सड़क सुरक्षा मायने और व्यवस्था

तीन घंटे में हादसा, हर रोज जा रही तीन जानें हिमाचल सड़क हादसों की भूमि बनता जा रहा है। शायद ही ऐसा कोई दिन होगा, जब राज्य में कोई सड़क हादसा  न हो। प्रदेश में सड़क सुरक्षा और व्यवस्था को दखल के जरिए बता रहे हैं, खुशहाल सिंह…

हिमाचल सड़क हादसों की भूमि  बनता जा रहा है। शायद ही ऐसा कोई दिन होगा जब राज्य में कोई सड़क हादसा न हुआ है। हालात यह है कि अब तो हिमाचल में हर प्रत्येक तीन घंटे में एक सड़क हादसा होने लगा है वहीं औसतन हर रोज नौ सड़क हादसे हो रहे हैं, और हर रोज तीन जानें इन हादसों में जा रही हैं।   हिमाचल में हादसों के आंकड़ों के अनुसार 2017 में प्रदेश में कुल 3114 सड़क हादसे हुए। इस तरह औसतन हर दिन करीब नौ सड़क हादसे हुए, जिनमें औसतन तीन लोगों की जान गईं। आंकड़ों के अनुसार बीते साल बिलासपुर जिले में 193, चंबा में 119, हमीरपुर में 120, कांगड़ा में 523 किन्नौर में 34, कुल्लू में 168, लाहुल- स्पीति में 25, मंडी में 424, शिमला में 480, सिरमौर में 305, सोलन में 252, ऊना में 292, और बद्दी में 178 सड़क हादसे हुए। वहीं, प्रदेश में हुए कुल 3114 सड़क हादसों में 1203 लोगों ने अपनी जान गंवाई, वहीं 5452 लोग घायल हो हो गए। इसी तरह साल 2016 में 3156 सड़क हादसे हुए, जिनमें 1163 लोगों ने अपनी जान गंवाईं और करीब 5587 लोग घायल हुए। इस साल 2018 की शुरूआत भी हादसों से हुई है। इस साल भी हादसों का बढ़ रहा ग्राफ राज्य में इस साल भी हादसों का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। इस साल अब तक राज्य में 725 सड़क हादसे हो चुके हैं।

81 फीसदी पुरुष हो रहे शिकार

आंकड़ों के अनुसार यह बात भी सामने आई है कि हादसे में महिलाओं के मुकाबले पुरुष अधिक शिकार होते हैं। सड़क हादसों में 81 फीसदी पुरुष प्रभावित होते हैं।

दो तिहाई युवा गंवा रहे जान

राज्य में होने वाले हादसों में बेशकीमती जानें जा रही हैं। वहीं सबसे विंडबना यह है कि इन हादसों में युवा वर्ग अपनी जानें खो रहा है । आकंड़ों के मुताबिक राज्य में होने वाले हादसों में मरने वाले कुल लोगों  में दो तिहाई लोगों की आयु चालीस साल से कम रहती है। 19 से 25 साल तक के सबसे ज्यादा करीब 24 फीसदी, 26 से 30 साल के करीब फीसदी और करीब 21 फीसदी 30 से 40 वर्ग आयु के रहते हैं।

इन महीनों में ज्यादा एक्सीडेंट

महीने के हिसाब से ये दुर्घटनाएं छुट्टियों के महीने मई से अगस्त होती हैं, जो गर्मियों की छुट्टियों के महीने होते हैं। वहीं,अक्तूबर व नवंबर जब दीपावली की छुट्टियां होती हैं, तब भी अधिक सड़क दुर्घटनाएं होती हैं।

वीकेंड-होली-डे पर झपटता है काल

राज्य में 108 एंबुलेंस सेवा को आधार बना कर प्रदेश में होने वाले सड़क हादसों का जीवीके ने एक सर्वे किया है। यह सर्वे बीते 2010 से लेकर 2017 तक का है। इसमें यह बात सामने आई है कि सड़क दुर्घटनाएं सप्ताह के आखिर में, अवकाश और छुट्टियों में अपने चरम पर होती हैं। ये हादसे न केवल प्रदेश के लोगों द्वारा की गई यात्राओं से बल्कि इस दौरान पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी से भी होते हैं,  दिन और घंटों के हिसाब से किए गए विश्लेषण के आधार पर पाया गया कि सड़क दुर्घटनाएं सबसे ज्यादा सप्ताह के अंत में और शाम के समय 2 से 9 बजे के बीच में होती हैं।

दो तिहाई से अधिक छोटे वाहन हो रहे शिकार

राज्य में होने वाले दो तिहाई से भी अधिक हादसों के शिकार छोटे वाहन होते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो  राज्य में मौजूदा समय में पंजीकृत वाहनों की तादाद करीब 14 लाख के करीब पहुंच रही है। हर साल करीब सवा लाख वाहन हिमाचल में पंजीकृत किए जा रहे हैं। जाहिर है कि वाहनों की संख्या का सीधा असर हादसों पर भी पड़ने लगा है।  यदि बसों के हादसों को देखा जाए तो राज्य में निजी बसों के हादसे सरकारी बसों की तुलना में बहुत ज्यादा हैं। इसकी वजह निजी बसों में यात्रियों के लिए प्रतिस्पर्धा और कम अनुभव के चालकों का होना प्रमुख है।

यातायात नियमों का जमकर हो रहा उल्लंघन

हिमाचल में यातायात नियमों का जमकर उल्लंघन हो रहा है। राज्य में खराब सड़कों पर ओवर लोडिंग और चालकों द्वारा शराब पीकर व मोबाइल सुनते हुए वाहन चलाना, तेज गति से वाहन चलाना व बिना हेलमेट के दोपहिया वाहन चलाना ऐसी वजह है, जो हादसों को दावत दे रही हैं। इसके लिए जरुरी है कि ट्रैफिक नियमों का सख्ती से पालन करवाया जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।

स्कूली बच्चों की सुरक्षा के लिए उठाए कदम

हिमाचल में स्कूली बच्चों की सड़क हादसों से सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा उभरकर सामने आया है। हाल ही में नूरपुर हादसे के बाद सरकार स्कूल परिवहन को सुधार रही है। सरकार ने फैसला किया है कि निजी व सरकारी स्कूलों के लिए परिवहन के तौर पर प्रयोग होने वाली बसें व टैक्सियां पांच साल से पुरानी नहीं होंगी। सभी वाहनों में सीसीटीवी कैमरे लगाने होंगे। नए निर्देशों के अनुसार जीपीएस को बाद में मोबाइल ऐप से जोड़ा जाएगा। इस ऐप को राज्य सरकार का परिवहन विभाग तैयार करेगा। इसी जीपीएस से ओवरस्पीड स्कूल बस या स्कूल टैक्सी का संदेश लोकल पुलिस स्टेशन को खुद-ब-खुद चला जाएगा। । वहीं स्कूल वाहनों को कोई भी उम्रदराज चालक नहीं चलाएगा। स्कूल बस या टैक्सी चालक के पास हैवी व्हीकल चलाने का कम से कम 5 साल का अनुभव होना चाहिए।

तुरंत उपचार की सुविधा नहीं

हिमाचल में हादसों में हर साल करीब एक हजार लोग मौत के शिकार हो जाते हैं,वहीं करीब पांच हजार लोग घायल हो रहे है। हादसों में मौतों की वजह जहां अधिक चोटें लगना रहता है वहीं एक बड़ी वजह तुरंत उपचार की सुविधा न मिलना है। हाल ही में नूरपुर में हुए स्कूली बस के दर्दनाक हादसे में भी यही खामी उभर कर सामने आई थी। हालात यह थे कि बस हादसे में घायलों को प्रदेश से बाहर पंजाब के पठानकोट ले जाना पड़ा था। हिमाचल की भौगोलिक स्थिति बेहद जटिल है और ऐसे में यहां न केवल हादसों की संभावना ज्यादा रहती है बल्कि हादसों में घायलों को समय पर उपाचार न मिलने से ये हादसे भयंकर रूप धारण करते हैं। हालांकि हिमाचल में 108 एंबुलेंस सेवा इस तरह के हादसों के वक्त काम आती है, लेकिन एंबुलेंसों की संख्या बहुत कम है और कई बार ये समय पर नहीं मिल पातीं। ऐसे में कुछ प्रमुख जगहों को छोडकर ये बाकी जगहों पर पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हो पाती।

पुख्ता नहीं पैट्रोलिंग की व्यवस्था 

हिमाचल में भी राजमार्गों पर न केवल आपराधिक वारदातें बल्कि हादसे भी बढ़ने लगे हैं। इसकी एक वजह इन  राजमार्गों पर पैट्रोलिंग की पुख्ता व्यवस्था नहीं है। ऐसे में सड़कें भी अब पहले की तरह सुरक्षित नहीं रह गईं। राजमार्गों पर स्पेशल पुलिस पैट्रोलिंग वैनों की तैनाती कर न केवल संभवित अपराधों को रोका जा सकता है बल्कि, इससे सड़क दुर्घटनाओं को भी कम किया जा सकता है। पुलिस अधिकारी भी मानते हैं कि राजमार्गों पर समय के साथ-साथ अब रेगुलर पैट्रोलिंग की ज्यादा जरूरत है। अधिकारियों की मानें तो इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं इसके लिए जरूरी उपकरणों की भी खरीद की जा रही है।

गाडि़यों की स्पीड लिमिट होगी निर्धारित

हादसों पर लगाम लगाने के लिए अब राज्य की सभी सड़कों पर गाडि़यों की स्पीड लिमिट निर्धारित होगी।  सड़कों पर से निर्धारित गति से ज्यादा वाहन नहीं चला सकेंगे। रोड सेफ्टी को लेकर हाल ही में हुई मुख्य सचिव विनित चौधरी की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह फैसला लिया गया।  लोक निर्माण विभाग रोड़ इंजीनियरिंग के मुताबिक विभिन्न सड़कों की स्पीड लिमिट का डाटा तैयार कर इनको संबधित जिलों के जिलाधीशों को मुहैया करवाएगा। इसके बाद जिलाधीशों द्वारा अपने जिलों में इन सड़कों पर वाहनों की गति को निर्धारित करने संबंधी अधिसूचना जारी कर दी जाएगी।  ुलिस प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि इन सड़कों पर निर्धारित गति से ज्यादा वाहन न चल पाएं। अभी तक राज्य में इस तरह के कोई निर्देश जारी नहीं किए गए हैं। अभी तक शहरों की सड़कों पर ही स्पीड लिमिट निर्धारित की गई है, जबकि ग्रामीण व जिला सड़कों पर इस तरह का प्रावधान नहीं है। लेकिन अब सभी सड़कों की स्पीड लिमिट  निर्धारित की जाएगी। इससे तेज रफ्तार से होने वाले हादसों पर रोक लग सकेगी। वहीं सड़कों पर अधिक से अधिक संकेत बोर्ड लगाने के बारे में भी फैसला लिया गया, ताकि चालक स्तर्क हो जाएं। इससे हादसों को रोकने में मदद मिलेगी। वहीं सड़कों पर बने ब्लैक स्पॉट और हादसे संभावित सड़कों  को जल्द से जल्द सुधारने पर भी बल दिया गया।

खून के प्यासे ब्लैक स्पॉट

हिमाचल में सड़कों पर ब्लैक स्पॉट हादसों की एक बड़ी वजह है। इन जगहों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। हालांकि हर साल हादसा संभावित क्षेत्रों की पहचान की जाती लेकिन इनको सुधारने की ओर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा। हादसे के वक्त इन स्पॉट की याद आती है और बाद में फिर वही हालात बन जाते हैं। जीवीके के सर्वे में पाया गया है कि राज्य में 713 ऐसे स्थान है,ं जहां पर  दुर्घटनाओं की प्रवृत्ति रही है और 255 ऐसे स्थान जहां बार-बार सड़क हादसे होते हैं। वहीं प्रदेश भर में 45 ऐसे स्थान हैं, जहां पर बहुत ज्यादा दुर्घटनाएं होती हैं। ऐसे मे इनको सुधारने की जरूरत है। इन जगहों पर क्रैश बैरियर लगाने और सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने और तीखे मोड़ों को सुधारने जैसे कदम उठाने चाहिए लेकिन इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।

चालकों को ट्रेंड करने की जरूरत

यह भी देखने में कई बार आया है कि लाइसेंस देने में भी धांधलियां होती हैं। राज्य में लाइसेंस दिलवाने वाले एजेंट भी बढ़ रहे हैं। यह भी देखने में आया है कि अधिकतर निजी बसों और टैक्सी चालकों के पास वैलिड लाइसेंस नहीं होता और ये चालक मौत के सफर पर निकल जाते हैं। ऐसे में जहां चालकों के पुख्ता प्रशिक्षण की जरूरत है वहीं सडकों को सुधारना भी जरूरी है। इसके लिए जरूरी है कि सड़कों के किनारों पर संकेतों वाले बोर्ड, रात के समय दुर्घटना से बचाने के लिए सड़कों के दोनों ओर रिफ्लेक्टर लगवाने जैसे कदम उठाए जाने जरूरी है।

दिव्य हिमाचलः पहाड़ी सड़कों पर सुरक्षा के मायने क्या हैं?

मरड़ी : पर्वतीय सड़कें मैदानी इलाकों से अलग होती हैं और ऐसे में यहां हिल ड्राइविंग की जरूरत रहती है। वहीं यहां स्पीड भी लिमिट में होनी चाहिए।

दिव्य हिमाचलः सड़क हादसों के संबंध में कोई अनुसंधान व सिफारिशें और इस प्रकार की रिपोर्टों का क्या हुआ?

मरड़ी : हिमाचल में सड़क हादसों को रोकने के लिए रोड एक्सीडेंट डाटा मैनेजमेंट सिस्टम (आरएडीएमएस) लागू किया गया है।  हादसों का पूरा ब्यौरा तैयार किया जा रहा है और इसके आधार पर सड़कों के ब्लैक स्पॉट दुरुस्त करने और क्रैश बैरियर लगाने जैसे कदम उठाने का मामला लोक निर्माण विभाग के समक्ष उठाया जा रहा है। इसके आधार पर सभी पुलिस अधीक्षकों को ड्रंकन ड्राइविंग को चैक करने के लिए विशेष अभियान चलाने को कहा गया है।

दिव्य हिमाचलः सड़क दुर्घनटनाओं को रोकने के लिए पैट्रोलिंग के क्या इंतजाम है?

मरड़ी: पुलिस द्वारा नेशनल हाई-वे पर बाइकों से पैट्रोलिंग की जा रही है। इसको और सुदृढ़ करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

दिव्य हिमाचलः वाहनों की गति व स्थिति क्या कायदे से परखी जा रही है?

मरड़ी : तेज रफ्तार और लापरवाही से वाहन चलाने वालों पर रोक लगाने के लिए ऐसे वाहन चालकों पर  कार्रवाई की जा रही है। इसके लिए ई-चालान की भी व्यवस्था की जाएगी ताकि बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वालों पर और भी कड़ी कार्रवाई की जाए। विभाग द्वारा एल्कोसेंसर और डाप्लरों की खरीद की जा रही है।

दिव्य हिमाचलः नाबालिगों को ड्राइविंग से रोकने के लिए क्या लाइसेंसों की मुस्तैदी से जांच हो रही है?

मरड़ी : राज्य में बिना लाइसेंस के कोई भी वाहन न चलाए, इसके लिए इनकी जांच करने के निर्देश अधिकारियों को दिए गए हैं। ऐसा करने वालों पर कार्रवाई की जा रही है।

दिव्य हिमाचलः  वाहन चलाते वक्त मोबाइल के इस्तेमाल को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे है?

मरड़ी : पुलिस द्वारा ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई की जा रही है। शराब पीकर वाहन चलाने वालों के लाइसेंस रद्द हों, इसके लिए पुलिस कर्मियों को कानूनी कार्रवाई अमल में लाने को कहा गया है।

दिव्य हिमाचलः प्रदेश में सुरक्षित परिवहन के लिए विभागीय तालमेल की स्थिति कैसी है?

मरड़ी : सड़क हादसों को रोकने के लिए पीडब्लयूडी और परिवहन विभाग के साथ तालमेल बनाकर कदम उठाए जा रहे हैं। स्कूली बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार के निर्देशों के अलावा सुप्रीम कोर्ट और सीबीआईएसएई द्वारा तय मापदडों का पालन सुनिश्चत करवाया जा रहा है।

एसआर मरड़ी (डीजीपी)

हिमाचल में शुरू नहीं हो पा रहे ट्रॉमा सेंटर

हिमाचल की भौगोलिक स्थिति के चलते यहां होने वाले हादसे गंभीर किस्म के होते हैं, जिनके लिए ट्रॉमा सेंटर खोलकर विशेष उपचार की सुविधा दी जाने की जरूरत है, लेकिन अभी भी राज्य में आधुनिक सुविधा से युक्त ट्रॉमा सेंटर शुरू नहीं हो पाए हैं। राज्य में करीब एक दशक से ट्रामा सेंटर खोलने की योजना चल रही है, लेकिन अभी तक ये मूर्त रूप नहीं ले सके हैं। हालात यह है कि प्रदेश के दो बड़े मेडिकल संस्थानों टीएमसी और आईजीएमसी में भी अभी ये सेंटर शुरू नहीं हो पाए हैं। हिमाचल में कहीं जमीन की कमी तो कहीं धन की कमी इनको खोलने में बड़ी बाधा बनी हुई है। वहीं राज्य में हादसों की रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही है और ट्रॉमा सेंटर न होने से इन घायल होने वाले लोगों को सही उपचार वक्त पर नहीं मिल पा रहा।

सुविधाओं का अभाव हादसों को दावत

हिमाचल में जहां वाहनों की तादाद लगातार बढ़ रही है,वहीं अधोसंचरना और सुविधाओं का अभाव हादसों की संभावना बढ़ा रहा है। राज्य में पंजीकृत वाहनों की तादाद करीब 14 लाख तक पहुंच रही है। वहीं हर साल करीब पौने दो करोड़ के करीब सैलानी पहुंचे हैं और इनके साथ करीब 80 लाख वाहन भी आते हिमाचल आ रहे हैं। ऐसे में हिमाचल की सड़़कों पर वाहनों का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। वहीं,हिमाचल की सड़कें कमोबेश वहीं की वहीं हैं। यानी यहां सडक़ें तो बना दी गई हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश को चौड़ा नहीं किया गया। वहीं,यहां पार्किंग की सुविधा न होने से इन सड़कों पर वाहनों को पार्क किया जाता है। वहीं सड़कों पर ट्रैफिक लाइटों का अभाव है। कई जगह बाजारों में चौक बदहाल बने हुए हैं। ऊपर से कई बार दोपहिया वाहनों को तेज रफ्तार से दौड़ाते हैं। इससे वाहनों के हादसों की संभावना बनी रहती है।

सर्पीली सड़कें लापरवाही जान की दुश्मन

हिमाचल में सड़क हादसों की कई वजह है। राज्य में होने वाले हादसों पर अगर गौर किया जाए तो अधिकांश हादसों के पीछे मानवीय लापरवाही है। हिमाचल की सड़कें घुमावदार हैं और इन पर वाहन चलाने के लिए विशेष अनुभव की जरुरत रहती है, जो कि कई चालकों के पास नहीं रहता। हिमाचल की इन सड़कों पर अनुभवहीन चालकों द्वारा तीव्र गति से वाहन दौड़ाए जाते हैं जो कि हादसों की एक बड़ी वजह बन रहा है। हिमाचल की सर्पीली सड़कों पर वाहनों की गति को नियंत्रित रखना जरूरी होता है, लेकिन अकसर नियमों की अनदेखी सामने आती है।

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