आम के पेड़ों को ‘शाखा गांठ’ से बचाने को स्प्रे जरूरी

हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्रों में आम एक महत्त्वपूर्ण फसल है तथा बागबानों की आय का मुख्य स्रोत है। विभिन्न प्रकार के नाशी कीट समय-समय पर आम के बागीचों में आक्रमण कर क्षति पहुंचाते हैं। जब तक फल वृक्षों पर लगे होते हैं, हमारे बागबान भाई एवं बहनों का ध्यान बागीचे पर होता है, किंतु फल तोड़ने के उपरांत बागबान किन्हीं और आवश्यक कार्यों में व्यस्त हो जाते हैं तथा बागीचों पर उनका ध्यान केंद्रित नहीं रहता, लेकिन शाखा गांठ सिल्ला या मैंगो सिल्ला कीट की समस्या इसी समय पनपती है। इस नाशी कीट का आक्रमण पहले कम हुआ करता था, परंतु अब हर साल इसका आक्रमण नजर आता है। ये कीट बागीचों में सितंबर-अक्तूबर से मार्च तक क्षति पहुंचाते हैं। बागबान भाई एवं बहनों को यदि इसके बारे में जानकारी हो तो समय रहते इस नाशी कीट का प्रबंधन किया जा सकता है।

यह नाशी कीट बहुत छोटा रस चूसने वाला कीट है, जो बाहर से नजर नहीं आता। इसके शिशु (निम्फ) अंडों से निकल कर नई कलिकाओं में प्रवेश कर रस चूसते हैं। प्रभावित भाग शंकु के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इन शंकुओं को हम शाखा गांठें भी कहते हैं। शुरू में ये गांठें छोटी होती हैं, परंतु जैसे-जैसे कीट की वृद्धि होती है, इन गांठों का आकार भी बड़ा हो जाता है। यदि इन गांठों को काटकर देखा जाए तो इनके भीतर पीले रंग के शिशु (निम्फ) नजर आते हैं, जिनकी आंखें लाल होती हैं। इन्हें आप बागीचों में फील्ड लेंस की सहायता से देख सकते हैं। ये कीट रस सूचने के साथ-साथ एक चिपचिपा पदार्थ भी छोड़ते हैं, जिसे हनी डयू के नाम से जाना जाता है। ये कीट इन गांठों के भीतर मार्च-अपै्रल माह तक रहते हैं तथा बाद में व्यस्क बनकर इन गांठों को छोड़ देते हैं। यह नाशी कीट वर्ष में केवल एक जीवन चक्र पूर्ण करते हैं। इन कीटों के रस सूचने की वजह से प्रभावित वृक्ष कमजोर पड़ जाते हैं। शाखा गांठों से नई शाखाएं नहीं बन पातीं, जिससे आने वाले साल की फसल प्रभावित हो जाती है। बागबान भाई एवं बहिनें इस कीट के लक्षण सितंबर माह में कुछ वृक्षों पर देख सकते हैं। उस समय ये शाखा गांठें या शंकु छोटे-छोटे होते हैं तथा आसानी से नजर नहीं आते, परंतु ध्यान से देखने पर या फील्ड लेंस की सहायता से इन्हें देखा जा सकता है।

प्रबंधन : प्रारंभ में जब शाखा गांठों की संख्या कम हो तो इन्हें निकल कर नष्ट कर दें। इसके उपरांत वृक्षों पर डाइमैथोएट (रोगर 30 ईसी) या आकसी डैमीटॉन मिथायल (मैटासिस्टॉक्स 25 ईसी) का 200 मिली दवा प्रति 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। छिड़काव फुट स्प्रेयर या पावर स्प्रेयर से करें, ताकि दवा का प्रभाव हो सके। यदि आवश्यकता हो तो 21 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव किया जा सकता है। इस बात का ध्यान रखें कि एक ही कीटनाशी का छिड़काव बार-बार न हो, अन्यथा नाशी कीटों में प्रतिरोधिता आ सकती है तथा दवा फिर असर नहीं कर पाती। इसके अतिरिक्त हमारे बागबान विश्वविद्यालय के अनुसंधान एवं कृषि विज्ञान केंद्रों में कार्यरत वैज्ञानिकों से संपर्क कर सकते हैं तथा अपनी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं।

You might also like