कुल्लू से नाराज कुदरत

जाती-जाती बरसात कुल्लू-मनाली को तो तबाह कर गई, पर साथ ही संदेश भी दे गई कि अभी वक्त है…संभाल लो खुद को, बचा लो प्रकृति, मत बदलो नदी-नालों का बहाव। किसी समय अपनी प्राकृतिक छटा से सबको आनंदित कर देने वाली मनाली आज कराह रही है अपने रंग-रूप को देखकर। ढूंढ रही है अपने लिए तारणहार। क्या है आज मनु की मनाली का हाल, बता रहे हैं इस बार…

प्रकृति से हमें जो कुछ मिला है, उसका सही तरह से अगर इस्तेमाल न किया जाए तो इसका नतीजा विनाश ही होता है।  हिमाचल के कुल्लू जिला में भी प्रकृति से खूब छेड़छाड़ हो रहा है। लोग अपने फायदे के लिए पहाड़ों का सीना छलनी कर रहे हैं। पहाड़ों पर कंस्ट्रक्शन वर्क भी  विनाश का प्रमुख कारण बनता जा रहा है।  सरकारें धड़ाधड़ हाइडल प्रोजेक्टों को पहाड़ खोदने के लिए अनुमति तो देती आ रही है, लेकिन पहाड़ खोदने से क्या नतीजा निकल रहा है, उसका अभी तक विकल्प नहीं ढूंढा गया। कुल्लू में वर्ष 1995 के बाद पावर प्रोजेक्टों का उदय भी हुआ था और भविष्य में कई नालों पर प्रोजेक्ट बनाने की योजनाएं है, लेकिन प्रकृतिक को ठेस न पहुंचे इसके लिए कोई बड़ी योजना तक नहीं बन पा रही है।  जिला के अधिकतर ग्रामीण तथा एनएच को देखें तो पहाड़ी के नीचे से होकर गुजरे हैं, अब पहाडि़यां इतनी खोखली हो गई है कि कभी भी दरक सकती है और दरकने का क्रम भी जारी है। यही नहीं ब्यास नदी का सीना छलनी होने से अब काफी खतरा उत्पन्न हो गया है। जिसका ताजा उदाहरण हाल ही में 21 से 24 सितंबर का है।  प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए यहां पर सिर्फ प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चाओं के सिवाय कुछ नहीं हो पाता है। लिहाजा, जिस तरह से यहां के पहाड़ों का प्रोजेक्ट और सड़कों से खोखला किया जा रहा है, उसी तरह से सरकार और प्रशासन के दावे भी खोखले साबित दिख रहे हैं।

सरकार प्रशासन गंभीर नहीं

जिला कुल्लू के बुद्धिजीवियों की मानें तो तबाही सरकार और प्रशासन की नालायकी से हो रही है। क्योंकि अगर सरकार पावर प्रोजेक्ट्स को अनुमति देती है, तो सरकार को यह भी प्रोजेक्ट्स प्रबंधन के साथ वादा करना चाहिए कि प्रोजेक्ट की वजह से जहां तबाही का मंजर बरप रहा है वहां पर उसे रोकने के लिए कोई हल ढूंढा जाए। वहीं, सरकार को ब्यास में खनन करने वालों पर इस तरह से नुकेल कसनी चाहिए कि पकड़े जाने पर दूसरी बार वह ब्यास में अतिक्रमण करने उतर भी न पाएं।

अतिक्रमण ने बंद कर दिए नदी-नाले व ब्यास

मनाली से लेकर अगर औट तक देखें तो जगह-जगह पर ब्यास के अलावा अन्य नदी-नालों पर अतिक्रमण बढ़ा है। ब्यास के दोनों छोर पर घरों व होटलों के निर्माण की बाढ़ सी आ गई है। यही कारण है कि नालों व ब्यास में जब थोड़ा सा भी पानी बढ़ता है, वह कहर बरपा देता है। कुछ जगहों पर नालों पर ही पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कारोबारियों की ओर से टैंट या फिर कॉटेज बनाए गए हैं। कुछ सालों से फोरलेन का कार्य भी यहां तेजी से चला हुआ है। पहाड़ों से निकलने वाले मलबे को सीधे ब्यास में डंप किया जा रहा है, जिससे दरिया रुख बदलने लगा है।

दिन प्रतिदिन बढ़ रहा भवनों का बोझ

मनाली की आबादी 30 हजार के करीब है और बात यहां शहर की करें तो नगर परिषद के आंकड़ों के अनुसार नौ हजार से अधिक लोग शहर में रहते हैं। ऐसे में छोटे व सुंदर मनाली शहर में जहां दिन प्रतिदिन बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों का बोझ बढ़ रहा  है।

यहां अकसर सड़कों पर बहती है ब्यास

कुल्लू से मनाली तक जाने वाली राइड बैंक सड़क का निर्माण भले ही दशकों पहले किया हो, लेकिन यह सड़क कुछ क्षेत्रों में ब्यास नदी के साथ से गुजरती है। ऐसे में ब्यास के उफान पर बहने से अकसर सड़क नदी में बह जाती है। इन क्षेत्रों में क्लाथ, 15 मील, रायसन विहाल, रांगड़ी का क्षेत्र शामिल है। यहां पर सड़क नदी के साथ बनी है। यही नहीं दूसरी तरफ रायसन विहाल व 15 मील के समीप तो एक तरफ नदी तो दूसरी तरफ सीधा पहाड़ है। बरसात के दिनों में यहां सड़क पर जहां भारी भू-स्खलन होता है और सड़क पर यातायात प्रभावित रहता है, वहीं अगर ब्यास में बाढ़ आती है तो इस क्षेत्र में सबसे पहले नदी की पानी सड़कों पर बहता है।  जिला की सड़कों में पैरापिट नहीं लगे हैं। सड़क किनारे पैरापिट और क्रैश बैरियर न होने से कई बार यहां हादसे हो चुके हैं।  कुल्लू से मनाली तक की सड़क पर प्रशासन ने दस ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए है,जिनमें हादसों को लेकर अंदेशा बना हुआ है।

ब्यास को गहरा करने की जरूरत

खनन माफिया ने ब्यास के किनारे खोखले कर दिए हैं,जिस कारण से ब्यास में पानी का बहाव बढ़ने पर जब पानी को रास्ता नहीं मिल पाता है। सारा पानी बाजार के और मुड़ जाता है। अगर ब्यास नदी को बीच से खाली किया जाए तो बाढ़ जैसी घटनाओं के दौरान पानी के बढ़े बहाव को जगह मिलने से वह सही दिशा में बह सकेगा और साथ लगती लोगों जमीनें, घरों को भी नुकसान होने से बचाया जा सकेगा।

नाले भी डराते हैं

जिला में अनेकों नदी-नाले हैं, जो कि अधिकतर आपदा के दौरान अपना रौद्र रूप धारण कर लेते है।  अधिक बारिश होने पर इन नालों में ही आई बाढ़ के कारण से भारी नुकसान हुआ है, जिस कारण से कई गांवों को  अब खतरा बना हुआ है। बारिश होने से नाले उफान पर आ जाते  हैं , जिस कारण ब्यास का जलस्तर बढ़ जाता है और  तबाही मचाता है। यहीं नहीं प्रोजेक्टों से छोड़े जाने वाला पानी भी तबाही मचा देता है।

जहां, आज  बाजार, वहां बहती थी ब्यास

जब-जब जिला कुल्लू में बाढ़ की घटना घटी है, उस दौरान ब्यास नदी ने हमेशा अपना रुख लिया है। बुजुर्गाें की मानें तो जहां आज  पतलीकूहल का मुख्य बाजार है। कभी वहां ब्यास नदी बहा करती थी। इसका खुलासा तब हुआ, जब 1995 में बाढ़ के कारण से भारी नुकसान जिलाभर में हुआ था और ब्यास ने अपना रुख बदलते हुए मुख्य बाजार में प्रवेश किया और कई घर पानी में डूब गए।

 ब्यास के किनारों का तटीकरण फाइलों में दफन

प्रदेश में कांग्रेस सरकार  रही हो या बीजेपी सरकार,लेकिन जिला कुल्लू के ब्यास तटीकरण की योजना धरातल पर नहीं उतारी जा रही है। जब प्रदेश की बड़ी-बड़ी योजनाओं पर चर्चा होती है तो उसमें हर बार ब्यास तटीकरण की योजना पर भी बात होती है, लेकिन योजना आज दिन तक फाइल से बाहर नहीं निकल पाई है।  यदि समय रहते मनाली से लेकर पंडोह तक भी ब्यास नदी का तटीकरण किया होता तो शायद इतना नुकसान न होता और न ही जनता प्राकृतिक आपदा की भेंट चढ़ती।

बेखौफ अवैध भवन निर्माण और बेकाबू खनन

दो दशकों से ब्यास में  अवैध खनन को अंजाम दिया जा रहा है। जिससे एरिया बढ़ा और जब नदी उफान पर आ रही है तो बस्तियां तक उजड़ रही हैं। यही नहीं, लोगों ने कई जगह नदी-नालों के साथ अवैध कब्जा कर आशियाने बना  दिए हैं। यदि समय रहते इन पर सरकार, प्रशासन और विभाग ने कार्रवाई की होती तो शायद इतना बड़ा नुकसान न होता।

रामशिला-अखाड़ा बाजार में ब्यास पर ही भवन

जिला मुख्यालय कुल्लू से कुछ दूरी पर रामशिला और अखाड़ा बाजार को ही देखें तो यहां पर ब्यास नदी के ऊपर  भवन बनाए गए हैं। यही नहीं इसके अलावा कई ऐसी जगह हैं, जहां पर इस तरह के कार्यों को अंजाम दिया गया।

जिला में अंधाधुंध पेड़ कटान ने  बढ़ाया खतरा

जिला में अंधाधुंध पेड़ कटान हुआ है। इससे प्रकृति को भारी नुकसान हो रहा है। वहीं, अगर अचानक ऐसे  क्षेत्रों में बादल फट जाते हैं तो वहां सफाया हो रहा है और जंगलों के नीचे बसी बस्तियों को भी नुकसान हो रहा है।

जलविद्युत परियोजनाओं ने निगले खेत-खलिहान 

प्रोजेक्ट से सोती गांव के लोग भी दंश झेल चुके हैं। यहां पर भी पावर प्रोजेक्ट से खेत खिसकते-खिसकते ढांक बन गए हैं। लोगों के आंगन धंस गए हैं। कुल्लू की सैंज घाटी में  प्रोजेक्टों से लोगों को काफी दंश झेलने पडे़ हैं। प्रोजेक्टों से चाहे सरकार का खजाना भर रहा होगा, लेकिन प्रोजेक्ट की जद में आने वाले गांवों को किस तरह से सुरक्षित बचाया जा सके, इसके लिए कंपनी प्रबंधन के साथ सरकार योजना बनाती हुई आज दिनों तक नहीं दिखी।

पवित्र मणिकर्ण नगरी पर मंडरा  रहा खतरा

जिला कुल्लू में सड़कें तो निकली हैं, लेकिन ये सड़कें ज्यादातर पहाडि़यों को खोदकर निकाली गई हैं। जिला कुल्लू में पिछले बीस दशकों से जहां-जहां चौबीस घंटे सड़कों पर खतरा बना होता है, मणिकर्ण की ही बात करें तो यहां पर पहाड़ी से चट्टानें आने से कितना जानी नुकसान हुआ है, लेकिन पहाड़ी से आने वाली चट्टानों को किस तरह से रोका जाए, इसके लिए कोई समाधान नहीं है। पार्वती नदी के राइट साइड यानी गुरुद्वारा की तरफ की बात करें तो यहां भी डेढ़-दो वर्ष पहले विशालकाय चट्टान आने से पंजाब के श्रद्धालुओं की मौत हो गई है। गुरुद्वारा का हिस्सा टूट गया। यहां पर हादसोें को रोकने के लिए वैज्ञानिक सर्वे भी हुए, लेकिन आज दिन तक धरातल पर कुछ नहीं हो पाया है। पहाड़ी के नीचे बसे मणिकर्ण को भी भविष्य में खतरा बना हुआ है।

सरसाड़ी में सड़क पर हर  पल खतरा

मणिकर्ण-भुंतर मार्ग पर सरसाड़ी नामक जगह की बात करें तो यहां पर सड़क बिलकुल पहाड़ी के बीच से  होकर गुजरी हुई है। जब बारिश का दौर चलता तो अकसर यहां पर मलबा-पत्थर गिरते हैं। हैरानी की बात यह है कि यहां पर बीते वर्षों एक बड़ा दर्दनाक बस हादसा हुआ है। जिसमें 60 से अधिक लोग काल का ग्रास बने हुए हैं। यहां पर लोक निर्माण विभाग का कार्य देखें तो लीपापोती वाला ही होता रहता है।

लगघाटी में जान जोखिम में डालकर चलते हैं लोग

लगघाटी में सफर करना भी किसी जोखिम से कम नहीं है। हालांकि लोगों की सुविधा के लिए सड़क तो खोल दी गई है। लेकिन लोगों का सफर खौफनाक है। यहां पर थोड़ी सी बारिश में चट्टानें खिसकना शुरू होती हैं। यहां पर एक-दो ऐसे स्थान हैं कि जहां पर हर वक्त वाहन चालकों को भी डर रहता है,लेकिन इसके लिए भी विकल्प कोई नहीं है।

मलाणा में डरा रही है  खोखली पहाड़ी

मलाणा में पावर प्रोजेक्ट तो है, लेकिन यहां के लोगों ने पावर प्रोजेक्ट आने के बाद वाहन सुविधा का लाभ तो मान लिया होगा, लेकिन पहाड़ी इतनी खोखली हुई है कि कभी भी दरक सकती है। ऐसे में मलाणा के लोग भी हर दिन का सफर जोखिम में कर रहे हैं।

मनाली से रोहतांग का रास्ता भी  नहीं सुरक्षित

मनाली से रोहतांग तक का सफर जहां खतरनाक है,वहीं यहां पर कुछ क्षेत्रों में बहने वाले नालों के रास्तों पर भवन निर्माण हो जाने के बाद इन नालों का रास्ता भी बदल गया है। ऐसे में यह नाले कभी भी क्षेत्र में कहर बरपा देते हैं। बीआरओ ने रोहतांग मार्ग के सफर को सरल बनाने के लिए डबल लेन सड़क बनाने का कार्य कई सालों से शुरू कर रखा है। बीआरओ ने हालांकि पलचान, कोठी, गुलाबा सहित कुछ स्थानों में ब्लैक स्पॉट का समाधान किया है, लेकिन अभी भी कई ऐसे ब्लैक स्पॉट है जो बार-बार राहगीरों को अपना शिकार बना रहे हैं। मनाली से छह किमी दूर नेहरू कुंड मोड़ में दो ब्लैक स्पॉट हैं।रोहतांग के समीप चुबंक मोड़ में भी चार ब्लैक स्पॉट हैं। मढ़ी से ऊपर,पैराग्लाइडिंग प्वाइंट,बंता मोड़ के पास और राहनीनाला के दोनों साइड पर दो ब्लैक स्पॉट है। राक्षी ढांक और डोहरनी मोड़ भी ब्लैक स्पॉट में आते हैं। उक्त सभी स्थानों में गाडि़यां गिर चुकी हैं। नेहरू कुंड मोड़, राहनीनाला मोड़, राक्षी ढांक और डोहरनी मोड़ खतरनाक हैं।

गांवों के लोग अलर्ट, प्रशासन को करते हैं सचेत

मनाली के ग्रामीणों की बात करें तो प्राकृतिक आपदा के समय यह लोग खुद ही प्रशासन से तुरंत संपर्क साधते हैं और सही जानकारी प्रशासन को तुरंत मुहया करवाते हैं। लोगों का कहना है कि अगर वे प्रशासन को सूचना न दें,तो तब तक आपदा प्रभावित क्षेत्र में ज्यादा नुकसान हो सकता है। लोगों का कहना है कि प्रशासन द्वारा आपदा प्रबंधन पर लगाए जाने वाले शिविरों के माध्यम से ग्रामीणों को जागरूक किया जाता है, जिसका अब प्रशासन को रिजल्ट मिल रहा है।

तबाही का केंद्र बनता कुल्लू-मनाली

अपने सौंदर्यकरण के चलते विश्वभर में प्रसिद्ध पर्यटन नगरी कुल्लू-मनाली पर जितनी कुदरत मेहरबान रही है , आज वहीं कुल्लू-मनाली प्रकृति से छेड़छाड़ बर्दाश्त न होने के चलते तबाही का केंद्र बिंदु  बनता जा रहा है। 1995 में आई बाढ़ के बाद एक बार फिर कुल्लू-मनाली को बाढ़ का दंश झेलना पड़ा है। बाढ़ के कारण भले ही  कई रहे हों, लेकिन जिस तरह से इनसान आज प्रकृति से छेड़छाड़ कर  इसे खत्म करने में लगा है। यह उसी का ही नतीजा है कि  आज हल्की बारिश पर भू-स्खलन होना आम बात हो गई है। इंसान आज प्रकृति को अपने हिसाब से चला रहा है।  कुछ सालों में जिला कुल्लू-मनाली की तस्वीर विकास की राह पर चलते हुए जिस तरह से बदली है। आज उसी तस्वीर के बदलने पर यहां बाढ़ आना आम  हो गया है। जिलाभर में धड़ाधड़ बन रहे हाइडल प्रोजेक्ट के कारण से पहाड़ों का सीना छलनी किया जा रहा है और साथ ही ब्यास  व नदी-नालों पर हो रहे अवैध कब्जे के चलते बन रहे बड़े-बड़े भवन व होटलों से आज ब्यास  के रुख को बदलने की भी पूरी कोशिश की जा रही है,  नतीजा है कि आपदा के दौरान कुदरत इंसान को याद दिलाती है कि आखिर वह क्या कर रहा है।

जंगल भी नहीं बख्शे जल विद्युत परियोजनाओं का प्रकृति पर कहर

मनाली की अगर बात करें तो किसी समय चारों तरफ घने जंगलों से लबरेज दिखने वाली मनाली आज होटलों की बिल्डिंगों व निजी भवनों से घिरी दिखाई देती है। यहां करीब आधा दर्जन जल विद्युत परियोजनाओं ने जहां बिजली पैदा कर खूब चांदी कूटी है,वहीं घाटी के जंगलों को भी नहीं बक्शा है। क्षेत्र की एक बड़ी परियोजना प्रबंधन को अनुमति से जयादा पेड़ कटान मामले में करोड़ों रुपए का जुर्माना भी हो चुका है। इसी तरहा छोटी जल विद्युत परियोजनाओं ने भी जंगलों को अपना शिकार बनाने में काई कसर नहीं छोड़ी है। घाटी में हमटा, बांहग,पलचान, नग्गर, बड़ाग्रां, फोजल नाले पर जल विद्युत परियोजनाएं बिजली पैदा कर रही हैं, लेकिन जिस समय इन परियोजनाओं को स्थापीत किया गया है उस समय जंगलों में पेड़ों का कटान भी जोरों पर किया गया है। यही नहीं मनाली में वोल्वो बस स्टैंड से वैली ब्रिज तक बनाए जा रहे बाई पास सड़क की भेंट भी दर्जनों पेड़ चढ़े हैं। प्रशासन मनाली पर ट्रैफिक का जहां बोझ कम करने के लिए यहां बाई पास सड़क का निर्माण करवा रहा है, वहीं सड़क के निर्माण में दर्जनों पेड़ों का कटान किया गया है। ऐसे में मनाली में जहां जलविद्युत परियोजनाओं ने जंगलों के कटान में कोई कसर नहीं छोड़ी, वहीं सड़क निर्माण के कार्य में भी पेड़ों को कटा गया है। इसी तरह प्रशासन ने हाल ही में बशिष्ठ में बनाए अस्थायी हेलिपैड के लिए भी 200 से अधिक पेड़ों का कटान किया गया, लेकिन यह हेलिपैड भी ब्यास नदी की बाढ़ की भेंट चढ़ गया।

सिकुड़ने लगी देवताओं की घाटी में सड़कें

कुछ वर्षो से जिलाभर में प्रकृति से छेड़छाड़ होने से यहां खूबसूरती पर मानों ग्रहण लग गया है। हरे-भरे जंगलों को देखने के लिए आज लोगों को कोसों दूर जाना पड़ता है।  शहर की सुंदरता अब खत्म हो चुकी है और कंकरीट में बदल चुकी है। जिस शहर में कभी काठकुणी शैली के मकान हुआ करते थे, वे  विलुप्त हो चुके हैं। शहर में लोगों को जहां आज वाहनों को खड़ा करने के लिए पार्किंग की दिक्कत आती है। वहीं पैदल चलने वालों के लिए भी सड़क महज गली बनकर रह गई है। विकास के नाम पर अवैध कब्जों के चलते आज शहर की सड़कें सिकुड़ने लगी हैं।

मनाली ने 23 साल बाद फिर सहा बाढ़ का दंश

मनाली में जहां जंगलों से छेड़छाड़ की गई है, वहीं यहां शहर के साथ-साथ गांवों में भी बिल्डिंगों का निर्माण किया गया है। ऐसे में घाटी के कुछ क्षेत्रों में तो नालों के रास्तों पर ही भवनों का निर्माण किया गया है। लगातार प्रशासन के आदेशो की धज्जियां उड़ाने वाले इन कुछ लोगों को इसकी किमत इस बार जाते मानसून में चुकानी पड़ी है। कुछ ने होटलों का निर्माण नदी किनारे कर रखा है, तो कुछ ने नालों पर दूकाने या रेस्तरां बना रखे हैं। यही नहीं बांहग की तरफ पर नलों के रास्तों पर कई लगह अवैध कब्जा कर रखा है। प्रशासन ने भी इन लोगों को जहां नोटिस थाम डाले हैं, वहीं इस बार सितंबर माह के अंतिम दौर में आसमान से बरसी आफत ने यहां इतनी तबाही मचाई कि लोगों को 1995 का मंजर याद आ गया।1995 में भी ब्यास नदी की बाढ़ ने मनाली को कई साल पिछे पहुंचा दिया था और करोड़ों रुपए की संपत्ति को पानी में बहा डाला था, वहीं इस बार भी कुछ ऐसे ही देखने को मिला। मात्र तीन दिन की बारिश से जहां ब्यास नदी में बाढ़ आ गई वहीं, घाटी के नदी नाले भी उफान पर बहने लगे। ऐसे में होटलों , रिहायशी मकानों में जहां पानी घुस गया, वहीं आपदा प्रबंधन की भी पोल खोल कर रख दी। स्थानीय विधायक एवं वन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर का कहना है कि इस बार बाढ़ के कारण मनाली में ही 200 करोड़ का नुकसान हुआ है। उनका कहना है कि ऐसी बाढ़ 1995 में मनाली में आई थी और उस समय भी करोड़ों की संपत्ति ब्यास की बाढ़ की भेंट चढ़ गई थी।

डेंजरेस जोन…. फिर भी सरकारें-इनसान खामोश

कुल्लू-मनाली से लेकर हनोगी मंदिर तक  अधिकतर हाई-वे पहाड़ी के नीचे ही बने हैं। भले ही सैलानियों को सफर करते हुए एक अदभुत नजारा देखने को मिलता हों, लेकिन इसका खामियाजा आपदा के दौरान स्थानीय लोगों को ज्यादा भुगतना पड़ता है। हनोगी के पास सड़क के ठीक ऊपर पहाड़ी है। जहां पर कई बार बसों व ट्रकों की छतों पर रखा सामान पहाड़ छूने लगता है। पानी का बहाव गर्मियों में भी सड़क पर आ जाता है। आपदा के दौरान सरकार को भी करोड़ों का नुकसान झेलना पड़ता है और फिर से नए सिरे से सड़कों, भवनों इत्यादि को तैयार करना पड़ता है, लेकिन फिर कई सालों बाद फिर वैसा ही दंश झेलना पड़ता है। अगर सरकार प्लानिंग के साथ सड़कों का जाल पहाड़ी इलाकों में बिछाए तो आपदा के दौरान कभी भी किसी तरह के नुकसान की गुंजाइश शायद न रहे।

यहां है खतरा

हनोगी मंदिर से लेकर पनारसा तक कई गांव ब्यास के किनारे बसे हैं। बहाव बढ़ने पर पानी कई घरों को छू जाता है।  झीड़ी, दुआड़ा, गैमन पुल, वैष्णों मंदिर, सेऊबाग पुल के समीप, रायसन कैपिंग साइट, कैट फैक्टरी के साथ लगती पहाड़ी, क्लाथ, पतलीकूहल पुल के साथ लगती पहाड़ी आदि नदी से सटे हैं।

ब्यास से सटे गांव

ब्यास नदी के साथ लगते कई गांव व कुल्लू शहर का रामशिला, अखाड़ा बाजार, भुंतर बाजार, हाथीथान, रायसन गांव, रायसन बिहाल, नेचर पार्क ववेली, माहौल, पिरड़ी, भुंतर एयरपोर्ट, पार्वती नदी के साथ मणिकर्ण घाटी, कसोल, कलाथ, पतलीकूहल गांव के साथ कई बड़े नेताओं के होटल बने हुए हैं।

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