शहीदों के शौर्य की ‘धर्मशाला’

पर्यटन, खेल नगरी के साथ अब स्मारकों की नगरी बनी प्रदेश की दूसरी राजधानी

धर्मशाला – प्रदेश की दूसरी राजधानी धर्मशाला अब स्मारकों के शहर के नाम भी जानी जाती है। यहां करीब आधा दर्जन स्मारक और स्मृति वाटिकाएं हैं। विभिन्न स्थानों से लोग शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचते हैं और उनकी वीरगाथाओं को जानते-समझते हैं। शहर के प्रवेश द्वार पर प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड के साथ ही 1977 में बने शहर के पहले शहीद स्मारक के अलावा अब यहां युद्ध संग्रहालय, पुलिस शहीद स्मारक, दुर्गामल दल बहादुर स्मारक, निर्माणाधीन स्वतंत्रता सेनानी स्मारक, कैप्टन राम सिंह समृति वाटिका आदि ऐसे स्थल हैं, जो शहीदों की यादगार हैं। धर्मशाला अब भारत मां की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुती देने वाले वीर सैनिकों के स्मारकों का प्रमुख केंद्र बन गया है। यह स्मारक शहीदों की गाथाओं का बखान ही नहीं करते, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा भी हैं। यहां स्कूली छात्रों से लेकर कई अध्ययन करने वाले शोधार्थी भी पहुंचते हैं, जिन्हें युद्ध व शहीदों के बलिदानों का ज्ञान प्राप्त होता है। शहीद स्मारक में प्रथम परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले शहीद मेजर सोमनाथ शर्मा सहित अभी तक शहीद जवानों के नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किए गए हैं। मेजर दुर्गामल व कैप्टन दल बहादुर समृति वाटिका के अध्यक्ष कर्नल एमएस कारकी कहना है कि स्मारकों के शहर में शहीदों को श्रद्धांजलि देने के बेहतर प्रयास हुए हैं। शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि देने और इस दिशा में हुए कार्य व आम जनमानस के ज्ञान के लिए सरकार से अभी और प्रयासों की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि दाड़ी स्थित मेजर दुर्गामल दल बहादुर स्मृति वाटिका का निर्माण आजाद हिंद फौज के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि है। आजाद हिंद फौज में शामिल मेजर दुर्गामल को ब्रिटिश सेना के विरुद्ध युद्ध में 27 मार्च, 1944 को सेना द्वारा पकडां गया था। इसके बाद कोर्ट मार्शल के बाद उन्हें 25 अगस्त, 1944 को तिहाड़ जेल दिल्ली में फांसी दी गई। आजाद हिंद फौज के ही सिपाही कैप्टन दल बहादुर थापा को ब्रिटिश सेना के विरुद्ध युद्ध में वर्ष 1944 में पकड़ा गया। इन्हें  भी कोर्ट मार्शल के बाद मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी तथा तीन मई, 1945 को दिल्ली में फांसी दी गई।

 

You might also like