उत्तरायण : विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार चक्रों में ऊर्जा चढ़ती है

By: Jan 20th, 2018 12:10 am

योगिक परंपरा में यह एक बड़ा महत्त्वपूर्ण पहलू है। अभी फिलहाल हम उत्तरायण के कगार पर हैं, जब पृथ्वी की स्थिति के अनुसार सूर्य की गति दक्षिण से उत्तर की ओर हो जाती है। वैसे देखा जाए, तो सूर्य कहीं नहीं जाता। ब्रह्मांडीय व्यवस्था के संदर्भ में होता यह है कि 22 दिसंबर को होने वाले अयनांत को सूर्य मकर रेखा पर होता है। उस दिन के बाद से अगर आप सूर्योदय और सूर्य की गति पर नजर रखें, तो पाएंगे कि धीरे-धीरे वह उत्तर की ओर जा रहा है। दिसंबर में उत्तरायण की शुरुआत से लेकर जून में दक्षिणायन की शुरुआत तक के इस आधे साल को ज्ञान पद कहा जाता है।

पृथ्वी पर होने वाली हर घटना का असर होता है

मनुष्य पृथ्वी पर होने वाली किसी भी घटना से अछूता नहीं रह सकता। इस ग्रह पर जो कुछ भी घटित होगा, उसका हजार गुना ज्यादा असर मानव तंत्र पर होगा। इसका अनुभव और इस्तेमाल करने के लिए बस आपके भीतर थोड़ी सी संवेदनशीलता और ग्रहणशीलता होनी जरूरी है। कई लोग अनजाने में इस चीज का उपयोग कर रहे हैं, उन्हें यह पता ही नहीं होता कि वे क्या कर रहे हैं। अनजाने में, लोग किसी खास दिन किसी खास तरह का बर्ताव करने लगते हैं। हर इनसान, वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, किसी खास दिन किसी खास समय पर किसी अज्ञात कारण से बहुत अच्छा प्रदर्शन करता है। और फिर वही व्यक्ति किसी अज्ञात कारण से किसी और दिन वैसा प्रदर्शन नहीं कर पाता, जैसा उसने किसी खास मौके पर किया था। इसकी वजह सिर्फ आप ही नहीं है। दरअसल, यह ग्रह और इसके पूरे तंत्र की परिक्रमा आपको प्रभावित करती है।

उत्तरायण और दक्षिणायन में अंतर

पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरायण का समय तृप्ति या पूर्णता का होता है, जबकि दक्षिणायन का समय ग्रहणशीलता का होता है। इस चीज को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि साल के पहले आधे हिस्से यानी जनवरी से जून तक के समय को पौरुष या मर्दाना माना जाता है, जबकि दक्षिणायन के समय को स्त्रैण माना जाता है। पृथ्वी के लक्षण जब पौरुष से बदलकर स्त्रैण हो जाते हैं तो वह समय साधकों के लिए बहुत अच्छा माना जाता है, क्योंकि इस दौरान हम साधना पद में प्रवेश कर जाते हैं, जहां ग्रहणशीलता बहुत अच्छी होती है। इस तरह से हम देखते हैं कि उत्तरायण और दक्षिणायन का मानवीय तंत्र और उसके कार्यों पर खासा प्रभाव पड़ता है। आध्यात्मिक साधक अपनी साधना को उसी दृष्टि से साधते हैं। जब सूर्य उत्तर की ओर होता है तो वे एक तरह की साधना करते हैं और जब सूर्य दक्षिण की ओर होता है तो वे दूसरी तरह की साधना करते हैं। सूर्य के दक्षिण में होने से अनाहत चक्र के नीचे के हिस्से का शुद्धिकरण आसानी से होता है। जब सूर्य उत्तर में होता है तो अनाहत चक्र के ऊपरी हिस्से में बड़ी सरलता से कार्य होता है। अगर आप इन चक्रों को देखें तो इनके दो अलग-अलग आयाम होते हैं। अनाहत के निचले हिस्से में मणिपूरक, स्वाधिष्ठान और मूलाधार केंद्र होते हैं, जो शरीर का संतुलन बनाने के साथ-साथ इसमें स्थिरता भी लाते हैं। यही पृथ्वी का गुण धर्म भी है। ये आपको पृथ्वी की तरफ खींचते हैं। यही इनकी प्रकृति है। आप अपनी जितनी ज्यादा ऊर्जा तीनों चक्रों पर केंद्रित करेंगे, उतना ही आपके गुण-धर्म पृथ्वी की तरह होते जाएंगे और आप उतने ही प्रकृति के अधीन होते जाएंगे। जबकि अनाहत के ऊपर विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार चक्र होते हैं, जो आपको ऊपर की ओर ले जाते हैं। अगर आपकी ऊर्जा इन केंद्रों में प्रबल हो जाती है तो यह आपको पृथ्वी से दूर खींचेगी। यह तीनों केंद्र आपको एक और शक्ति से जोड़ते हैं, जिसे आम तौर पर ग्रेस या कृपा कहा जाता है।

उत्तरायण अंतर्ज्ञान पाने का समय है

उत्तरायण अंर्तर्ज्ञान पाने के लिए है। यह अनंत और परम को पाने का समय है; खास तौर से संपात तक का इसका पहला आधा भाग जो मार्च में आता है। यह वह समय है, जब अधिकतम कृपा उपलब्ध होती है, या कहा जाए तो इस दौरान मानव प्रणाली कृपा पाने के लिए किसी और समय से ज्यादा ग्रहणशील होती है। आध्यात्मिक इतिहास हमें बताता है कि ज्यादातर लोगों ने सूर्य के उत्तरी गोलार्द्ध वाले इस दौर में ही अंतर्ज्ञान पाया। आध्यात्मिक रूप से जाग्रत लोगों ने इस संक्रांति को हमेशा मानव चेतना में खिलने की संभावना के रूप में पहचाना है। उत्तरायण फसल काटने का समय भी होता है और इसी लाभ को देखते हुए खेतों में फसल की कटाई शुरू होती है। पोंगल और संक्रांति फसल-कटाई के पर्व होते हैं। अगर मानवीय शरीर को एक खास स्तर की तीव्रता और संवेदनशीलता तक ले जाया जाए तो वह अपने आप में ब्रह्मांड है। शरीर के बाहर इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी होता है, वह सूक्ष्म रूप से शरीर में प्रकट होता है। हालांकि यह हरेक व्यक्ति के साथ होता है, बस ज्यादातर लोग इसे समझ नहीं पाते। अगर इनसान बाहर होने वाली घटनाओं और गतिविधियों के प्रति जागरूक होकर उसका तालमेल अपने भीतर चल रही गतिविधियों से कर ले तो इस मानवीय तंत्र को और अधिक सुव्यवस्थित बनाया जा सकता है।

-सद्गुरु जग्गी वासुदेव

 

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