( बीरबल शर्मा लेखक, पत्रकार हैं ) पहाड़ी परिस्थिति के विपरीत कंकरीट के जंगल तैयार हो रहे हैं। हमें 1995 में ब्यास नदी द्वारा की गई तबाही को नहीं भूलना चाहिए। बाहंग कस्बे का पुराना दृश्य आज 18 साल बाद भी नहीं लौट पाया है… कुदरत अपना बदला लेती है। कुदरत पर मानवीय जुल्म जब

उत्तराखंड में प्राकृतिक सैलाब तो थम गया। त्रासदी के आंकड़े अब भी जारी हैं। उत्तराखंड सरकार का मानना है कि करीब तीन हजार लोग अब भी लापता हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों का आकलन है कि करीब 11600 लोग लापता हैं। मृतकों की संख्या का आकलन तो छोड़ दीजिए, क्योंकि यह एक लंबी और

( प्रेमचंद माहिल, लरहाना,  हमीरपुर ) मंत्रों का ज्ञान धारण पुण्यदायक है, मंत्रोच्चारण नहीं। पात्र को दिया दान पुण्यदायक है, कुपात्र को नहीं। गायसेवा पुण्यदायक है, गोदान नहीं। सत्यवादिता पुण्यदायक है, सत्यमार्ग से डरना नहीं। झूठे आडंबरों का विरोध पुण्यदायक है, आडंबरों में फंसना नहीं। निर्बल की सहायता करना पुण्यदायक है, बलवान की सहायता नहीं।