सेहत को सताता सच

आईजीएससी और टीएमसी सरीखे अस्पतालों वाले हिमाचल में भले ही अब एम्स का सपना सच हो रहा हो, लेकिन खुद स्वास्थ्य सेवाएं वेंटिलेटर पर हैं। इस साल स्क्रब टायफस-स्वाइन फ्लू और डेंगू के कहर ने स्वास्थ्य सेवाओं को आईना दिखाया है। डाक्टर्ज के ही 700 पद खाली हैं। प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं पर एक नजर डाल रही हैं…    प्रतिमा चौहान

हिमाचल प्रदेश में कोई भी सरकार जब सत्ता संभालती है तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपार विकास करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन प्रदेश में सत्ता चाहे किसी की भी रही हो, स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास आज भी नहीं दिखता है। वर्तमान में भी प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों की स्थिति किसी गरीबखाने से कम नहीं। आलम यह है कि आए दिन कोई न कोई मशीन खराब रहती है, जिसके चलते मरीजों को असुविधा का सामना करना पड़ता है। सरकारी अस्पतालों की यह स्थिति यहां पर खत्म नहीं होती, जमीनी स्तर पर देखें तो कई अस्पतालों में शौचालय, सफाई व्यवस्था तक ठीक नहीं है। इसके अलावा प्रदेश के किसी सरकारी अस्पताल में कर्मचारियों से लेकर डाक्टरोें तक के पूरे पद नहीं भरे गए हैं। जिस वजह से पांच लोगों का काम एक ही व्यक्ति के भरोसे होता है। अब इसी से अंदाजा लगाया जा सकता कि जब हिमाचल के सरकारी अस्पतालों की सेहत ही कमजोर होगी, तो लोगों का स्वास्थ्य कैसे ठीक होगा। हर पांच साल बाद बड़े-बड़े दावे के साथ नई सरकार आती है, लेकिन वे दावे आज तक धरातल पर सही साबित नहीं हो पाए हैं। ऐसे में कैसे ठीक होगी हिमाचल की सेहत, यह एक बड़ा सवाल है।

विशेषज्ञों का ब्यौरा

आईजीएमसी

हृदय रोग विशेषज्ञ-7

सीटीवीएस-9

न्यूरोलॉजी-2

यूरोलॉजी-4

न्यूरोसर्जरी-3

प्लासटिक सर्जरी-1

नेफ्रोलॉजी-2

ग्रेस्ट्रोनोलॉजी-3

पिडियाट्रिक्स सर्जरी-1

कार्डिक एनेस्थीसिया-1

टीएमसी

हृदय रोग विशेषज्ञ-2

सीटीवीएस-1

न्यूरोलॉजी-2

नेफ्रोलॉजी-1

न्यूरोसर्जरी-1

हैपेटोलॉजी-1

पल्मनरी मेडिसिन-1, इंडोेक्राइनोेलॉजी  सर्जरी-1

700 डाक्टर 1200 पैरामेडिकल स्टाफ 250 विशेषज्ञों की कमी

हिमाचल प्रदेश में 700 डाक्टर, 1200 पैरामेडिकल स्टाफ व 250 विशेषज्ञों की कमी चल रही है। प्रदेश में अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी का सबसे बड़ा कारण यही है कि हिमाचल में चिकित्सकों के लिए सुविधाएं नहीं हैं। प्रदेश में प्रशिक्षण ले चुके डाक्टर व विशेषज्ञ नौकरी के लिए हिमाचल से बाहर जाते हैं। कारण सिर्फ एक ही माना जा रहा है कि यहां चिकित्सक वेतन से संतुष्ट नहीं होते। उनका कहना है कि पहले वे प्रशिक्षण के लिए लाखों रुपए खर्च करते हैं, लेकिन उन्हें जब नौकरी मिलती है तो सैलरी पैकेज अच्छा नहीं मिलता। यही कारण है कि प्रशिक्षण लेने के बाद यहां से डाक्टर नौकरी के लिए बाहरी राज्यों का रुख करते हैं। वहीं, प्रदेश भर में 1909 मेडिकल आफिसर, चीफ मेडिकल आफिसर 12, मेडिकल कालेजों में 300 स्पेशलिस्ट डाक्टर मौजूदा समय में हैं।

आर्थिक तंगी से बड़े प्रोजेक्ट पर काम नहीं

स्वास्थ्य को लेकर बनाए जाने वाले प्रोजेक्ट हमेशा राजनीति की भेंट चढ़े। आईजीएमसी में अम्रुत योजना, फ्री जेनेरिक स्टोर भी खोले गए, ताकि मरीजों को फ्री व सस्ते में दवाइयां मिल सकें, लेकिन यह योजना भी कुछ समय बाद ठप हो गई। इसके पीछे एक ही कारण है कि प्रदेश सरकार भी अपनी विपक्षी पार्टी के साथ आरोप-प्रत्यारोप के काम में व्यस्त रही। सरकार व स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए जा रहे विकास कार्यों पर दूसरी बार ध्यान नहीं दिया कि ये ठीक चल रहे हैं या नहीं, जिस कारण अस्पताल में ये सुविधाएं अब पूरी तरह से मरीजों को नहीं मिल पाती। प्रदेश सरकार के पास फंड न होने की वजह से प्रदेश में किसी बड़े प्रोजेक्ट पर काम नहीं हो पाया। इसके साथ ही सरकार व विभाग की अनदेखी की वजह से जो प्रोजेक्ट हैं, वे भी सही से नहीं चल पाए।

रिसर्च के नाम पर कुछ नहीं

हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञों द्वारा कोई बड़ी रिसर्च अभी तक नहीं की गई है। हालांकि प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल आईजीएमसी के विशेषज्ञ अपने लेवल पर रिसर्च करते हैं। यहां अस्पताल में विशेषज्ञ  चिकित्सकों द्वारा कैंसर, स्वाइन फ्लू व कई अहम स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर रिसर्च की गई है। हालांकि एमसीआर इन विशेषज्ञों की सहायता रिसर्च में करती है, लेकिन प्रदेश सरकार की ओर से प्रदेश के चिकित्सकों को अनुसंधान के लिए कोई बजट नहीं दिया जाता।

जनता का दर्द

कभी स्टाफ की कमी, कभी मशीन खराब

प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में ज्यादातर चिकित्सकों, पैरामेडिकल स्टाफ व व्यवस्था से यही शिकायतें मिलती हैं कि आज अस्पताल में टेस्ट मशीनें खराब हैं। पैरामेडिकल स्टाफ की तरफ से कई बार मरीजों को यह कहा जाता है कि टेक्निकल खराबी व डाक्टर के न होने से इलाज देरी से होगा, आप कल आना, इस तरह की शिकायतें ज्यादातर मिलती हैं।  इसके अलावा प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मरीज पहले असुविधाओं के कारण परेशान होता है।

पहुंच वालों का पहले इलाज

दूसरी तरफ अस्पताल में तैनात स्टाफ व चिकित्सकों द्वारा मरीजों व उनके तीमारदारों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। अकसर देखने को मिलता है कि कई चिकित्सक व अस्पताल के स्टाफ के सदस्य तीमारदारों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं। अपनी जान-पहचान वालों के इलाज को जल्दी करवाने के चक्कर में गरीब लोगों से लंबा इंतजार करवाते हैं।

महंगी दवाइयां लिखते हैं डाक्टर

ज्यादातर सरकारी अस्पतालों से इस तरह की शिकायतें भी मिलीं कि डाक्टर समय से वार्ड में मरीजों को देखने नहीं आते। प्रदेश में कुछ जगहों पर जब बातचीत की तो लोगों का कहना है कि भले ही चिकित्सक ठीक भी हो, लेकिन कई बार उनके स्टाफ के दुर्व्यवहार व सही से गाइड न करने की वजह से मरीज इलाज से भी वंचित रह जाता है और उसे लंबा इंतजार भी करना पड़ता है। अस्पतालों में इलाज करवा रहे लोगों का यह भी कहना है कि चिकित्सकों द्वारा महंगी दवाइयां मरीजों को लिखी जाती हैं।

नाम के मेडिकल कालेज नहीं मूलभूत सुविधाएं जुटाए सरकार

हिमाचल के 12 जिलों के किसी भी क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों को अगर हम लें तो ऐसा कोई सरकारी अस्पताल नहीं है, जहां यह कहा जा सके कि यहां मरीजों को पूरी सुविधा मिलेगी। सरकार की तरफ से हर बार बजट का हवाला दिया जाता रहा है, लेकिन एक बात यह भी सोचने वाली है कि जब सरकार के पास बजट की कमी है तो वह नए मेडिकल कालेज खोलने की बजाय पुराने कालेजों व स्वास्थ्य संस्थानों में ही सभी सुविधाएं क्यों उपलब्ध नहीं करवाती। आज प्रदेश में पांच नए मेडिकल कालेज हैं, लेकिन वहां पर नाममात्र प्रशिक्षण छात्रों को मिलता है। भारी भरकम फीस देने के बावजूद छात्रों को प्रशिक्षण देने वाला कोई विशेषज्ञ नहीं है। इसके बावजूद मेडिकल कालेजों में मूलभूत सुविधाएं तक नहीं हैं।   प्रैक्टिकल वर्क करने की कोई व्यवस्था नहीं है। प्रदेश के नाहन में खुले मेडिकल कालेज में तो हालत इतनी बदहाल है कि वहां पर तो सुविधा के नाम पर मेडिकल कालेज के साथ मजाक किया गया है। हिमाचल के स्वास्थ्य क्षेत्र बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है कि अस्पताल में सभी सुविधाएं दुरुस्त हों। इसके साथ ही बाहरी प्रदेशों की स्वास्थ्य सेवाओं की तरह हिमाचल में भी नए प्रोजेक्ट बनाएं और स्वास्थ्य के क्षेत्र को सुदृढ़ करें।

निजी स्वास्थ्य क्षेत्रों की स्थिति भी बेहतर नहीं

हिमाचल प्रदेश में कई निजी स्वास्थ्य संस्थान हैं। जैसे कि श्री राम अस्पताल, सेनटोरियम अस्पताल, टेजिन अस्पताल व इसके अलावा कई बड़े अस्पताल हैं। वहां पर सुविधाएं तो उपलब्ध हैं, लेकिन अच्छे डाक्टरों की कमी के चलते इन अस्पतालों में भी स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं। कारण यही है कि हिमाचल से प्रशिक्षण लेने के बाद चिकित्सक बाहरी राज्यों में नौकरी के लिए जाते हैं। इसकी वजह यह है कि प्रदेश में उन्हें अच्छा वेतन नहीं मिल पाता। इसी कारण हिमाचल के निजी अस्पतालों में भी विशेषज्ञ डाक्टरों की कमी होती है। इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाएं भी इतनी हाइटेक नहीं हैं, जितनी बाहरी राज्यों के अस्पतालों में होती हैं।

अब एम्स से लोगों को उम्मीद

हिमाचल प्रदेश में जनता उम्मीद तो कर रही है कि आने वाले कुछ सालों में एम्स खुलने के बाद प्रदेश में स्वास्थ्य सुविधाएं सुदृढ़ होंगी। एम्स के उद्घाटन के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा था कि बिलासपुर में खुले एम्स में दिल्ली-चंडीगढ़ के अस्पतालों में मिलने वाली सुविधाओं की तरह यहां भी ऐसी ही सुविधा उपलब्ध करवाई जाएगी। प्रदेश में निकट भविष्य में एम्स खुलने से अस्पतालों में स्मार्ट सुविधाएं मिलनी शुरू हो जाएंगी। प्रदेश के मरीजों को बाहरी राज्यों में नहीं जाना पड़ेगा। इसके साथ ही इलाज न मिलने के कारण मरने वाले लोगों की संख्या भी कम हो जाएगी। अस्पतालों में टेस्ट की हर मशीन उपलब्ध होगी।

कैंसर अस्पताल में भी नई मशीनें की जाएंगी स्थापित

आईजीएमसी के कैंसर अस्पताल की सुविधाओं को भी सुदृढ़ करने का प्रयास किया जा रहा है।   मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने साइमोलेटर व लीनेक की दो मशीनों को स्थापित करने के लिए कैंसर अस्पताल में फाउंडेशन स्टोन रख दिया है। इन मशीनों को स्थापित करने के लिए कार्य शुरू है। उम्मीद है कि इसकी सुविधा भी मरीजों को जल्द मिलेगी।

ब्लॉक स्तर पर हाईटेक होगी व्यवस्था

स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि प्रदेश जिला व ब्लॉक स्तर पर जितने भी सरकारी अस्पताल व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, वहां सुविधाओं को हाईटेक किया जाएगा। उम्मीद है कि स्वास्थ्य विभाग के ये दावे सही साबित हों।

हर साल तैयार होंगे सैकड़ों डाक्टर

अगर प्रदेश में खोले गए पांच मेडिकल कालेजों में समय रहते सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएं, तो हर साल हर मेडिकल कालेज से प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों के लिए 100-100 डाक्टर मिलेंगे। इससे अस्पतालों में चल रही चिकित्सकों की कमी भी दूर होगी।

राजनीति की भेंट चढ़ीं स्वास्थ्य सेवाएं

प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के लिए भले ही भाजपा व कांग्रेस दोनों ने ही अपनी तरफ से पूरे प्रयास किए हों, लेकिन स्वास्थ्य के क्षेत्र में जो विकास होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। इसका कारण है कि इस बार प्रदेश में कांग्रेस व केंद्र में भाजपा की सरकार थी। इसी वजह से आपसी खींचतान व आरोप-प्रत्यारोप की वजह से न तो स्वास्थ्य को लेकर नए प्रोजेक्ट बने और जो बने उस पर केंद्र की ओर से बजट नहीं मिल पाया, जिस वजह से प्रदेश सरकार ने हमेशा बजट का रोना रोकर स्वास्थ्य के क्षेत्र में ज्यादा विस्तार नहीं किया।

बाहरी राज्यों को रैफर होते हैं मरीज

प्रदेश के सरकारी व निजी अस्पतालों में सुविधाएं न होने की वजह से गंभीर मरीजों को हमेशा पीजीआई या बाहरी राज्यों के अस्पतालों में रैफर किया जाता है। कारण यही है कि प्रदेश में सरकारी हो या प्राइवेट, किसी भी संस्थान में सुविधाएं हाइटेक नहीं हैं, सभी टेस्ट मशीनें अस्पतालों में नहीं हैं, कारणवश गंभीर बीमारियों के कारण मरीज बाहरी राज्यों को रैफर किए जा रहे हैं।

सुपर स्पेशियलिटी की हकीकत

हिमाचल के सबसे बडे़ अस्पताल आईजीएमसी में सुपर स्पेशियलिटी के नाम पर मरीजों को कई सुविधाएं दी जा रही हैं। उनमें से बाईपास सर्जरी, न्यूरो सर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी, पिडियाट्रिक्स सर्जरी की सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावा आईजीएमसी में ही प्रदेश का एक मात्र कैंसर अस्पताल भी है। यहां कैंसर पीडि़त मरीजों की रेडियोथैरेपी व और इलाज फ्री में करवाया जाता है। इसके अलावा टांडा मेडिकल कालेज में भी बाइपास सर्जरी, न्यूरो सर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी व कैंसर पीडि़त मरीजों का इलाज करना शुरू कर दिया है। यहां बहुत जल्द कैंसर पीडि़त मरीजों के लिए दो और मशीनें लगाई गई हैं, जो बहुत जल्द शुरू होने वाली हैं।

आईजीएमसी में बाहर से आता टीचिंग स्टाफ

भले ही आईजीएमसी प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल व मेडिकल कालेज हो, लेकिन हकीकत तो यह है कि यहां भी समस्याओं व कमियों का अंबार है। आईजीएमसी के मेडिकल कालेज में भी लेक्चरर के लिए बाहर से टीचिंग स्टाफ को बुलाया जाता है। इसके साथ कई आवश्यक लैब भी अस्पताल में नहीं हैं, जिससे मेडिकल के छात्र अपना प्रैक्टिकल वर्क ठीक से कर सकें। ऐसा ही हाल टीएमसी का भी है। यहां तो अस्पताल की बिल्डिंग तो बना दी, लेकिन स्वास्थ्य विभाग टीचिंग स्टाफ व इन्फ्रास्ट्रक्चर की सुविधा उपलब्ध नहीं करवा पाया। इसके साथ ही टीएमसी में निश्चित स्टाफ न होने के कारण एमसीआई ने चार विभागों की 12 सीटों पर सवाल उठाए हैं, जिससे विभाग की 12 सीटों की मान्यता पर भी खतरा है।

टीएमसी में स्टाफ कम

टांडा मेडिकल कालेज की बात करें तो यहां भवन तो पूरा है, लेकिन स्टाफ की कमी है। इस कालेज में भी मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने चार विभागों की 12 सीटों पर सवाल उठाए हैं। इससे इन सीटों की मान्यता पर भी सवाल उठ रहे हैं। वहीं नाहन के मेडिकल कालेज में तो दूसरा बैच भी बिठा दिया है, लेकिन वहां पर टीचिंग फैकल्टी अभी तक नहीं है।

आईजीएमसी में ऑनलाइन पर्ची

आईजीएमसी में ऑनलाइन पर्ची सिस्टम भी चलाया गया है, यहां मरीज अपनी पर्ची ऑनलाइन व आईजीएमसी में लगाई क्योस्क मशीन से खुद बना सकते हैं। उन्हें लाइनों में खड़े होने की आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा एक और खास बात यह भी है कि दूरदराज के क्षेत्रों के लोग मोबाइल में पर्ची ऑनलाइन बनाकर अपना टोकन नंबर ऑनलाइन ही ले सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में पांच बड़े स्वास्थ्य संस्थान हैं। इन पांचों संस्थानों में से केवल इंदिरा गांधी मेडिकल कालेज ही ऐसा है,जहां पर और संस्थानों से ज्यादा सुविधाएं मरीजों को मिल रही हैं।

सुपर स्पेशियलिटी में चाहिए थी ये सुविधाएं

हिमाचल प्रदेश में सुपर स्पेशियलिटी के नाम पर सबसे पहले तो सरकारी अस्पतालों में खाली पड़े डाक्टरों, विशेषज्ञ, चिकित्सक, पैरामेडिकल स्टाफ की कमी दूर होनी चाहिए। इसके अलावा अस्पतालों में दिल्ली, चंडीगढ़, पीजीआई एम्स में मिलने वाली सुविधाएं भी यहां मिलनी चाहिए थीं। अस्पतालों में हर वार्ड में मरीजों व उनके तीमारदारों को अलग से ठहरने की सुविधा। अस्पताल में बिना कार्ड से किसी को अंदर आने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। अस्पताल प्रशासन को मरीजों व तीमारदारों के कार्ड बनाने चाहिए थे, इससे अस्पतालों में होने वाली दुर्घटनाओं पर अंकुश लग पाएगा।

टेस्ट मशीनें हों दुरुस्त

प्रदेश के अस्पतालों में सुपर स्पेशियलिटी सुविधाएं होने के लिए आवश्यक है कि अस्पतालों में हमेशा कोई न कोई टेस्ट मशीन खराब होने की समस्या का समाधान होना चाहिए। स्वास्थ्य विभाग व सरकार अस्पतालों में ऐसी मशीनें लगाए जो खराब न हों और मरीजों को हर महीने मशीनें खराब होने की वजह से परेशान न होना पड़े।

सर्जरी की सुविधा भी हो उपलब्ध

प्रदेश के अस्पतालों में सर्जरी से जुड़ा हर इलाज उपलब्ध होना चाहिए। इसके अलावा सरकार को प्रदेश में स्वास्थ्य संबंधित नए प्रोजेक्ट बनाने चाहिए।

स्वाइन फ्लू-स्क्रब टायफस जानलेवा

हिमाचल प्रदेश में सीजनली बीमारियां ही लोगों के लिए जानलेवा बनी हुई हैं। प्रदेश में स्वाइन फ्लू, स्क्रब टायफस व डेंगू बीमारियों की चपेट में लोग आते हैं। हिमाचल प्रदेश के आईजीएमसी में अभी तक डेंगू के 37 मामले आ चुके हैं। हालांकि डेंगू से इस बार किसी की मौत नहीं हुई है, लेकिन स्क्रब टायफस व स्वाइन फ्लू की वजह से इस बार काफी लोगों को जान गंवानी पड़ी। डेंगू के इस साल 461, स्क्रब टायफस के 1361, स्वाइन फ्लू के 92 मामले पॉजिटिव आए। स्क्रब टायफस 31 और स्वाइन फ्लू से 15 मौते हो चुकी हैं। प्रदेश सरकार स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं बना पाई।

चंबा-नाहन-हमीरपुर मेडिकल कालेज में माकूल सुविधाएं नहीं

प्रदेश सरकार ने आईजीएमसी व टांडा मेडिकल कालेज के बाद तीन और नए मेडिकल कालेज खोले थे। मेडिकल कालेज नाहन, हमीरपुर व चंबा में खोले गए, लेकिन सरकार ने नए कालेज तो खोल दिए ढांचा भी तैयार कर दिया, लेकिन वहां मेडिकल के छात्रों को मिलने वाली हर सुविधा से उन्हें वंचित रखा गया। आज नाहन, चंबा, हमीरपुर, तीनों कालेजों की हालत ऐसी है कि वहां न तो टीचिंग स्टाफ है और न ही कक्षाओं में पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर है। यहां तक कि नाहन मेडिकल कालेज में बिना टीचिंग स्टाफ दूसरा बैच बिठाने के मामले पर एमसीआई ने नाहन कालेज को नोटिस भी भेजा था। इस तरह से यही हालत हमीरपुर और चंबा में भी है। भारी भरकम फीस देने के बाद भी वहां मेडिकल के छात्रों को सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। केंद्र सरकार व प्रदेश सरकार की ओर से केवल मेडिकल कालेजों का ढांचा तो खड़ा कर दिया, पर सुविधा के नाम पर कुछ नहीं दिया।

प्रदेश में मिलेगी सुपर स्पेशियलिटी की सुविधा

स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव प्रबोध सक्सेना का कहना है कि अस्पतालों में आए मरीजों व उनके तीमारदारों के लिए सुरक्षा को लेकर कोई विशेष नियम या कानून नहीं बनाया गया है। अगर उनके साथ अस्पतालों में कर्मचारियों व डाक्टरों द्वारा दुर्व्यवहार किया जाता है तो वे स्वास्थ्य विभाग में शिकायत कर सकते है। दुर्व्यवहार करने वाले चिकित्सकों व कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।  प्रधान सचिव प्रबोध सक्सेना का कहना है कि जल्द हिमाचल में भी सुपर स्पेशियलिटी की सुविधा प्रदेशवासियों को मिलेगी। चमियाना में बनने वाले सुपर स्पेशियलिटी के चार ब्लॉक का काम शुरू हो गया है। इन ब्लॉकों के बन जाने से सभी सर्जरी केस हिमाचल में ही सॉल्व होंगे। उनका कहना है कि जल्द प्रदेश में डाक्टरों की कमी को दूर किया जाएगा। प्रदेश में नए तीन मेडिकल कालेज खोले गए हैं। इन मेडिकल कालेजों में सुविधाएं जल्द दिलवाई जाएंगी, ताकि प्रदेश में डाक्टर की कमी दूर हो और हर साल इन कालेजों से हिमाचल को नए प्रशिक्षित डाक्टर मिल सकें। उनका कहना है कि मेडिकल कालेजों में अभी तक विकास क्यों नहीं हुआ यह प्रदेश स्वास्थ्य विभाग नहीं, बल्कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) देखती है।

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