंचा दिया गया है परंतु अभी भी 19 हजार के करीब ऐसी बस्तियां हैं जिनमें मापदंडों के अनुरूप लोगों को 70 लीटर प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति पानी नहीं मिल पा रहा है। इसी के लिए ब्रिक्स बैंक की योजना बनाई गई है। इसके पहले चरण में चार हजार बस्तियों को पानी पहुंचाने का टारगेट है। राज्य में 53604 बस्तियां मानी जाती हैं, जिनमें से 34 हजार के लगभग  बस्तियों में प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 70 लीटर   पानी पहुंचाया जाता है ये विभागीय दावा है।

सैलानियों को साफ पानी देना चैलेंज

प्रदेश के पर्यटक स्थलों में विभाग की कड़ी मुस्तैदी के बावजूद गंदे पानी से होने वाली बीमारियों के मामले सामने आते रहे हैं। हिल्स क्वीन शिमला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां हर साल अश्वनी खड्ड का पानी लोगों को डायरिया व पीलिया जैसी बीमारियां दे जाता है। इस साल अभी ऐसे मामले सामने नहीं आए हैं, परंतु यह रिकार्ड रहा है कि यहां का पानी काफी गंदा है। ऐसा नहीं है कि इसे विभाग ने फिल्टर नहीं किया है और यहां पर कोई व्यवस्था नहीं है, परंतु खड्ड के पानी में मिलने वाली बाहरी गंदगी से अब तक पार नहीं पाया जा सका है। इसी तरह से कुल्लू और मनाली, धर्मशाला  में भी पूर्व में गंदे पानी से होने वाली बीमारियों के मामले सामने आ चुके हैं। सभी शहरों के साथ आईपीएच विभाग पर्यटक स्थलों के लिए भी एक समान व्यवस्था रखता है। यहां के लिए अलग से कोई प्रयास नहीं किए जाते। वैसे बाहर से आने वाले पर्यटकों को यहां पर वाटर एटीएम से शुद्ध पेयजल मुहैया करवाने की योजना बनाई गई है, लेकिन यह योजना भी अधिक सफल नहीं दिख रही। कई जगहों पर ऐसे वाटर एटीएम लग चुके हैं परंतु उनका इस्तेमाल उतना नहीं हो रहा है। ऐसे स्थान जहां पर बाहर से बड़ी संख्या में लोग आते हैं, वहां के लिए फूलप्रूफ योजना बनाया जाना जरूरी है।

500 से अधिक योजनाओं में  फिल्टरेशन नहीं

विभाग का दावा है कि उसकी सभी योजनाओं से पानी फिल्टरेशन के बाद लोगों को पहुंचाया जाता है लेकिन यह भी सच्चाई है कि 500 से कुछ अधिक योजनाएं बिना फिल्टर की हैं। इस साल विभाग के सामने यही टारगेट था कि इन सभी पेयजल योजनाओं को फिल्टर बेड से जोड़ा जाए, जिस पर 50 फीसदी तक काम पूरा हो चुका है लेकिन अभी भी आधा काम शेष है। इस पर सरकार ने यह भी निर्णय ले रखा है कि जो भी नई योजना बनेगी, वह बिना फिल्टर नहीं होगी।

एक हजार हैंडपंपों का पानी गंदला

इस समय विभाग ने पूरे प्रदेश में 30978 हैंडपंप भी लगाए हैं,जिनसे लोग पानी पी रहे हैं। विभाग के मुताबिक पिछले सालों में एक हजार से अधिक हैंडपंपों का पानी गंदा निकला है, जिन्हें बंद कर दिया गया है। वहीं, इतनी ही संख्या में हैंडपंप खराब भी हो चुके हैं।

विद्युत लागत घटाने पर फोकस

विभाग के सामने बिजली खर्च को कम करने की चुनौती है। इस पर भी काम किया जा रहा है। केंद्र सरकार की एक एजेंसी ईईएसएल इस काम को कर रही है, जिसने प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में सर्वेक्षण चला रखा है।  कंपनी देख रही है कि सौर ऊर्जा के माध्यम से आईपीएच अपने बिजली खर्च को कितना कम कर सकता है। सुंदरनगर व मंडी में सर्वे पूरा हो चुका है,जिसकी रिपोर्ट भी जल्दी ही सामने आ जाएगी। बता दें कि बिजली पर ही आईपीएच हर साल करीब 450 करोड़ रुपए का खर्च करता है। सौर ऊर्जा से उसकी योजनाएं जुड़ें तो उसे व सरकार को फायदा होगा।

16 हजार हेक्टेयर जमीन सींचना टारगेट

विभाग के सामने प्रदेश के 16 हजार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र को वर्ष 2020 तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके लिए केंद्र सरकार की मदद ली जा रही है। केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में 111 स्कीमें मंजूर की हैं। वहीं कूहलों के माध्यम से खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए हिमकैड नामक एक योजना चलाई जा रही है।

शुद्धता मापने को अलग विंग

स्वच्छ पेयजल के लिए विभाग ने अलग से एक विंग का गठन किया है, जिसका जिम्मा है कि वह पानी की स्वच्छता का निर्धारण करे। इस विंग को आधारभूत ढांचा भी मुहैया करवाया गया है, जिसने राज्य में 40 जगहों पर वाटर टेस्टिंग लैब खोल दी हैं। मगर आलम यह है कि इन वाटर टेस्टिंग लैबों में पर्याप्त आधारभूत ढांचे की कमी है, जहां पर न तो स्टाफ ही पूरा है न ही उपकरण।

रोज कितनी सप्लाई, आंकड़ा नहीं

आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश के 56 शहर हैं और इन सभी के लिए एक या दो पेयजल योजनाएं चल रही हैं,जिनसे लोगों को पानी दिया जाता है। इन शहरी क्षेत्रों में गर्मियों के दिनों में पानी की किल्लत महसूस की जा रही है जो हर साल रहती है। इसके अलावा राज्य में 8411 पेयजल योजनाएं हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति को सुनिश्चित बना रही हैं। 1559 पेयजल आपूर्ति योजनाओं पर काम किया जा रहा है जिसके अलावा 264 ट्यूबवेल पानी पहुंचा रहे हैं। वहीं ग्रेविटी की 6588 स्कीमें अलग से हैं, जिनसे गांवों में पानी पहुंचाया जा रहा है। रोजाना कितना पानी विभाग सप्लाई करता है इसका कोई आंकड़ा उसके पास मौजूद नहीं है,क्योंकि सप्लाई रोजाना बदलती रहती है।

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