चंबा कितना गरीब …

By: Jan 29th, 2018 12:10 am

आजादी के बाद हर क्षेत्र में हिमाचल तरक्की के डग भरता रहा, लेकिन  रियासतकाल में देश भर में विकास का मॉडल पेश करने वाले चंबा को आजादी के बाद ऐसा ग्रहण लगा कि आज वह देश के कुल 115 पिछड़े जिलों की सूची में 114वें पायदान पर आ टिका। भरपूर प्राकृतिक संसाधनों और विरासत में मिले विकास मॉडल को आखिर चंबा क्यों नहीं सहेज पाया, इन्हीं खामियों को खंगालता इस बार का दखल… 

एक हजार वर्ष पुराने चंबा शहर के माथे से पिछडे़पन का दाग न मिटने की सबसे बड़ी वजह राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव रहा है। रियासतकाल में देश भर में विकास का मॉडल पेश करने वाले चंबा जिला को आजादी के बाद ऐसा ग्रहण लगा कि आज  देश के कुल 115 पिछड़े जिलों की सूची में 114वें पायदान पर आ टिका है। आजादी के बाद विकास किस कद्र प्रभावित हुआ, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिला में रियासतकालीन विकास की गवाह इमारतें भी देखरेख न होने से खंडहर में तबदील होकर रह गई हैं।

चंबा जिला में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को लेकर राजनेताओं के बयान हवा ही साबित हुए हैं। विकास का सूचक कहे जाने वाले हाइड्रो पावर भी जिला के माथे से पिछडे़पन का दाग नहीं मिटा पाए हैं। इन पावर प्रोजेक्टों से सालाना तौर पर मिलने वाली रायल्टी कहां और कैसे खर्च की गई, इसका आज तक सार्वजनिक तौर पर कोई ब्यौरा नहीं मिल पाया है। इन पावर प्रोजेक्टों के निर्माण दौरान विस्थापन का दर्द सहने वाले लोग आज भी हक की लड़ाई को लेकर संघर्षरत हैं। चंबा जिला में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर विकास का एक मॉडल बनाने के राजनेताओं के दावे भी हवा-हवाई साबित हो रहे हैं।

जिला के सैकड़ों ऐसे गांव हैं, जो कि आजादी के बाद आज दिन तक सड़क सुविधा से नहीं जुड़ पाए हैं। सड़कों का जाल न बिछने की सबसे बड़ी वजह वनभूमि है। वनभूमि में काम करने की अनुमति लेने की लंबी सरकारी प्रक्रिया से लोगों का सड़क सुविधा से जुड़ने का सपना साकार नहीं हो पाया है। शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं के भी बेहतर न होने से लोग गुरबत की जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

डलहौजी-खजियार से आगे नहीं बढ़ पाए सैलानी

ब्रिटिशकाल में अंग्रेजी हुकमरानों की सैरगाहें मौजूदा समय में चंबा जिला के विश्व विख्यात पर्यटक स्थल बने हुए हैं। दशकों बाद भी चंबा का पर्यटन डलहौजी और खजियार से बाहर नहीं निकल पाया है। इसके पीछे की सबसे बडी वजह ब्रिटिशकाल के बाद जिला चंबा में कोई भी स्थान पर्यटन की दृष्टि से विकसित ही नहीं हो पाया। अलबत्ता मौजूदा समय में भी चंबा जिला का पर्यटन डलहौजी और खजियार तक सिमट कर रह चुका है,जबकि जिले के शेष अविकसित पर्यटक स्थलों तक इक्का-दुक्का पर्यटक ही पहुंच पाते हैं। मौजूदा समय में जिला चंबा में डलहौजी, खजियार, डैनकुंड, लक्कड़मंडी के अलावा साच पास, चंबा जोत, भरमौर समेत अन्य कई पर्यटक स्थल हैं, लेकिन इन पर्यटक स्थलों पर पर्यटकों को सहूलियतें न मिल पाने के चलते एक बार आकर यहां दोबारा नहीं आना चाहते है। चंबा जिला में नए पर्यटक स्थल विकसित होने को बेकरार बैठे हैं, लेकिन इन स्थलों को निखारने के लिए अभी तक सरकारी तौर पर पहल ही नहीं हो पाई है।

डराती हैं बदहाल सड़कें …

पर्यटक स्थलों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण रोड कनेक्टिविटी न होना है। हालांकि यहां पर सड़कें हैं, लेकिन खस्ताहाल सड़कों को देख पर्यटक भी यहां से मुंह मोड़ लेते हैं। इस स्थिति में वे डलहौजी और खजियार तक ही सीमित रह जाते हैं। सरकार पर्यटन स्थलों को विकसित करने में नाकाम रही।

कभी छह-छह डीसी देने वाला आज खुद पिछड़ा

आज शिक्षा क्षेत्र में पिछडे़पन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी प्रदेश के छह जिलों को डीसी देने वाले चंबा जिला में अब कभी कभार किसी युवा के बडे़ सरकारी ओहदे पर चयनित होने की बात सामने आती है।

कोलकाता के बाद चंबा में जगमगाया बल्ब

चंबा जिला में रियासतकाल में विकास का मॉडल था। एशिया में कोलकाता के बाद वर्ष 1908 में बिजली के बल्ब चंबा में ही जगे थे। चंबा के तत्कालीन शासक भूरि सिंह ने इग्लैंड से मशीनरी मंगवाकर पावर हाउस की स्थापना कर चंबा को रोशन किया था। इसके अलावा रियासतकालीन विकास के ऐसे कई साक्ष्य मौजूद हैं, जिससे बताकर हर जिलावासी खुद पर गर्व महसूस कर सकता है।

आज भी कई गांव चलते हैं पैदल

जिला के तीसा, सलूणी, भरमौर व पांगी उपमंडल के कई ऐसे गांव हैं , जहां सुविधाओं की कमी से लोग जूझ रहे हैं। इन क्षेत्रों में सड़कें न होने से शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधा हासिल करने के लिए लोग कई किलोमीटर का पैदल फासला तय कर रहे हैं। इन गांवों को सुविधाओं से लैस करने को लेकर गंभीरता से प्रयास नहीं हो पा रहे हैं। इन क्षेत्रों में विकास का अलख जगाने को लेकर सरकारी प्रयास घोषणाओं तक सिमटे हुए हैं। जिला के कबायली क्षेत्र पांगी को बारह माह शेष विश्व से जोड़ने के लिए चैहणी सुरंग निर्माण का ड्रीम प्रोजेक्ट भी सिरे नहीं चढ़ पाया। पांगी के  लोगों को जाडे़ के मौसम में आज भी साढ़े सात किलोमीटर का लंबा फासला तय करके चंबा पहुंचना पड़ता है।

प्रदेश के कुल बजट का 9 फीसदी जनजातीय क्षेत्रों को

पहाड़ी राज्य की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए जहां केंद्र सरकार ने हिमाचल को विशेष श्रेणी राज्य का दर्जा दे रखा है। वहीं, प्रदेश को केंद्रीय योजनाओं में 90-10 की सहायता प्रदान की जा रही है। इससे भी अलग राज्य का ट्राइबल हिस्सा है, जिसे न केवल राज्य सरकार अलग से बजट प्रदान करती है बल्कि केंद्र से भी इनके लिए विशेष सहायता दी जाती है।  राज्य का किन्नौर और लाहुल-स्पीति जिला पूरी तरह से जनजातीय घोषित है। इनके साथ चंबा जिला के दूरवर्ती क्षेत्र पांगी व भरमौर को भी जनजातीय का दर्जा मिला हुआ है जहां विशेष ट्राइबल सब प्लान के जरिए वित्तीय सहायता दी जाती है। प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए प्रदेश सरकार अपने योजना बजट से 9 फीसदी हिस्सा रखती है। राज्य की कुल आबादी में से साढ़े 5 फीसदी लोग जनजातीय क्षेत्रों में आते हैं।  प्रदेश सरकार के बजट में जो योजनाएं शामिल की जाती हैं ,वो जनजातीय क्षेत्रों के लिए भी होती है लेकिन कुल बजट का नौ फीसदी बजट इन योजनाओं को अंजाम तक पहुंचाने के लिए खर्च किया जाता है। आंकड़ों की बात करें तो 2016-17 में प्रदेश सरकार ने ट्राइबल सब प्लान के तहत किन्नौर जिला को 68 करोड़ 41 लाख, लाहुल को 35 करोड़ 8 लाख, स्पीति को 33 करोड़ 43 लाख, पांगी को 30 करोड़ 74 लाख तथा भरमौर को 34 करोड़ 55 लाख रुपए की राशि दी गई। कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ही मौजूदा वित्त वर्ष में ट्राइबल सब प्लान के तहत  किन्नौर को 59 करोड़ 5 लाख, लाहुल को 35 करोड़ 43 लाख, स्पीति को 31 करोड़ 49 लाख, पांगी को 33 करोड़ 46 लाख तथा भरमौर को 37 करोड़ 40 लाख रुपए की राशि रखी गई है,जो कि मार्च महीने तक के लिए है।

केंद्र से अलग मिलता है फंड

राज्य के ट्राइबल क्षेत्रों के लिए केंद्र सरकार भी विशेष सहायता प्रदान करती है। इसे स्पेशल सेंट्रल असिस्टेंस कहा जाता है, जो कि यहां आईटीडीपी के हिसाब से दी जाती है। इसके लिए भी राज्य सरकार ही केंद्र से बजट की डिमांड करती है जिसके मुताबिक पैसा दिया जाता है। इससे वहां केंद्र सरकार की योजनाओं पर काम किया जाता है।  वर्ष 2016-17 में किन्नौर को 2 करोड़ 35 लाख, लाहुल को 84 लाख, स्पीति को एक करोड़ 12 लाख, पांगी को एक करोड़ 4 लाख व भरमौर को एक करोड़ 18 लाख की राशि दी गई।   इसमें जानना अहम है कि ये राशि पूरी तरह से केवल ट्राइबल एरिया में ही खर्च की जा सकती है जिससे बाहर इस पैसे को खर्चा नहीं जा सकता।

सीमेंट कारखाना होता तो हालात भी बदलते

रोजगार बढ़ाने में भी नाकाम रहा जिला

देश व प्रदेश के अन्य हिस्सों से चंबा जिला की दूरी को पाटने के लिए सुरंग निर्माण के कंसेप्ट भी राजनीतिक घोषणाओं तक ही सिमट कर रह गए हैं। होली- उतराला, होली-चामुंडा, चैहनी और चुवाड़ी सुरंग निर्माण का मसला आज भी पेंडिंग है। जिला में विकास व युवाओं के लिए रोजगार देने के लिए सिकरीधार में सीमेंट कारखाने की स्थापना अभी तक चुनावी स्टंट बना हुआ है। सुरंगों व सीमेंट कारखाने की स्थापना की बातें अब चुनावी दौर में ही सुनने को मिलती हैं। अगर जिला में सुंरगों के निर्माण व सीमेंट कारखाना स्थापित हो गया होता तो आज विकास के द्वार खुलने से पिछड़ेपन का कलंक चंबा के माथे से स्वयं ही मिठ जाता। देश के 115 पिछडे़ जिलों में शुमार चंबा जिला में आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी विकास का रथ रफ्तार नहीं पकड़ पाया है। जिला के पिछडे़पन को दूर कर विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए सालाना तौर पर करोड़ों रुपए की राशि खर्च करने के बाद भी हालात जस के तस बने हुए हैं। इसकी मुख्य वजह विकास योजनाओं का धरातल पर सही तरीके से क्रियान्वयन न होना माना जा सकता है।

मणिमहेश यात्रा भरती है झोली

हर साल 35 से 40 करोड़ का कारोबार

धार्मिक पर्यटन के लिहाज से चंबा में कई दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन ये स्थल भी पर्यटकों को रिझाने में सरकारी उपेक्षा के चलते नाकाम रहे। उत्तरी भारत की प्रसिद्ध मणिमहेश यात्रा की ही बात करें तो 15 दिनों तक आधिकारिक तौर पर चलने वाला यह धार्मिक आयोजन इस अवधि में करोड़ों का कारोबार करता है। एक चाय की दुकान से लेकर होटल, रेस्तरां, पेट्रेल पंप, ढाबा संचालक, वाहन मालिक और किसान-बागबानों के लिए भी आर्थिक लिहाज से यह यात्रा बेहद महत्त्वपूर्ण रहती है। एक अनुमान के मुताबिक हर वर्ष मणिमहेश यात्रा के दौरान 35 से 40 करोड़ का कारोबार जिला चंबा में होता है। वहीं भरमौर की आर्थिकी को सदृढ़ करने में मणिमहेश यात्रा एक अहम रोल निभा रही है। मणिमहेश यात्रा के दौरान यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अभी तक उच्च स्तरीय सुविधाएं भी कम ही मिल रही हैं।

कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति  ने किया फिसड्डी

पीसी ओबराय वरिष्ठ नागरिक

वरिष्ठ नागरिक पीसी ओबराय का कहना है कि चंबा जिला को पिछडे़पन का तमगा मिलने के पीछे की मुख्य वजह कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति जिम्मेदार है। आजादी से पहले प्रदेश को छह डीसी और एशिया में कोलकाता के बाद बिजली के बल्ब जलाने वाले चंबा जिला को आजादी के बाद ऐसा ग्रहण लगा, जो कि आज तक जारी है। इस अवधि में केंद्र व प्रदेश ने जिला को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की, लेकिन योजनाओं का सही क्रियान्यवन न होने से आज हालात जस के तस बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि पिछड़ा दर्जा मिलना कोई खुशी की बात नहीं बल्कि एक चिंतनीय विषय है।

पिछड़ा नहीं;अविकसित है जिला,मंथन की जरुरत

बीके पराशर वरिष्ठ पत्रकार

वरिष्ठ पत्रकार बीके पराशर का कहना है कि चंबा जिला को पिछड़ा करार देना सही नही हैं। चंबा जिला पिछड़ा नहीं बल्कि अविकसित है। उन्होंने कहा कि जिला में प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नही है। मगर संसाधनों का सही दोहन न होने से विकास की गति रुक सी गई है। बीके पराशर का मानना है कि चंबा का पिछडे़ जिलों में शामिल होना कोई गर्व की बात नहीं है। बल्कि ऐसा क्यों हुआ इस पर राजनेताओं व लोगों को मंथन करना चाहिए।

इतने आईएएस-एचएएस

चंबा की कई विभूतियों ने आईएएस व एचएएस आदि परीक्षाओं को उत्तीर्ण कर प्रतिभा का लोहा मनवाया है। ओंकार शर्मा, जगदीश शर्मा , सुश्री नंदिता गुप्ता,रितेश चौहान, आईपीएस अधिकारी अर्जित सेन ठाकुर, एचएएस अधिकारी एचएस राणा, एचएएस अधिकारी सुनयना शर्मा, एचएएस अधिकारी धर्मेश रमौत्रा आदि अफसर जिला चंबा की ही देन हैं। इसके अलावा देवस्वरूप शर्मा, आशा स्वरूप, बीके चौहान,भीमसेन ठाकुर व स्व. प्रकाश चंद आदि भी आईएएस अधिकारी रहे हैं। वहीं स्वास्थ्य निदेशक डा. विनोद पाठक,व डा.नागेश के साथ न्यूरोसर्जन डा. जनक तथा रिटायर आईजी पीएल ठाकुर भी जिला से हैं।

सालाना 30 करोड़ का सेब

दलहन से करोड़ों कमाते हैं किसान

चंबा जिला में सालाना तौर पर 25 से 30 करोड़ रुपए के सेब का कारोबार किया जाता है। इसके अलावा राजमाह, अखरोट व माह के अलावा मटर व टमाटर आदि का करोड़ों रुपए का कारोबार अलग से होता है। करोड़ों रुपए का यह कारोबार भी अभी तक जिला के बागबानों व किसानों की तकदीर नहीं बदल पाया है।

बिचौलिए कर रहे लूट-खसोट

सेब के उत्पादन में अग्रणी भरमौर, तीसा व सलूणी में सड़कों का कमजोर नेटवर्क, कोल्ड स्टोर की कमी और बेहतर मार्केट उपलब्ध न करवाने से बागबानों को फसल के मन मुनासिब दाम नहीं मिल पाते हैं, जिस कारण बागबानों को बिचौलियों के माध्यम से ही औने- पौने दामों पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है। राजमाह व माह की बंपर पैदावार भी मार्केट की अनुपलब्धता के चलते स्थानीय बाजारों तक ही सिमट कर रह गई है।

मार्केटिंग कमेटी नहीं दे पाई सुविधाएं

मार्केटिंग कमेटी किसानों व बागबानों से शुल्क तो वसूलती हैं, लेकिन उन्हें बाजार की उपलब्धता के साथ अन्य सुविधाएं देने में अभी तक कोई खास प्रयास करती नजर नहीं आ रही हैं। जिला के किसानों व बागबानों के उत्थान हेतु चलाई जा रही योजनाएं धरातल पर लागू न होना भी इसकी एक वजह सामने आई है।

लुप्त होने लगा हस्तकला का हुनर

समृद्ध हस्तकला का प्रतीक चंबा रूमाल, चंबा चप्पल के अलावा चंबा चुख व जरीस को सरकार की ओर से बेहतर मार्केट उपलब्ध नहीं करवाई गई है। इस कारण चंबा रूमाल से जुड़े शिल्पियों को प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है। चंबा के इक्का-दुक्का युवा ही अब इस परंपरागत हस्तशिल्प कला को सीखने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। चंबा चप्पल को भी पहचान दिलवाने को लेकर फिलहाल सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं होते दिख रहे। अगर सरकार की ओर से बेहतर प्रयास होते तो यह समृद्ध हस्तकला व उत्पाद भी आज गुमनामी में न खोकर जिला के पिछडे़पन को दूरकर आर्थिकी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहे होते।

सुरंग के नाम पर छलते रहे नेता

जिला चंबा में 70 और 80 के दशक से पांगी की चैहणी और भरमौर की होली-उतराला सुरंग के निर्माण पर राजनीतिक दलों ने जमकर अपनी सियासी रोटियां सेंकी। जनता की भावनाओं से जुड़ी इन सुरंगों के निर्माण को सियासी रूप देकर इनके जरिए सियासतदानों ने खूब सत्ता सुख भोगा। त्रियूंड-होली और शाहपुर-सिहुंता सुरंग के निर्माण के नाम पर भी राजनीतिक दलों ने यहां जमकर सियासत की, लेकिन प्रदेश के किसी भी दल ने इन सुरंग निर्मार्णों को लेकर इच्छाशक्ति नहीं देखी गई। हर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में जनता की  भावनाओं के साथ खेलते हुए नेताओं ने सुरंगों के नाम पर महज अपना उल्लू ही साधा है। दो दशकों तक होली-उतराला सुरंग के निर्माण की  हलचल प्रदेश की सियासी गलियों में गूंजती रही, लेकिन वर्ष 2012 में प्रदेश में सत्ता परिर्वतन के साथ ही कांग्रेस सरकार ने इस प्रोजेक्ट को ही सिरे से खारिज कर दिया और इसके स्थान पर होली-चामुंडा सुरंग निर्माण करने का लोलीपॉप जनता के हाथ में थमा दिया। जनता की आस भी बंधी, लेकिन सरकार के पांच साल के सरकार के बीच में ही इस निर्माण की उम्मीद भी टूट गई, जब सरकार ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए इस आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं बताया। वहीं,चैहणी सुरंग को लेकर भी हमेशा राजनीति होती रही है। पूर्व सरकार के समय में चैहणी सुरंग निर्माण के सर्वेक्षण हेतु लाखों की राशि मंजूर होने की भी बातें कही गई, लेकिन जमीनी स्तर पर इस पर कोई काम होता नहीं दिखा। इनके अलावा त्रियूंड-होली और सिहुंता-शाहपुर सुरंग निर्माण को लेकर भी महज राजनीति ही हुई है। जिला में एक भी सुरंग का निर्माण न होने के चलते यहां पर स्वरोजगार की जो उम्मीदें लगाई गई थी, वे धरी की धरी रह गईं। चूंकि अगर होली-उतराला या फिर होली चामुंडा सुरंग का निर्माण होता तो, पर्यटन की दृष्टि से यह लाभदायक सिद्ध होती। वहीं, मणिमहेश यात्रा के लिए भी वाया कलाह का रास्ता यात्रियों के लिए एक सुहाना सफर बनता। वहीं, यहां के स्थानीय उत्पादों को उचित व्यापारिक मंच मिलने की भी उम्मीद थी। सुरंग निर्माण पूरे भरमौर क्षेत्र की तस्वीर बदल देता, लेकिन दुखद यही है कि हर मर्तबा इस निर्माण पर नेताओं ने अपना उल्लू ही सीधा किया है।

सूत्रधार : दीपक शर्मा     

सहयोग : शकील कुरैशी

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