हिमाचली पुरुषार्थ : गुफा के अंदर ज्ञान का दीपक जगाते हरिदत्त शर्मा

 बच्चों में शिक्षा की लौ जगाने का जुनून लेकर हरिदत्त शर्मा ने गांव से कुछ दूर जंगल में एक गुफा खोज निकाली और फिर क्या था कि यहीं डेरा जमा लिया। घर का माहौल पढ़ाई का नहीं होने के कारण बच्चे होमवर्क नहीं कर पा रहे थे, जिस कारण उन्होंने बच्चों को अपने पास ही गुफा में रख लिया …

एक शख्सियत जिन्होंने 80 के दशक में जिला कुल्लू के अति दुर्गम क्षेत्र शाक्टी मरौड़ क्षेत्र में गुफ ा के अंदर रहकर शिक्षा की लौ जगाई। सैंज घाटी के शैंशर से ताल्लुक रखने वाले शास्त्री हरिदत्त शर्मा 13 नवंबर, 1988 को शाक्टी में खुले प्राथमिक स्कूल में अध्यापक पद पर तैनात हुए। उस समय बंजार विधानसभा क्षेत्र के विधायक सत्य प्रकाश ठाकुर ने यहां सूरत राम के घर में प्राथमिक स्कूल खोला, लेकिन जिस मकान में स्कूल चल रहा था 1989 में वह बर्फबारी के कारण ढह गया। हरिदत्त शर्मा ने हिम्मत नहीं हारी बच्चों के साथ मिलकर यहां से कुछ दूरी पर घास-फूं स से एक झोंपड़ी तैयार की, पर बर्फ  का भार वह नहीं सह पाई और आठ महीने बाद धराशाही हो गई। यहां के लोगों के पास घर एक-एक कमरे वाले ही थे, ऐसे में स्कूल चलाने के लिए जगह नहीं रही थी। बच्चों में शिक्षा की लौ जगाने का जुनून लेकर हरिदत्त शर्मा ने गांव के कुछ दूर जंगल में एक गुफ ा खोज निकाली और फि र क्या था कि यहीं डेरा जमा लिया। घर का माहौल पढ़ाई का नहीं होने के कारण बच्चे होमवर्क नहीं कर पा रहे थे, जिस कारण बच्चों को अपने पास ही गुफ ा में रख लिया। वर्ष 1989 से लेकर 2001 तक प्राथमिक पाठशाला इसी गुफ ा में चलती रही और वर्ष 2001 में स्कूल को भवन मिलने के बाद हरिदत्त शर्मा को यहां से स्थानांतरित कर दिया गया। सर्वशिक्षा अभियान के दौरान सुर्खियों में रहे प्रदेश के सबसे दुर्गम क्षेत्र जिला कुल्लू के शाक्टी में 13 साल अपनी कठिन परिस्थितियों के बीच बच्चों को पठन-पाठन करवाने वाले अध्यापक हरिदत्त शर्मा कुछ माह पहले सेवानिवृत्त भी हुए, लेकिन उन्हें सरकार और शिक्षा महकमा सम्मानित नहीं कर पाए हैं। सरकार और विभाग ने अध्यापक की क्यों अनदेखी की यह बड़ा प्रश्न है। 17 मई, 1988 में प्राथमिक स्कूल में अध्यापक लगे हरिदत्त शर्मा 31 मई, 2017 को सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने पूरे 13 साल शाक्टी में गुफ ा में बच्चों को पढ़ाया। सुबह-शाम बच्चों को ज्ञान बांटते रहे। यही नहीं, बच्चों को सुबह-शाम की खाद्य सामग्री भी अपने खर्चे पर परोसते थे। पेड़ों की छांव और रास्ते पर भी बच्चों को पढ़ाते थे। खुद भी घर नहीं आते थे, जिस गुफ ा में पढ़ाते थे, उसी गुफ ा में बच्चों के साथ रहते थे और बच्चों को पढ़ाई में काफी आगे ले गए। बच्चों को अक्षर ज्ञान बांटने के लिए कई कठिनाइयों के दौर से भी गुजरे, लेकिन नहीं हारे। प्रदेश के सबसे दुर्गम गांव शाक्टी में शिक्षा की लौ जगाने वाले अध्यापक हरिदत्त शर्मा को सरकार सेवानिवृत्त होने तक सम्मान नहीं दे पाई है।

कुछ पीयन लगे तो कुछ दिहाड़ीदार

क्षेत्र के युवक पांचवीं पास करने के बाद घर की स्थिति अच्छी न होने के बाद आगे की पढ़ाई नहीं कर पाए। कुछ युवाओं को उस समय पीयन आदि की नौकरी मिल गई। उन्हें गांव से बाहर जाकर बातचीत और उठने-बैठने का सलीखा आ गया।

बच्चों का खर्चा भी स्वयं दिया

हरिदत्त का कहना है कि उनके पास उस समय आसपास के गांवों के 13 बच्चे पढ़ाई कर रहे थे। हालांकि चंद बच्चों को वह शाम के समय घर तक छोड़ देते थे, लेकिन जो दूर गांव के बच्चे थे उन्हें अपने पास ही रख लेता थे। बच्चों को कभी खीर तो कभी नमकीन चावल बनाकर खिलाता थे, जिसके चलते बच्चे यहां पढ़ाई कर पाए।

ब्लॉक स्तर पर 26 जनवरी, 1999 को हुए हैं सम्मानित

हरिदत्त शर्मा को क्षेत्र में शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन कार्य करने के लिए ब्लॉक स्तर पर 26 जनवरी, 1999 को बंजार में सम्मानित किया गया था। इस दौरान विभाग के अधिकारियों ने कहा था कि हरिदत्त शर्मा को महावीर अवार्ड देने की सिफ ारिश की जाएगी, लेकिन वह अभी तक नहीं मिल पाया है। जबकि उनके इस कार्य को देखने के लिए शिक्षा विभाग के साथ- साथ राज्य स्तर के अधिकारी भी पहुंच चुके थे।

जब रू-ब-रू हुए…बच्चों की भावना को जरूर समझें हिमाचली अध्यापक…

शिक्षक बनना आपके परिचय को कितना सशक्त कर गया?

शिक्षक बनाने से मेरा परिचय काफ ी सरल हुआ है। मैं जिला के उस स्कूल में पढ़ाता था, जहां कोई पढ़ाने के लिए हामी नहीं भरता था। प्रौढ़ शिक्षा का दौर चला था  और मेरा परिचय काफ ी आगे तक पहुंचा था।

गुफा में रहकर शिक्षा की लौ जगाना आपके लिए कितना कष्टप्रद या संतोषजनक रहा?

गुफा में रहकर शिक्षा की लौ जगाने में कष्ट भी हुआ, लेकिन अपने बलबूते पर कष्ट को इतना आसान बनाया कि बाद में संतोषजनक भी रहा है।

आपने अभिभावकों को किस तरह राजी किया कि वे अपने बच्चों को गुफा के छात्रावास में भेजें?

पढ़ाई के बारे में पहले अभिभावकों को ज्ञान दिया। शिक्षा क्या चीज है। अभिभावक बच्चों को स्कूल नहीं भेजते थे और उनको कोई ज्ञान नहीं था। कविता द्वारा पहले अभिभावकों को पढ़ाई की ओर  बच्चों को लाने के लिए ज्ञान बांटा। कुल्लवी भाषा में कविता बनाई थी और यहां से बच्चों को पढ़ाई की ओर मोड़ा।

क्या आप समझते हैं कि बिना शिक्षक की तपस्या के ‘मिड- डे मील’ जैसे प्रायोजन सफल हो पाएंगे?

बिना शिक्षक की तपस्या से मिड- डे मील जैसे प्रायोजन सफल नहीं हो पाएंगे।

क्या कभी कोई मंत्री या शिक्षा अधिकारी आपकी गुफा पाठशाला तक पहुंचा?

नवंबर 1998 में शिक्षा मंत्री रहे स्व. कर्ण सिंह और उनके साथ उस दौरान एडीएम बंजार भी इस गुफा स्कूल में आए थे। एसडीएम भी गुफ ा में रहे। इससे पहले पूर्व बागबानी मंत्री सत्य प्रकाश ठाकुर भी यहां पहुंचे थे और बच्चों को मिठाई के लिए 25 रुपए दिए थे।

कोई रोचक किस्सा जो तेरह सालों की कठिन परीक्षा में सामने आया हो?

जानवरों को मारने का दौर था और हैरान हो गए। इसके प्रति भी वहां के लोगों को जागरूक किया और उन्होंने जानवरों को मारना बंद दिया है।

या जब बच्चों की जिम्मेदारी ने जोखिम की नित नई कठिनाइयां पैदा कीं?

बच्चों की समस्या को ढूंढा। जैसे बच्चे मनमर्जी से 12 बजे स्कूल पहुंचते थे और पूछकर नमस्ते करते थे। यहां पर कोई ज्ञान नहीं था। मिठाई देकर बच्चों को ज्ञान बांटा है और शिक्षित किया।

इस दौरान परिवार के सदस्यों के साथ संपर्क और रिश्तों की मांग कैसे पूरी की?

वैसे मैं हर संडे को स्कूल लगाता था। जब कभी संडे के दिन घर जाता था, तो परिवारों से रू-ब-रू होता था। वहीं, संडे के दिन ही रिश्तेदारों से मिल पाता था।

छात्रों के शिक्षक के साथ आत्मीय रिश्ते किस तरह संभव हैं और समाज की सहमति में शिक्षा की पद्धति किस तरह सशक्त हो सकती है?

कक्षा में जब शिक्षक जाता है और शिक्षक के ध्यान में यह होना जरूरी है कि मुझे किस तरह से बच्चों के पास जाना है। शिक्षक को सब बच्चों का नाम पुकारना चाहिए, जिससे बच्चे काफ ी उत्साहित होते हैं और पढ़ाई की तरफ  ध्यान देते हैं।

अब जब मुड़कर उस गुफा को देखते हैं या किसी आधुनिक तथा सुविधा संपन्न स्कूल में पिछड़ती शिक्षा को देखते हैं, तो कैसा अनुभव करते हैं?

काफी अनुभव करते हैं। गुफा में बच्चों को पढ़ाकर आनंद लिया। आनंद के साथ बच्चों को पढ़ाया है। मेरे जहन में रहा कि मैं वहां के बच्चों को ज्ञान बांटू और आगे ले जाऊं।

आपकी दृष्टि में एक शिक्षक का फर्ज कहां से शुरू होकर कहां तक आवश्यक है?

जैसा बच्चे प्रथम कक्षा में प्रवेश लेते हैं। शिक्षक सोचते  हैं कि हमारे द्वारा पढ़ाए गए बच्चों का भविष्य उज्ज्वल हो। बच्चों के भाव को समझते हुए शिक्षक को पढ़ाना चाहिए, ताकि बच्चा अपने भविष्य को छू ले।

सरकारी स्कूलों के पिछड़ने में आप किसे जिम्मेदार मानेंगे?

सरकारी स्कूल में पिछड़ने में शिक्षक और अभिभावक दोनों जिम्मेदार हैं। दोनों को बच्चों को पढ़ाने के लिए मेहनत करनी चाहिए।

 

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