हिमाचली पुरुषार्थ : वैद्य राजकुमार गौतम के पास कैंसर की काट

गौतम जी को 27 वर्षों का लंबा संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान उनकी जिंदगी में भी कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन वे बुलंद इरादों के साथ डटे रहे। 27 वर्षों के कड़े संघर्ष और खोज के बाद उन्होंने वर्ष 1985 में एंटी कैंसर दवा बना डाली, जिसे उन्होंने ‘ब्रह्मस्त्रा रसायन’ का नाम दिया…

वैद्य राजकुमार गौतम का एक साधारण आयुर्वेदिक वैद्य से लेकर कैंसर विशेषज्ञ बनने तक का सफर बेहद चुनौतियों भरा रहा है। बेशक परिवार में दादा, पिता व चाचा सुकेत रियासत में राज वैद्य के तौर कार्य करते रहे हैं, लेकिन उनके द्वारा बताई गई शिक्षा के दम पर विभिन्न बीमारियों के उपचार के लिए आयुर्वेदिक दवाइयों के निर्माण के साथ ही हर प्रकार के कैंसर के  उपचार के लिए स्पेशल दवाई की खोज के पीछे उनकी सफल मेहनत को ही इसका सारा श्रेय दिया जा सकता है। वैद्य राज कुमार गौतम का जन्म 28 जुलाई, 1934 को मंडी जिला के सुंदरनगर और उस समय की सुकेत रियासत में राज वैद्य बिशन दास गौतम के घर हुआ। पूर्वजों से आयुर्वेद में मिली शिक्षा के आधार पर उन्होंने कार्य करना शुरू कर दिया। इसके बाद उनकी शादी चुराग गांव की अहिल्या गौतम के साथ हुई। उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर नहीं थी, बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी और विभिन्न बीमारियों के उपचार के लिए उन्होंने अपनी खोज जारी रखी। वर्ष 1957 में ही उन्होंने एंटी कैंसर हर्ब पर काम करना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्हें करीब 27 वर्षों का लंबा संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान उनकी जिंदगी में भी कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन वे बुलंद इरादों के साथ डटे रहे। 27 वर्षों के कड़े संघर्ष और खोज के बाद उन्होंने वर्ष 1985 में एंटी कैंसर दवा बना डाली, जिसे उन्होंने ‘ब्रह्मस्त्रा रसायन’ का नाम दिया, क्योंकि यह दवाई बड़े ही कारगर तरीके से अपना असर दिखाती है। बेशक इसे वैद्य राज कुमार गौतम की बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। बावजूद इसके उनका सफर यहीं समाप्त नहीं हुआ। इसके बाद भी उनकी खोज का सिलसिला यथावत जारी रहा। आयुर्वेद के जरिए कैंसर की दवाई की इस खोज ड्डको लेकर उन्होंने कई लोगों से बात भी की, लेकिन किसी ने भी इस पर यकीन नहीं किया। इसी दौरान उन्हें एक ऐसे मरीज के बारे में पता चला, जो अपनी लिवर कैंसर की अंतिम स्टेज पर था। उन्होंने उसका उपचार करना शुरू किया और करीब एक वर्ष के लंबे उपचार के बाद वह मरीज पूरी तरह से ठीक हो गया और अपनी जिंदगी के 11 वर्ष और जिया। इसके बाद उन्होंने मुंबई, दिल्ली और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में भी विभिन्न प्रकार के कैंसर से पीडि़त लोगों का उपचार किया। कैंसर जैसी भयानक बीमारी से ग्रसित लोग उपचार से स्वास्थ्य लाभ लेने के बाद उन्हें प्रशंसा पत्र भी प्रदान करते हैं। इसका कारण यह है कि वे अपनी दवाइयों में सबसे उम्दा किस्म का मैटीरियल और हर्ब्स का ही प्रयोग करते हैं ताकि मरीज पर इसका तुरंत और प्रभावी एक्शन हो। वैद्य राज कुमार गौतम कुपीपाक रसायन और महात्रिफला रसायन में मास्टर ब्लास्टर माने जाते हैं। कैंसर के उपचार के लिए उनके द्वारा तैयार ‘ब्रह्मस्त्र रसायन’ को नेशनल हैल्थ पोर्टल ऑफ इंडिया द्वारा संचालिक आयूष द्वारा हर प्रकार के कैंसर के लिए प्रमाणित किया गया है। उनकी इस खोज के बाद ही वर्ष 2010 में राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ द्वारा उन्हें गुरु- शिष्य परंपरा के तहत राष्ट्रीय गुरु के अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। राजकुमार गौतम आयुर्वेद पर अधारित कई सेमिनार और सम्मेलनों में भी शिरकत कर चुके हैं। इसके साथ ही वह आर्थेराइटिस, डाइबिटीज, पाइल्य, पैरालिलिस व खुजली जैसी बीमारियों का उपचार भी करते हैं। ये ऐसी दवाइयां हैं, जो इनसान के भीतर की बीमारी को जड़ से समाप्त करने में सक्षम हैं। आज 83 वर्ष की आयु में भी वैद्य राजकुमार गौतम अपने घर पर ही बनाए रिसर्च सेंटर में दवाइयों की खोज और बीमारियों के उपचार के लिए किए जाने वाले कार्यों में डटे रहते हैं। रामकुमार गौतम द्वारा कैंसर के उपचार के लिए की गई इस खोज को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय द्वारा करीब 9 वर्षों की लंबी अवधि के बाद स्वीकृति मिल पाई है। आयुर्वेद में उनके द्वारा की गई इस खोज को इस पड़ाव तक पहुंचाने के लिए प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत की भी अहम भूमिका रही है। आयुर्वेद के माध्यम से कैंसर के उपचार के लिए की गई इस खोज के बाद अब प्रदेश और देश भर के मरीजों को किसी प्रकार के कैंसर के उपचार संबंधी सुविधा अब यहीं मिल सकेगी। वह बताते हैं कि हालांकि कई जगहों से उन्हें इस विधि को बेचने या फिर इसकी रॉयल्टी देने जैसी बातें करके इसे उन्हें सौंपने के लिए भी कहा गया, लेकिन उन्होंने इसके लिए सिरे से इन प्रस्तावों को नकार दिया। उन्होंने बताया कि अब वह यहीं रहकर लोगों को आयुर्वेद के माध्यम से कैंसर के उपचार की सुविधा प्रदान करेंगे।

-कुलभूषण चब्बा, बिलासपुर

जब रू-ब-रू हुए…

कैंसर रोकने की जड़ी-बूटियां हिमाचल  में उपलब्ध…

कैंसर की दवा बनाने की कहानी है क्या?

आयुर्वेद से असाध्य व जीर्ण बीमारियों का उपचार, जो कि हमारा खानादानी पेशा था, उसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए मुझे लगा कि वर्तमान समय में असाध्य व जीर्ण बीमारियों की शृृंखला में कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जो अभी तक सबके लिए चैलेंज बनी हुई है। इसी कारण ही मैं एक ऐसे आयुर्वेदिक रसायन के बारे में सोचने लगा, जो रसायन गुण के साथ इस बीमारी को समाप्त करने की क्षमता रखे।

कितने लोगों पर प्रयोग किए और अनुसंधान की परिपाटी कैसे बनी?

इस रसायन का प्रयोग हजारों रोगियों पर किया गया है।  प्रयोग करने के दौरान जब यह अपने रसायन गुण के कारण बल, ओज व वीर्य को बढ़ाकर इसके रोग को रोकने में सक्षम पाई गई, तो इस औषधि को सार्वजनिक कल्याण के अन्य रोगियों पर भी उपयोग करने की आवश्यकता महसूस हुई।

कितनी तरह के कैंसर पर आपकी दवाई प्रभावी हो सकती है और इलाज में कितना समय लगेगा?

यह रसायन औषधि होने के कारण सभी प्रकार के कैंसर पर प्रभावी है और रोग के बलानुसार प्रयोग चार महीने से 1 साल तक करने से लाभ प्राप्त होता है।

क्या नाड़ी परीक्षण से कैंसर की स्थिति का पता चल जाता है?

हां, नाड़ी परीक्षण से भी रोगी व रोग के बल का परीक्षण किया जाता है, परंतु यह अनुभव गम्य है।

अमूमन जब रोग ही एलोपैथी परीक्षण से सामने आता है, तो आरंभिक लक्षणों को आप कैसे पकड़ पाएंगे?

आरंभिक लक्षणों को जान पाना अनुभव गम्य है, जिसे अपने चिकित्सीय अनुभव व नाड़ी परीक्षा अनुभव से कर सकते हैं। आयुर्वेद के अनुसार किसी भी व्याधि को उत्पन्न होने के लिए दोषों की अस्वस्थता कारण होती है। इस असमान्यवस्था का परीक्षण करके हम इस व्याधि से जनित पूर्वरूप लक्षणों को चिन्हित कर सकते हैं।

ब्रह्मस्त्रा रसायन किस प्रकार की जड़ी-बूटियों से निकलता और इनमें से कितनी हिमाचल में उपलब्ध हैं?

यह रसायन बाजीकरण, वल्य गुणयुक्त वन्य औषध व रस औषध का मिश्रित रूप है, जिसमें से अधिकांश औषधि हिमाचल में उपलब्ध है।

क्या आपने पेटेंट करवा लिया और क्यों नहीं इसका व्यापारिक प्रयोग कर रहे?

हां, पेटेंट करवा लिया है और व्यापारिक प्रयोग की तैयारी भी की जा रही है।

क्या आप समझते हैं कि आज के युग में आयुर्वेद की रफ्तार सुस्त है?

हां, आज के युग में आयुर्वेद की रफ्तार सुस्त है, जिसका मुख्य कारण अनुसंधान की कमी और आयुर्वेद व उसे जुड़े कर्मठ व मेहनती लोगों को प्रोत्साहन न मिल पाना।

क्या सरकारी आयुर्वेदिक अस्पताल पूरी तरह से इस चिकित्सा पद्धित से न्याय कर रहे हैं?

नहीं, पूर्ण रूप से इस चिकित्सा पद्धति से न्याय नहीं दिखता। शायद इसका कारण संसाधनों की कमी व अपनी चिकित्सा पद्धति को पूण रूप से व्यवहार में न ला पाना है।

आयुर्वेदिक मेडिकल पढ़ाई में कितने संतुष्ट?

मुझे लगता है कि समय के अनुसार उसमें भी बदलाव की आवश्यकता है। आयुर्वेदिक मेडिकल पढ़ाई समाप्त करने के पश्वात युवा आयुर्वेद द्वारा चिकित्सा करने में सक्षम होने चाहिए।

ऐसे कौन से रोग हैं, जिनका निवारण केवल आयुर्वेदिक पद्धति से ही संभव है?

ऐसे बहुत से रोग हैं, जिसके लिए आयुर्वेद अन्य चिकित्सा पद्धति से अधिक सक्षम है। उसमें सभी प्रकार की जीर्ण व्याधि आती हैं। जैसे कि श्वास, कास, प्रमेह, कुष्ठ व ह्ृदयाघात व अन्य व्याधियां।

वर्तमान में जनता का रुझान आयुर्वेद की तरफ लौटा है, परंतु औषधि विक्रय तंत्र ने सारे पैमाने और तरीके बदल कर जिस मात्रा में उत्पादन शुरू किया है, उसे कैसे देखते हैं?

इसमें बदलाव होना बहुत आवश्यक है। इस तरीके से सेल्फ मेडिकेशन बढ़ रही है, जो कि आयुर्वेद नही है। आयुर्वेद में प्रत्येक व्यक्ति के लिए औषधि का निर्धारण उसकी प्रकृति व रोग की शक्ति के अनुसार होता है, जिसके लिए वैद्य का परामर्श आवश्यक है।

हर्बल खेती में हिमाचल जैसे राज्य को क्या करना चाहिए और आयुर्वेदिक औषधियों की दिशा में प्रदेश क्या कर सकता है?

हर्बल खेती में हिमाचल जैसा राज्य बहुत ही प्रभावकारी है। इस दिशा में अधिक से अधिक कार्य करने की आवश्यकता है।

कोई संकल्प जिसे अभी पूरा करना है। बीमारी रहित लंबी आयु कैसे हासिल कर सकते हैं?

आयुर्वेद एक गूढ़ व रहस्यमयी विज्ञान है, जिसे अभी तक बहुत कम जाना गया है। इससे हर प्रकार की बीमारियों का उपचार संभव है,पर यदि समय पर व सही चिकित्सा विधि से उपचार किया जाए। मैं इस आयुर्वेद में अर्जित ज्ञान को मानव कल्याण हेतु देने को संकल्पबद्ध हूं।

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