कृपाल चंद और भीमचंद ने आपस में किया मेल- मिलाप

भीम चंद ने गुरु जी का आह्वान किया और दोनों की सेना नादौन में अलीफ खां की सेना पर टूट पड़ी। अलीफ खां की सेना रात को भाग खड़ी हुई और मैदान गोबिंद सिंह तथा राजा भीम चंद के हाथ आया। यह युद्ध सन् 1687 ई. में नादौन में हुआ। कांगड़ा के राजा कृपाल चंद ने भी भीम चंद के साथ मेल- मिलाप कर दिया…

इसके पश्चात गुरु गोबिंद सिंह वापस आनंदपुर लौट आए। अब राजा भीम चंद के व्यवहार में भी परिवर्तन आ गया था। उधर, गुरु गोबिंद सिंह ने भी इन पहाड़ी राजाओं के साथ मिलकर रहने में भला ही समझा। मुगलों का भय दोनों के लिए था। एक के लिए जबरदस्ती कर वसूली का और दूसरे के लिए औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता का। औरंगजेब कुछ समय से दक्षिण भारत में था। इस दौरान जम्मू के सूबेदार मियां खां ने अपने एक सैनिक अधिकारी अलीफ खां को कांगड़ा तथा अन्य पहाड़ी राजाओं से राज कर वसूल करने के लिए भेजा। सबसे पहले कांगड़ा के एक राजा कृपाल चंद के पास गया और उससे कहा कि वह राज कर दे दे अन्यथा उसे लड़ाई लड़कर इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा। कृपाल चंद ने उत्तर दिया कि यदि कहलूर का राजा भीम  चंद भी उसे कर देगा तो वह तथा अन्य पहाड़ी राजा भी उसे कर देंगे। अलीफ खां ने भीम चंद के पास कर अदा करने के लिए संदेश भेजा। भीम चंद ने कहला भेजा कि वह कर नहीं देगा, बल्कि अपनी रक्षा करने तो तैयार है। राजा ने अपने वजीर तथा अन्य अधिकारियों से विचार-विमर्श किया। वजीर ने सलाह दी कि अलीफ खां से निपटने के लिए गुरु गोबिंद सिंह की सहायता ली जाए। इस पर राजा ने अपने वजीर को गुरु के पास भेजा। गुरु गोबिंद सिंह ने सोच-विचार के बाद राजा की बात मान ली और राजा को संदेश भेजा कि वह अलीफ खां को किसी प्रकार का कर न दे और दूसरे ही दिन सहायता देने का वचन दिया। भीम चंद ने गुरु जी का आह्वान किया और दोनों की सेना नादौन में अलीफ खां की सेना पर टूट पड़ी। अलीफ खां की सेना रात को भाग खड़ी हुई और मैदान गोबिंद सिंह तथा राजा भीम चंद के हाथ आया।

यह युद्ध सन् 1687 ई. में नादौन में हुआ। कांगड़ा के राजा कृपाल चंद ने भी भीम चंद के साथ मेल मिलाप कर दिया। इससे गुरु को भी प्रसन्नता हुई। एक अन्य विवरण के अनुसार सन् 1682 में गुरु गोबिंद सिंह बिलासपुर में थे तथा उनके और राजा भीम चंद के बीच मतभेद पैदा हो गए तथा लड़ाई में भीम चंद की हार हुई। सन् 1685 में भीम चंद ने गुलेर, कांगड़ा तथा अन्य राज्यों के साथ मिलकर सिखों पर आक्रमण किया, लेकिन हार का मुंह देखना पड़ा था। सन् 1700 में पुनः भीम चंद और सिखों में समस्याएं पनप गईं, जिसके कारण भीम चंद व कांगड़ा के राजा आलम चंद ने पुनः सिख सेना पर आक्रमण किया, लेकिन इस बार हार और भी नुकसानदेह थी। स्वर्गीय राजा दीप चंद की दो विधवा रानियां थीं। एक मंडी से थी, जिसका नाम जलाल देवी था। वह राजा भीम चंद की मां थी। दूसरी कुल्लू से थी। उसका नाम कुनकम देवी था। उसके एक पुत्री थी। किसी अधिकारी ने किसी झूठे स्वार्थ से यह झूठी बात फैला दी कि मंडयाली रानी कुल्लवी रानी का विवाह अपने भाई राजा मंडी से करवाना चाहती है और राजा ने इसकी अनुमति दे दी है।कुल्लवी रानी यह नहीं चाहती थी।

अपने सपनों के जीवनसंगी को ढूँढिये भारत  मैट्रिमोनी पर – निःशुल्क  रजिस्ट्रेशन!

You might also like