बिजली प्रोजेक्टों ने सुखाए नदी- नाले

प्रदेश में धड़ाधड़ हाइडल प्रोजेक्ट स्थापित किए जा रहे हैं, जिसके चलते नदी-नालों सहित कूहलें भी सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं। परियोजना प्रबंधन तय नियमों के अनुसार पानी डिस्चार्ज नहीं करते, लिहाजा कृषि पर भी इसका विपरीत असर पड़ने लगा है। बिजली प्रोजेक्टों की वजह से पैदा हो रहे जल संकट पर प्रकाश डाल रहे हैं….

शकील कुरैशी व विपिन शर्मा

पहाड़ की नदियों व नालों पर संकट के बादल हैं। यह संकट आज से नहीं बल्कि   लंबे समय से चल रहा है, जो कि रुकने का नाम नहीं ले रहा। लगातार यह संकट बढ़ रहा है, जिसके परिणाम भी सामने आने लगे हैं। प्रदेश में अवैज्ञानिक खनन और बिजली परियोजनाओं का लगातार हो रहा निर्माण एक बड़ा कारण है कि आज राज्य की नदियां, नहरें, खड्डें और कूहलें संकट में पड़ चुके हैं। प्राकृतिक कारण भी इसमें शामिल हैं, परंतु उनको मानव ही जन्म दे रहा है लिहाजा मानवीय संकट से नदियां, नाले तहस-नहस होने लगे हैं। इसका आभास सरकार को भी है, जिसके महकमों ने कई तरह के नियम बनाकर  ऐसे कार्यों पर रोक लगाने की कोशिश की है, जिससे नदियों-नालों का अस्तित्व कायम रहे परंतु ये नियम लागू नहीं होते। आज भी नदियों व नालों के किनारे निर्माण हो रहा है। खड्डों पर अवैज्ञानिक खनन का काम लगातार जारी है, जिसने प्रकृति को भी अपने विरुद्ध कर दिया है। प्रदेश की पांच बड़ी नदियां रावी, चिनाब, सतलुज, ब्यास और यमुना हैं। ये नदियां एवं छोटे-छोटे नाले बारह मासी हैं। इनके स्रोत बर्फ से ढकी पहाडि़यों में स्थित हैं। हिमाचल प्रदेश में बहने वाली पांच नदियों में से चार का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है।

ब्यास 

कुल्लू, मंडी, हमीरपुर और कांगड़ा में बहती है। मनाली, कुल्लू, बजौरा, औट, पंडोह, मंडी, सुजानपुर टीहरा, नादौन और देहरा गोपीपुर इसके प्रमुख तटीय स्थान हैं।  ब्यास नदी पर कई बिजली परियोजनाओं का निर्माण हो रहा है। कुछ बड़े प्रोजेक्ट यहां पर लग चुके हैं।  यही कारण है कि आज ब्यास नदी व इसकी सहायक खड्डें भी मानवीय संकट से दो-चार हो रही हैं। कुल्लू में पतलीकूहल, पार्वती, पिन, मलाणा-नाला, हुरला, सोलंग, लूणी, सुकेती और सैंज इसकी सहायक नदियां व खड्डे हैं।  इसकी मंडी में ऊहल, लूणी, सुकेती, तीर्थन, हंसा और रमा सहायक नदियां है।  कांगड़ा में, सहायक नदियां बिनवा,न्यूगल, बाणगंगा बनेर, गज और चक्की हैं। हमीरपुर में कुणाह खड्ड और मान खड्ड ब्यास से मिलती हैं।  पंडोह में बांध बनाया गया है। देहरा गोपीपुर के पास पौंग बांध बनाया है।

चिनाब

नदी  पानी के आयतन के हिसाब से यह सबसे बड़ी नदी है।  इस नदी पर भी बड़ी संख्या में पावर प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं। हालांकि अभी इन पर काम नहीं चला है, लेकिन आने वाले समय में इस नदी पर भी कई तरह के खतरे मंडराएंगे, यह तय है। प्रदेश की इन सभी नदियों के साथ बड़ी संख्या में खड्डें व नाले जुड़ते हैं और इन सभी पर मानवीय खतरा मंडरा रहा है। लोग नदियों व खड्डों के किनारे निर्माण कार्यों में लगे हैं। हर साल बरसात में उनको नुकसान भी पहुंचता है, बावजूद इसके उफनती नदियों व खड्डों के किनारे बसने से लोग बाज नहीं आ रहे। इनको सहेजने के लिए सरकार ने कई तरह के कैचमेंट एरिया डिवेलपमेंट प्लान बना रखे हैं , लेकिन सही तरह से उन पर अमल नहीं होता।

यमुना

नदी हिमाचल सिरमौर में पांवटा से होते हुए गुजरती है। यमुना नदी काफी गहरी है, यह उथले गहराई की है। यमुना नदी पर भी बिजली प्रोजेक्ट प्रस्तावित है। यहां रेणुका बांध और किशाऊ बांध का निर्माण प्रस्तावित है, जिसके साथ खनन का काम भी लगातार चलता है। बाहर से आने वाले लोग भी यहां से खनन सामग्री ले जाते हैं।

सतलुज

नदी का उद्गम मानसरोवर के निकट राक्षस ताल से है। इस पर कितनी अधिक खड्डे हैं इसका कोई आकलन नहीं। भाखड़ा में सतलुज पर बांध बनाया गया है। बांध के पीछे एक विशाल जलाशय का निर्माण किया गया है, जो गोबिंद सागर जलाशय कहलाता है। भाखड़ा नंगल परियोजना से पनबिजली का उत्पादन होता है, जिसकी आपूर्ति पंजाब और आसपास के राज्यों को की जाती है। इस नदी पर एशिया का सबसे बड़ा बिजली प्रोजेक्ट नाथपा झाकड़ी है। वहीं कड़छम वांगतू, रामपुर परियोजना, भावा समेत कई बिजली परियोजनाएं इस पर प्रस्तावित हैं।

रावी

राज्य में दूसरी नदी है। रावी नदी भादल’ और ‘तांतागिरि’ दो खड्डों से मिलकर बनती है। ये खड्डें बर्फ पिघलने से बनती हैं लेकिन जिस तरह से ग्लेशियर कम मात्रा में बन रहे हैं और पहाड़ों पर बर्फ ही नहीं पड़ रही तो इस नदी का पानी भी कम होता जा रहा है। इसकी सहायक नदियां  व नाले तृण दैहण, बलजैडी, स्यूल, साहो, चिडाचंद, छतराड़ी और बैरा हैं। रावी नदी पर भी बड़ी संख्या में बिजली परियोजनाएं बन रही हैं और अभी कई प्रोजेक्ट कतार में हैं। इनके निर्माण के चलते बेशक ऊर्जा का दोहन तो होगा, लेकिन इस नदी पर अवैज्ञानिक निर्माण भारी पड़ सकता है।

नियम नहीं मानते प्रोजेक्ट

हिमाचल में बिजली का दोहन सरकार का मुख्य लक्ष्य है परंतु इसके साथ नदियों व नालों को बचाए रखना भी जरूरी है, जिसके लिए बनाए गए नियमों की कोई परवाह नहीं करता, जो कंपनी एक दफा पावर प्रोजेक्ट लगाती है, वह कितने नियमों को पूरा कर रही है इसकी कोई पड़ताल नहीं करता। छोटी-छोटी कई घटनाएं हो चुकी हैं, बावजूद इसके कोई सबक नहीं ले रहा।

15 फीसदी पानी छोड़ना जरुरी

बिजली परियोजनाओं के लिए नियम है कि उन्हें 15 फीसदी पानी हर समय छोड़ना है,लेकिन इस पर गंभीरता से अमल नहीं होता और न ही इस पर कोई नजर रखता है। प्रोजेक्ट प्रबंधक उत्पादन में लगे हैं जो कि क्षमता से भी अधिक का उत्पादन कर रहे हैं। बावजूद इसके कोई नहीं पूछ रहा कि वे लोग क्षमता से अधिक उत्पादन क्यों कर रहे हैं। इसके लिए सरकार ने पूर्व में एक कमेटी भी बनाई थी, लेकिन उस कमेटी की सिफारिशें आज तक सार्वजनिक नहीं हो सकीं।

27 हजार मेगावाट दोहन लक्ष्य

प्रदेश में 27 हजार मेगावाट की ऊर्जा क्षमता चिन्हित है, जिसमें से 10 हजार 500 मेगावाट का दोहन किया जा रहा है। शेष क्षमता में से 10 हजार मेगावाट के और प्रोजेक्ट दिए जा चुके हैं, यदि वे सभी एक साथ ऊर्जा दोहन करते हैं तो वर्तमान परिस्थितियों के मुताबिक नदियों व नालों में पानी ही नहीं बचेगा। आने वाले समय में यह मानवीय संकट मानव पर ही उल्टा पड़ेगा।

30 फीसदी कूहलें सूखने के कगार पर

एक अनुमान के मुताबिक आईपीएच विभाग की 30 फीसदी तक कूहलें सूखने की कगार पर हैं, जिनसे गाहे-बगाहे ही पानी मिल पाता है। इसका मुख्य कारण कूहलों व नालों के नजदीक अवैज्ञानिक खनन है। लोग यहां लगातार खड्डों से खनन सामग्री उठाने के चलते नुकसान पहुंचा रहे हैं। यहां पर खनन कार्य बढ़ चुका है, जिसके चलते खड्डों ने अपना रुख तक मोड़ दिया है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते पहले ही मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ है, जिससे समय पर पानी नहीं मिल पा रहा, बर्फबारी नहीं हो रही। वहीं लोग इन नदी-नालों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। राज्य में भू-जलस्तर गिर चुका है।

अवैध खनन से गिरा जलस्तर

नदियों से अवैध तरीके से रेत उठाने की  प्रक्रिया यहां निरंतर है। हरेक जगहों पर रेत को अवैध तरीके से यहां से निकाला जाता है। इस पर रोक लगाने के लिए नई खनन नीति में कुछ प्रावधान किए गए हैं। इसमें सरकार ने दोषियों के खिलाफ  सजा का प्रावधान भी अब कर दिया है, वहीं जुर्माने को भी बढ़ा दिया गया है। प्रदेश सरकार ने अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए अपनी पुरानी खनन नीति में कुछ संशोधन किए हैं, जिनके नतीजे आने वाले समय में देखने को मिलेंगे। अवैध खनन को रोकने के लिए सरकार ने 38 विभागीय अधिकारियों को शक्तियां प्रदान कर रखी हैं, जिन पर भी गंभीरता से काम नहीं हो रहा।

हिमाचल में बिजली प्रोजेक्ट

राज्य में सरकारी एजेंसी हिम ऊर्जा के पास अपने 18 प्रोजेक्ट हैं, जबकि उनके द्वारा निजी क्षेत्र को 801 छोटी परियोजनाएं आबंटित की गई हैं। इसी तरह से सरकार के बिजली बोर्ड के पास 31 परियोजनाएं हैं, जिनमें बिजली का दोहन किया जा रहा है। पावर कारपोरेशन के पास 22 प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं जिनमें से दो में उत्पादन किया जा रहा है। केंद्रीय व संयुक्त क्षेत्र के पास 17 परियोजनाएं हैं, जबकि प्राइवेट डिवेलपरों को 111 परियोजनाएं आबंटित की गई हैं। अभी सरकार ने कुल चिन्हित 27 हजार मेगावाट में से 23 हजार 172 मेगावाट के प्रोजेक्ट आबंटित कर दिए हैं।

आईपीएच को 2572 करोड़ का बजट

वर्तमान राज्य सरकार ने सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य विभाग के लिए इस वित्त वर्ष में कुल 2572 करोड़ रुपए का बजट प्रस्तावित किया है। इसमें पेयजल योजनाओं के लिए सरकार ने 275 करोड़ रुपए का बजट रखा है जबकि केंद्र स्कीम से 3150 बस्तियों को पानी पहुंचाने के लिए 100 मिलियन डालर की एक योजना प्रस्तावित की है। 221 पेयजल योजनाएं, जिनका 75 फीसदी तक काम पूरा हो चुका है, के लिए सरकार ने 33 करोड़ रुपए की राशि रखी है। हैंडपंपों के लिए कुल बजट में से 20 करोड़ रुपए की राशि रखी गई है। विभाग के कुल बजट में ही सिंचाई योजनाओं के लिए पैसा रखा गया है। वर्तमान में आईपीएच विभाग द्वारा 3448 पेयजल व सिंचाई योजनाएं चलाई जा रही हैं। सिंचाई स्कीमों को सुचारू बनाने पर सरकार ध्यान दे रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि जो स्कीमें बन चुकी हैं उनमें अब पानी नहीं मिल पा रहा। इस वजह से अब सरकार खेती में स्प्रिंकलर को महत्त्व देने पर विचार कर रही है। इस पद्धति से पानी की खपत कम होगी और सिंचाई की सुविधा अधिक मिलेगी। सतलुज के लिए 700 करोड़ रुपए का एक वनीकरणीय प्रोजेक्ट विश्व बैंक की सहायता से बनाया गया है। इसी तरह से हरेक बिजली परियोजना के भी कैचमेंट ट्रीटमेंट प्लांट हैं। करोड़ों रुपए इस पर खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक नतीजा देखने को नहीं मिला, क्योंकि नियमों की अनदेखी हर जगह हो रही है।

प्रदेश में खनिज संपदा के भंडार

हिमाचल में अनेक प्रकार के खनिज होते हैं। इनमें चूने का पत्थर, डोलोमाइट युक्त चूने का पत्थर, चट्टानी नमक, सिलिका रेत और स्लेट शामिल हैं। यहां लौह अयस्क, तांबा, चांदी, शीशा, यूरेनियम और प्राकृतिक गैस भी पाई जाती है। चट्टानी नमक को स्थानीय भाषा में लेखन कहा जाता है। यहां भारत की एकमात्र चट्टानी नमक की खान है। मैगली में नमकीन पानी को सुखाकर नमक तैयार किया जाता है। चट्टानी नमक दवाइयां और पशु चारे के काम में प्रयुक्त होता है। प्राकृतिक तेल गैस स्वारघाट (बिलासपुर) चौमुख (सुंदरनगर), चमकोल (हमीरपुर) तथा दियोटसिद्ध (हमीरपुर) में पाई जाती है। प्राकृतिक तेल गैस ज्वालामुखी (कांगड़ा) और रामशहर (सोलन) में भी पाई जाती है।  प्रदेश में स्लेट की लगभग 222 छोटी व बड़ी खानें हैं। खनियारा (धर्मशाला), मंडी, कांगड़ा और चंबा में अच्छी मात्रा में स्लेट प्राप्त होता है। मंडी में स्लेट से टाइलें बनाने का कारखाना है। स्लेट छत और फर्श बनाने में प्रयुक्त होता है। अच्छा स्लेट, भारी हिमपात से भी नहीं टूटता है। सिलिका रेत, बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा, ऊना और मंडी की खड्डों व नालों में पाई जाती है। ऊना जिला के पलकवा, हरोली, बाथड़ी खड्डों में चमकदार पत्थर व रेत पाई जाती है। यह भवन निर्माण, पुल, बांध और सड़कें बनाने में प्रयुक्त होती है। छिंजराढा, जरी (बंजार), ढेला, गड़सा घाटी (कुल्लू) और हमीरपुर में यूरेनियम होने की संभावना का पता चला है। यह नाभिकीय ऊर्जा का स्रोत है।

ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़ने को तैयार नहीं उद्यमी

उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित पानी के शोधन के लिए बद्दी के केंदूवाल में करीब 60 करोड़ की लागत से कॉमन एलुएंट ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया गया है, लेकिन इसका दोहन सही तरीके से नहीं हो पा रहा है। ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता 250 लाख लीटर प्रतिदिन गंदे पानी का उपचार करने की है, जबकि इसमें 110 लाख लीटर प्रतिदिन गंदा पानी ही शोधित हो पा रहा है। बद्दी-बरोटीवाला के उद्योगों को सीईटीपी से जुड़ना अनिवार्य किया गया है, लेकिन अभी भी सैकड़ों उद्योग इससे जुड़ने को तैयार नहीं हैं। बीबीएन में अभी तक ऐसा कोई मामला नहीं आया है, जिसमें उद्योग को बंद करने की नौबत आई हो। इक्का-दुक्का मामलों में उद्योगों ने अपने संबंधित क्रियाकलाप जरूर बंद किए हैं। उदाहरण के तौर पर नालागढ़ के जूता उद्योग को अपना रंगाई यूनिट बंद करना पड़ा था।

बीबीएन में हवा पानी जहरीला

हिमाचल की औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले औद्योगिक क्षेत्र की आबोहवा में बेलगाम उद्योगों के प्रदूषण ने जहर घोल दिया है, हालात इस कद्र भयावह हो चुके है कि न तो बीबीएन में साफ हवा में सांस लेना मुनासिब है और न ही नदी नालों में साफ पानी का दिखना। बीबीएन की प्रमुख नदी सरसा हो या फिर रत्ता व बाल्द नदी, इनमें काले झाग युक्त पानी के अलावा कुछ नजर नहीं आता। कभी शीशे सा साफ दिखने वाला सरसा नदी का पानी उद्योगपतियों की बेरहमी और संबंधित महकमों की सुस्ती से आज काले रंग में बदल चुका है। मसलन जिस सरसा नदी को करीब दो दशक पहले जीवनदायिनी कहा जाता था, आज उसके पानी को इनसान छूने से भी डरता है। क्षेत्र के उद्यमियों की बारिश की आड़ में जहरीले प्रदूषित पानी को नदियों में बहाने की पुरानी रिवायत है, जिसका खामियाजा निरीह जलजीवों को भुगतना पड़ता है।   करीब अढ़ाई हजार से ज्यादा उद्योगों को समेटे बीबीएन क्षेत्र के ये उद्योग जहां प्रदेश की आर्थिकी को संबल प्रदान कर रहे हैं। वहीं पर्यावरण का भी जमकर बंटाधार कर रहे हैं। आज आलम यह है कि सरसा नदी, रत्ता खड्ड,मंढ़ावाला नाला, संड़ोली नाला,हाउसिंग बोर्ड नाला प्रदूषण के सबसे बड़े उदाहरण बन चुके हैं। इन नदी नालों में उद्योगों से रोजाना केमिकल युक्त पानी, कीचड़ युक्त मलबा, स्लज व अन्य औद्योगिक अपशिष्ट बेरोकटोक ठिकाने लगाए जा रहे हैं। कहने को उद्योगों में ईटीपी लगाए गए हैं, लेकिन ज्यादातर उद्योगपति बिजली के खर्चें से बचने के लिए ईटीपी को चलाना मुनासिब नहीं समझते, या यूं कहें कि उद्योगों के ईटीपी मात्र शोपीस बनकर रह गए हैं। उद्योगों के अलावा बद्दी बरोटीवाला के हजारों घरों का डोमेस्टिक वेस्ट भी नदी-नालों में ही ठिकाने लगाया जा रहा है,रोजाना सीवेज से भरे टैंकर सरेआम नदियों में गंदगी फैलाते दिख जाते हैं, लेकिन इन पर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व प्रशासन कोई भी लगाम नहीं लगा सका है। हालांकि बद्दी में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का काम चल रहा है लेकिन इसे शुरू होने  में अभी करीब दो साल का अरसा लगेगा। ऐसे में तब तक सीवेज वेस्ट को ऐसे ही खुले में ठिकाने लगाने का काम चलता रहेगा।  बीबीएन में स्क्रैप डीलर भी नदी-नालों को प्रदूषित करने से पीछे नहीं हैं। आलम यह है कि उद्योगों से निकलने वाले केमिकल ड्रमों को यह स्क्रैप डीलर अपने वाशिंग प्लांट में साफ करने की बजाय खुलेआम नदी-नालों में साफ कर रहे हैं।  इसके चलते सीपीसीबी पंजाब पॉल्यूशन बोर्ड की टीम हर तीन माह बाद पानी के सैंपल लेती है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के बद्दी स्थित अधिशाषी अभियंता अविनाश शारदा ने कहा कि बोर्ड निरंतर नदी-नालों से पानी के सैंपल लेकर जांच करता है। इसके अलावा सुनिश्चित किया जा रहा है कि उद्योगों से जीरो डिस्चार्ज हो और उद्योग अपने यहां से निकलने वाला पानी सीईटीपी में भेजें। बेलगाम उद्योगों पर बोर्ड कार्रवाई भी करता रहा है।

बीमारी की चपेट में ग्रामीण

बद्दी-बरोटीवाला में उद्योगों से केमिकल युक्त पानी के जमीन में चले जाने से पेयजल स्रोतों के प्रदूषित होने और इससे ग्रामीणों के चपेट में आने के भी मामले सामने आते रहे हैं। दून के पूर्व विधायक ने भी साल भर पहले विस में बद्दी बरोटीवाला के गांवों के बाशिंदों के प्रदूषण के कारण कैंसर की बीमारी के चपेट में आने का मसला उठाया था।

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