जहरीला होता भू – जल

बिना फिल्टर चलने वाली 500 परियोजनाएं और मटमैला पानी उगलने वाले एक हजार हैंडपंप… हिमाचल में  पानी की यही कहानी है। इसे और भयावह वे उन्नीस हजार बस्तियां बनाती हैं, जहां लोगों को पता ही नहीं कि वे दूषित जल पी रहे हैं या स्वच्छ। रही-सही कसर फलों-सब्जियों में धड़ाधड़ प्रयोग हो रहे कीटनाशक पूरी कर रहे हैं। हालांकि कहने को 40 वाटर टेस्टिंग लैब्स हैं, लेकिन आधारभूत ढांचे की कमी के चलते नतीजा सिफर।  जहरीले हो रहे भू-जल की स्थिति को दखल के जरिए पेश कर रहे हैं , शकील कुरैशी।  सहयोग

:नरेन कुमार

भू-जल का अभी तक सर्वे नहीं करवा पाया विभाग

जमीन में घुल रहे फसलों-फलों व सब्जियों में प्रयोग हो रहे कीटनाशक

भू-जलस्तर पर भी खतरा मंडरा रहा है। अभी तक इसके अनुपात को लेकर विभाग गंभीरता दिखाता है और कई एजेंसियां यही मापती हैं कि भू-जल स्तर कितना रह गया है। इसमें कितनी बढ़ोतरी हुई है या कितनी गिरावट हुई, यह आकलन नहीं किया जा रहा कि खेती में इस्तेमाल होने वाली दवाओं व दूसरे प्रदूषित पदार्थों से भू-जल पर क्या दुष्प्रभाव पड़ रहा है। सोचने की बात यह है कि फसलों के लिए लोग बड़ी संख्या में दवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह जरूरी भी है, लेकिन इसका नुकसान जमीन के नीचे मिलने वाले पानी पर भी हो रहा है। कहीं न कहीं उस पानी में ये दवाएं मिल रही हैं और बाद में लोग हैंडपंपों या बावडि़यों के माध्यम से उस पानी को पी रहे हैं। यह भी स्वास्थ्य को खराब कर रहा है। अत्यधिक दवाओं के इस्तेमाल को रोकने के लिए लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। मैदानी क्षेत्रों में सब्जियों के उत्पादन में दवाओं का इस्तेमाल हो रहा है,वहीं ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बेमौसमी सब्जियों के साथ सेब बागबानी पर दवाएं इस्तेमाल हो रही हैं। जीरो बजट खेती का एक कंसेप्ट सरकार के ध्यान में है,जो यदि सफल होता है तो आने वाले समय में फसलों पर दवाओं का उतना छिड़काव नहीं करना पड़ेगा और लोग पारंपरिक खेती की ओर मुड़ सकते हैं।

500 परियोजनाओं का पानी फिल्टर ही नहीं

विभाग का दावा है कि उसकी सभी योजनाओं से पानी फिल्टरेशन के बाद लोगों को पहुंचाया जाता है लेकिन ये भी सच्चाई है कि 500 से कुछ अधिक योजनाएं बिना फिल्टर की है। इस साल विभाग के सामने यही टारगेट था कि इन सभी पेयजल योजनाओं को फिल्टरबेड से जोड़ा जाए,  जिस पर 50 फीसदी तक काम पूरा हो चुका है, लेकिन अभी भी आधा काम शेष है। इसपर सरकार ने यह भी निर्णय ले रखा है कि जो भी नई योजना बनेगी वह बिना फिल्टर नहीं होगी। इस समय विभाग ने पूरे प्रदेश में 37 हजार के करीब हैंडपंप भी लगाए हैं। विभाग के मुताबिक पिछले सालों में एक हजार से अधिक हैंडपंपों का पानी गंदा निकला है, जिन्हें बंद कर दिया गया है, वहीं इतनी ही संख्या में हैंडपंप खराब भी हो चुके हैं।

512 स्कीम का पानी गंदला

आईपीएच विभाग ने पेयजल योजनाओं में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर एक रिपोर्ट बनाई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की 8416 योजनाओं में से 512 को खराब बताया गया है, जिनसे लोगों को गंदला पानी पीने को मिल रहा है। विभाग का मानना है कि बरसात के दिनों में ये योजनाएं इस तरह का पानी देती हैं। इनके वर्षों पुराने ट्रीटमेंट प्लांटों को नए सिरे से स्थापित करने के लिए सरकार ने  आदेश दिए हैं, जिस पर आईपीएच विभाग ने काम शुरू कर दिया है।

जलजनित रोगों से ग्रामीण अनजान विभाग नहीं कर पाया जागरूक

प्रदेश में जलजनित बीमारियों को लेकर विशेष सर्वेक्षण नहीं किया गया है। स्वास्थ्य विभाग  आईपीएच विभाग के साथ मिलकर टीमों का गठन करता है। अस्पताल में जहां से भी ऐसे मामले सामने आते हैं,वहां विभाग की संयुक्त  टीम पानी की जांच को पहुंचती है।  विभिन्न जिलों में हर वर्ष इस बीमारी की चपेट में हजारों लोग आ रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग केवल जिला स्तर की कमेटियों तक ही सीमित रहा है,जहां रैपिड टीम है, वह केवल उसी समय ही रवाना की जाती है जब बीमारी फैल जाती है। हिमाचल पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां के लोग अधिकतर बावडि़यों और नदी-नालों का पानी पीते हैं। यह पानी कितना सुरक्षित और कितना हानिकारक है,इस बारे में हिमाचल की जनता को अभी तक जानकारी देने के लिए स्वास्थ्य विभाग कोई कदम नहीं उठा सका है। यहां आम जनता को यह पता नहीं कि पानी में कौन-कौन से तत्त्व होने चाहिएं और कौन से नहीं। यही नहीं विभाग के आला अधिकारियों को छोड़ दें तो दूसरों को भी इसकी कोई जानकारी नहीं है। इसके लिए विभाग में आंतरिक प्रशिक्षण की भी जरूरत जताई जा रही है। हालांकि इस साल धर्मशाला को छोड़कर अभी तक कहीं से भी दूषित पानी से बीमारी की शिकायत नहीं आई है, लेकिन गर्मियों में अकसर ऐसे मामले सामने आते हैं।

* राजधानी में अश्विनी खड्ड के पानी से हर साल गर्मियों में फैलता रहा है पीलिया

* नवंबर २०१5 में शिमला में पीलिया ने सैकड़ों को लिया चपेट में

* बिलासपुर के सटे क्षेत्रों में 2013 में आंत्रशोथ ने मचाया था कहर

* नगरोटा सूरियां में २०१७ में डायरिया ने कइयों को पहुंचाया था अस्पताल

* 2018 में अब तक धर्मशाला में डायरिया ने सैकड़ों लोगों को किया बीमार

वाटर टेस्टिंग लैब को सुदृढ़ करने की जरूरत

हिमाचल में वाटर टेस्टिंग के लिए आईपीएच विभाग ने अपनी लैबों की संख्या को बढ़ाया है। पहले यहां 17 विभागीय लैब थीं, जिनकी संख्या अब 40 हो गई हैं,लेकिन अभी भी कहीं से गंभीर बीमारियों के मामले सामने आते हैं तो टेस्टिंग के लिए चंडीगढ़ भेजे जाते हैं। यहां पर एक निजी लैब के साथ आईपीएच विभाग ने पिछले काफी अरसे से समझौता कर रखा है। राज्य में एक स्टेट लैब की जरूरत है, जिसमें सभी तरह के आधुनिक उपकरण हों, ताकि वाटर टेस्टिंग के लिए बाहर ना जाना पड़े। इसके साथ जिला मुख्यालयों में मौजूद टेस्टिंग लैब को सुदृढ़ करने की बेहद जरूरत है।

यहां पर हैं टेस्टिंग लैब

हमीरपुर, भोटा, सुन्हेत, धर्मशाला, शाहपुर, पंचरुखी, थुरल, नूरपुर, इंदौरा, जवाली, बिलासपुर, घुमारवीं, ऊना, गगरेट, टारना, सुंदरनगर, पद्धर, बग्गी, करसोग, सरकाघाट, कटराईं, शमशी, बंजार, आनी, केलांग, काजा,  ढली, ठियोग, रोहडू, अर्की, नालागढ़, कंडाघाट, नाहन, पांवटा, नौहराधार, गलयाणी, सिहुंता, बनीखेत, पूह व रिकांगपिओ। इनमें से कुछ लैब जल्दी ही काम करना शुरू कर देंगी। जिन आईपीएच डिवीजनों के तहत अब तक लैब नहीं हैं, उनमें सलूणी, रामपुर, नेरवा, जुब्बल, सुन्नी के नाम शामिल हैं।

योजनाओं की गुणवत्ता को क्वालिटी कंट्रोल विंग

सरकार ने तैयार होने वाली योजनाओं की गुणवत्ता के निर्धारण के लिए अलग से क्वालिटी कंट्रोल विंग स्थापित करने का फैसला लिया है। इसमें विभाग के ही पूर्व अभियंताओं को बतौर क्वालिटी मॉनिटर रखा जाएगा, जिसके आदेश जल्द ही होने वाले हैं। इससे संबंधित प्रस्ताव विभाग ने सरकार को भेजा है। ये विंग लोक निर्माण विभाग की तरह ही काम करेगा। इस विंग के सामने गुणवत्ता के निर्धारण की चुनौती है जिसके लिए मापदंडों का निर्धारण किया जा रहा है। इससे विभागीय कार्यों में कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, यह आने वाला समय बताएगा।

हर दिन  70 लीटर  पानी देना बड़ा चैलेंज

8416 पेयजल योजनाएं पिला रहीं हिमाचल को पानी

19 हजार बस्तियों में पर्याप्त आपूर्ति पहुंचाने का टारगेट

पहाड़ी राज्य की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बीच हर घर तक पानी पहुंचाने की बड़ी चुनौती आईपीएच विभाग के सामने है। इस काम में बेशक विभाग के नाम बड़ी सफलता है मगर अभी भी राज्य की 19 हजार ऐसी बस्तियां हैं, जहां पर लोगों को तय मापदंडों के अनुरूप पानी नहीं मिल पा रहा है।

इस पर गुणवत्ता युक्त पानी देने की चुनौती सबसे बड़ी है और ये चुनौती वर्तमान जयराम सरकार के सामने भी है। हर दिन प्रतिव्यक्ति  70 लीटर पानी देना भी विभाग के लिए बड़ी चुनौती है। सरकार ने लोगों को गुणवत्ता युक्त पानी देने के लिए अपनी शुरुआत में ही सफाई अभियान चलाया। प्रदेश भर में पेयजल टैंकों की सफाई का काम चला और ये दोबारा गंदे न हों, इसके लिए सभी भंडारण टैंकों को ढककर उनमें तालाबंदी की गई है। इसके बाद भी गर्मियों के दिनों में जलजनित रोग पनपते हैं,जिनकी रोकथाम उतने प्रभावशाली तरीके से नहीं हो पाती। वर्तमान में हरेक जगहों पर पानी के सैंपल लेने का काम किया जाता है।

इनकी सैंपलिंग के लिए पंचायतों को भी जिम्मा दिया है। विभाग ने तो इस काम को निष्ठा से कर रहा है, परंतु दूसरी शक्तियां उतना ध्यान नहीं दे रहीं। आलम यह है कि कई कुछ करने के बाद भी गुणवत्तायुक्त पानी लोगों को मिल रहा है, यह कहना मुश्किल है। वर्तमान में प्रदेश के लोगों को 8416 पेयजल योजनाएं पानी पिला रही हैं।  लोगों को स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बीआईएस के कोड के मुताबिक आईपीएच को पानी देना पड़ता है, लिहाजा सभी योजनाओं में फिल्टरेशन अलग-अलग तरीके से किया जाता है। हालांकि गर्मियों व बरसात के दिनों में राज्य में गंदे पानी से होने वाली बीमारियों के मामले बड़ी संख्या में सामने आते हैं, लेकिन विभाग का दावा है कि उसके द्वारा दिए जाने वाले पानी में कोई खोट नहीं है।

वैसे कई दफा उसके दावे खारिज हो चुके हैं। उसके ये दावे हर साल हवा हो जाते हैं,जब कहीं न कहीं से  डायरिया, आंत्रशोथ या पीलिया का कोई मामला सामने आ जाता है। ऐसे में गुणवत्ता युक्त पेयजल हर घर तक उपलब्ध करवाना इस विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती मानी जा सकती है।

इसके अलावा राज्य में 8411 पेयजल योजनाएं हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति को सुनिश्चित बना रही हैं। 1559 पेयजल आपूर्ति योजनाओं पर काम किया जा रहा है,जिसके अलावा 264 टूयबवेल पानी पहुंचा रहे हैं। वहीं ग्रेविटी की 6588 स्कीमें अलग से हैं, जिनसे गांवों में पानी पहुंचाया जा रहा है।

शहरों में हो रही पानी की किल्लत

आजकल शहरी क्षेत्रों में पानी की कमी अधिक देखी जा सकती है क्योंकि यहां शहरी क्षेत्रों में आबादी लगातार बढ़ रही है और पेयजल योजनाएं सालों पुरानी हैं। इन सालों पुरानी योजनाओं का संवर्द्धन करने के लिए सरकार गंभीरता नहीं दिखा रही है। जिन शहरों की पांच हजार की आबादी के लिए पेयजल योजना बनी थी वहां पर 25 हजार से ज्यादा लोग हैं।

एक ये भी बड़ा कारण है कि शिमला शहर को आज कोल डैम परियोजना की जरूरत है। शिमला के लिए तीन पुरानी योजनाएं हैं जिनमें से एक बंद हो चुकी है। लाखों की संख्या में यहां पर पर्यटक आते हैं और इस सीजन में यहां लोगों को तीसरे व चौथे दिन ही पानी मिल पा रहा है।

आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश के 56 शहर हैं और इन सभी के लिए एक या दो पेयजल योजनाएं चल रही हैं, जिनसे लोगों को पानी दिया जाता है। इन शहरी क्षेत्रों में गर्मियों के दिनों में पानी की किल्लत महसूस की जा रही है,जो हर साल रहती है।

विभाग ने बनाया अलग विंग

स्वच्छ पेयजल के लिए विभाग ने अलग से एक विंग का गठन किया है, जिसका जिम्मा है कि वह पानी की स्वच्छता का निर्धारण करे। इस विंग को आधारभूत ढांचा भी मुहैया करवाया गया है, जिसने राज्य में 40 जगहों पर वाटर टेस्टिंग लैब खोल दी हैं। मगर आलम ये है कि इन वाटर टेस्टिंग लैबों में पर्याप्त आधारभूत ढांचे की कमी है, जहां पर न तो स्टाफ पूरा है न ही उपकरण। बहरहाल आधारभूत ढांचे की कमी के चलते लोगों को दिक्कतें हो रही हैं।

गुणवत्ता में  सुधार की जरूरत

हिमाचल प्रदेश नॉर्थ जोन केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के अनुसार जिला कांगड़ा में भू-जल का स्तर ठीक है, लेकिन वाटर रिचार्ज के संबंध में जिस ढंग से लापरवाही बरती जा रही है, उसको देखते हुए आने वाले समय में भू-जल का संकट पैदा हो सकता है। इसके अलावा भू-जल की गुणवत्ता को बरकरार रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि प्राकृतिक जल स्रोतों के खराब होने से भू-जल में भी कई तत्त्व घुसकर उसे दूषित कर सकते हैं। जिला कांगड़ा में भू-जल पर केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के 46 हाइड्रोग्राम स्टेशन निगरानी रख रहे हैं। ये सभी स्टेशन कुओं में स्थापित हैं। यानी कुओं के मौजूदा जल का ही विश्लेषण किया जा रहा है। कुओं की रिपोर्ट के आधार पर हिमाचल प्रदेश में भूजल रिपोर्ट बिलकुल ठीक है। वहीं,राज्य में अभी तक यहां हैंडपंप व ट्यूबवेल से भू-जल को नहीं देखा जा रहा है। हालांकि किसी-किसी क्षेत्र में भू-जल के जल में लाल पानी और खारापन देखने को मिलता है, लेकिन शुद्धता में अब तक अधिकतर पानी को खरा ही आंका जा रहा है। कांगड़ा में भू-जल को लेकर सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य विभाग व केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के बीच विरोधाभास है।

अब चार साल बाद होता है आकलन

केंद्रीय भू-जल बोर्ड ने अब रिसर्च में भी बड़ा फेरबदल किया है। इसके तहत अब दो नहीं चार वर्ष बाद हिमाचल में भूजल का आंकलन किया जा रहा है। पानी की गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर जांच की जा रही है, जिसे पीने योग्य शुद्ध पाया गया है। वहीं इसमें सिंचाई व पेयजल योजनाओं के अलावा औद्योगिक क्षेत्रों में लगे ट्यूबवेल से उद्योगों के लिए कितना पानी निकाला गया है, यह भी शामिल किया गया है। इसी रिपोर्ट के आधार पर यह भी पता चलेगा कि कौन से क्षेत्र में भू-जल की मात्रा का इस्तेमाल अधिक हो रहा है। यही नहीं, राज्य भूमि जल प्राधिकरण वहां नए ट्यबवेल लगाने पर रोक लगाने का भी फैसला करेगा। अभी तक प्रदेश में काला अंब वैली ऐसी है, जहां पहले ही नए ट्यूबवेल लगाने पर प्रतिबंध लगा हुआ है।

* हिमाचल प्रदेश व जिला कांगड़ा में भू-जल की स्थिति ठीक है। भू-जल के स्रोतों में पानी की शुद्धता भी कायम है, लेकिन उसे बनाए रखने के लिए प्राकृकि स्त्रोतों को दूषित होने से बचाना होगा, साथ ही क्षेत्र में कुओं आदि को भी साफ रखना जरूरी है

एनपीएस नेगी 

क्षेत्रीय निदेशक; केंद्रीय भू-जल बोर्ड ,धर्मशाला

अपना सही जीवनसंगी चुनिए| केवल भारत मैट्रिमोनी पर-  निःशुल्क  रजिस्ट्रेशन!

 

You might also like