कसोल का रसोल पूछे…आखिर मेरा कसूर क्या है

एक छोटी सी पगडंडी के सहारे जिंदगी की ठोकरें खा रहा मणिकर्ण का गांव, आजाद भारत में आजादी की तलाश

कुल्लू— जिला कुल्लू में सड़क सुविधा से कोसों दूर वाले गांवों के लोग आज भी आजादी से पहले वाली जिंदगी जी रहे हैं। इनकी समस्या का हल प्रदेश सरकारें नहीं कर पा रही है। अब नई सरकार से रसोलवासियों को उम्मीद जगी है। सड़क से मीलों दूर यहां न तो मोटर कार पहुंचती है और न ही सरकार की कोई कल्याणकारी योजना। मणिकर्ण घाटी के अति दुर्गम गांव रसोल के बाशिंदों के लिए सड़क कसोल में है और यहां से अगर रसोल गांव पहुंचना हो तो ऊबड़-खाबड़ पगडंडी से करीब तीन घंटे की चढ़ाई बाला सफर तय करने के बाद ही गांव पहुंचा जा सकता है। अगर रोजमर्रा का सामान पहुंचाना पडे़ तो उसे ग्रामीण पीठ पर ढोकर पहुंचाते हैं या फि र रज्जु मार्ग से। रज्जु मार्ग द्वारा सामान गांव तक पहुंचाना काफी मंहगा पड़ रहा है। खाने-पीने का सामान भी यहां के लोगों को मंहगे दामों पर पहुंचाना पड़ रहा है।

गांव की आबादी 1500

गांव की आबादी 1500 है, जिसमें बुजुर्ग, युवा और बच्चे हैं। बुजुर्गों की मानें तो इस बार के चुनावों में राजनेताओं ने उनके गांव को बनाई जाने वाली सड़क का मुद्दा भी नहीं उठाया। ऐसे में ग्रामीणों की सड़क बनाने की उम्मीदें धुंधली होती दिखाई दे रही है।

ठोकरें खाने की आदत हो गई

रसोल निवासी राजू, बलदेव,  शुकरू राम का कहना है कि गांव की पगडंडी की हालत बहुत ही दयनीय है, जिसमें उन्हें कई स्थानों पर हादसे का डर रहता है। रास्ते में छोटे-छोटे पत्थर रोज ठोकरें लगाते हैं। इतना ही नहीं, आठवीं के बाद गांव के बच्चों को सुबह शाम हर रोज घंटो पैदल सफ र कर कसोल पहुंचना पड़ता है, उसके बाद कसोल से बस पड़कर मणिकर्ण पहुंचते हैं।

400 में रेत की बोरी

घर बनाने के लिए 20 से 25 रुपए में मिलने वाली रेत की बोरी गांव तक पहुंचाने के लिए 400 रुपए देने पड़ते हैं। घोड़े और खच्चरों पर ही रोजमर्रा का सामान गांव तक पहुंचाया जाता है।

1300 रुपए में पड़ रहा गैस सिलेंडर

रसोल गांव के लोगों गैस सिलैंडर भी काफी महंगा पड़ता है। कसोल से गांव तक सिलेंडर पहुंचाने के लिए पांच सौ रुपए देने पड़ते हैं, जिसके चलते यह सिलेंडर उन्हें 1300 रुपए में पड़ रहा है।

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