क्षमता से कितना बाहर मकलोडगंज

बौद्ध नगरी और विश्व विख्यात पर्यटन स्थल मकलोडगंज की खूबसूरती को अवैध निर्माण ने ग्रहण लगा दिया है। सैलानियों की बढ़ती आमद के दबाव में व्यवसायियों ने देवदार से लकदक इस खूबसूरत क्षेत्र को कंकरीट का जंगल बना दिया है। न कोई प्लानिंग , न सांस लेने के लिए कोई छिद्र।आज यह क्षेत्र अपनी बिगड़ती सूरत पर चीख रहा है। क्या है, सूरत-ए-हाल बता रहे हैं.. नरेन कुमार और नितिन राव  

स्मार्ट सिटी धर्मशाला का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल मकलोडगंज पूरी तरह से अपनी क्षमता से बाहर ही चल रहा है। पर्यटन सीजन के अलावा वर्ष के 12 माह में देश-विदेश के पर्यटकों के आने का सिलसिला लगातार जारी रहता है। मकलोडगंज की अंधोसंरचना निर्माण को नगर परिषद धर्मशाला का ब्रिटिशकालीन समय में गठन होने के बावजूद शहरी तरीके से विकसित नहीं किया जा सका। वर्ष 1905 में भूकंप होने के कारण अधिकतर शहर को डिपो बाजार धर्मशाला में बसाया गया, जिसके कारण शहर का मुख्य केंद्र धर्मशाला का ही शहर रहा,जबकि मकलोडगंज, भागसूनाग, नड्डी और धर्मकोट को खुला छोड़ दिया गया। इस दौरान मकलोडगंज में दलाईलामा के निवास स्थान होने के साथ-साथ पर्यटकों के भारी मात्रा में पहुंचने के सिलसिले ने रफ्तार पकड़ ली। लोगों ने अपने घरों और शुरुआती छोटे-छोटे होटलों में बिना प्लानिंग नक्शे और अप्रूवल के बिना ही भवनों को धीरे-धीरे बढ़ाना शुरू किया। पर्यटकों की आमद को देखते हुए व्यवस्थित तरीके से बसाने की बजाय लोगों ने अंधाधुंध तरीके से निर्माण कार्य करना शुरू कर दिया। लोगों ने देश-विदेश के पर्यटकों को देखते हुए अपने स्तर पर ही बिना नक्शों के प्रकृति को प्रभावित करके होटल, रेस्तरां, दुकानें और होम स्टे तक बनाने शुरू कर दिए। इसके अलावा तिब्बतियन शरणार्थियों की बड़ी-बड़ी कालोनियां भी बनना शुरू हो गईं। इतना ही नहीं, उक्त कार्याें के लिए बड़े स्तर पर पेड़-पौधों को भी बलि चढ़ाई गई और आज हालात ऐसे हैं कि बात चाहे गाडि़यों की हो या जनसंख्या की हो, मकलोडगंज क्षमता से अधिक भार ढो रहा है।

मास्टर प्लान तैयार

धर्मशाला शहर का मास्टर प्लान तैयार कर लिया गया है।  निगम को  निर्देश जारी कर प्लान के तहत शहर को विकसित किया जाएगा।  संबंधित विभागों के साथ मिलकर समय-समय पर कार्य किया जा रहा है

संदीप कुमार; उपायुक्त, कांगड़ा

 टूरिज्म स्कीम नहीं बन पाई

 जनता  सहभागिता के बिना कार्य किए जाने से आज पर्यटक स्थलों को तहस-नहस कर दिया गया है । यहीं नहीं, सही तरीके से टूरिज्म स्कीम ही नहीं बन पाई है।   पार्किंग और ट्रैफिक कंट्रोल प्लान नहीं बन पाया है। सड़कें उखड़ रही हैं, बिजली-पानी बंद किया जा रहा है। शहर में कारोबारियों को भी पंजीकृत कर सही तरीके से व्यवस्था चलाने की जरूरत है

 प्रेम सागर, कारोबारी

कोरी घोषणाएं ही हुईं

ब्रिटिशकाल के दौरान धर्मशाला शहर को व्यवस्थित तरीके से बसाया गया था, लेकिन इसके बाद लोगों  ने पर्यटकों की संख्या को देखते हुए अधिक मुनाफा कमाने के लिए अंधाधुंध निर्माण प्रकृति से खिलवाड़ करके किया है। पुराने रास्तों, नड्डी, डल झील और सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने की बजाय मात्र कोरी घोषणाएं ही हुई हैं

नरेंद्र बड़ाण; महासचिव, मैट्रो हार्न सोसायटी धर्मकोट, मकलोडगंज

नए पर्यटक स्थलों को जोड़ें

बिना प्लानिंग से शहर को बसाने में अनियमितताएं भी बरती गई हैं।  पर्यावरण, हरियाली और पेड़-पौधों को भी नुकसान पहुंचाया गया है। अब इसमें सुधार कर बंद वैकल्पिक मार्गों को खोलकर, व्यवस्थतित तरीके से निर्माण कर और नए पर्यटक स्थलों को जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।  मकलोडगंज में  बेहतरीन से बेहतरीन होटल हैं, जो पर्यटकों को सभी सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं

दिनेश कपूर; उपाध्यक्ष, होटल एसोसिएशन अप्पर धर्मशाला मकलोडगंज

एनजीटी ने उठाए ये प्रश्न

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने मकलोडगंज के बेतरतीब निर्माण और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के कार्याें को देखते हुए शिकंजा कसना शुरू किया है। इसके तहत नियमों को ताक पर रखकर चलने वाले 182 होटलों पर कार्रवाई करते हुए बिजली-पानी और सीवरेज के कनेक्शन भी काट दिए गए हैं। एनजीटी ने मकलोडगंज में बेतरतीब निर्माण कार्य, असुरक्षित बड़े-बड़े भवन, पेड़-पौधों को नुकसान, पार्किंग की उचित व्यवस्था न होना और कैरिंग क्षमता पर मुख्य रूप से प्रश्न उठाए हैं।

150 होटल किए बंद

धर्मशाला और मकलोडगंज में नियमों के विपरीत चलने वाले 182 के करीब होटलों के बिजली-पानी और सीवरेज को बंद कर दिया गया है। इतने बड़े स्तर पर हुई कार्रवाई से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह नियमों की अनदेखी करके होटल कारोबार किया जा रहा है। हालांकि उक्त होटलों में से 30 के करीब होटलों को औपचारिक्ताएं पूरी करने पर शुरू कर दिया गया है। जबकि 150 होटलों के बिजली-पानी और सीवरेज कनेक्शन अभी भी बंद पड़े हुए हैं।

ट्रैकिंग साइट त्रियूंड लगी उजड़ने

पर्यटकों के अधिक बोझ के कारण अब विश्व प्रसिद्ध ट्रैकिंग साइट त्रियूंड भी उजड़ने की कगार पर पहुंच गई है। त्रियूंड  की हरियाली और हरे-भरे घास की बजाय पर्यटक सीजन में मात्र धूल ही उड़ती हुई नजर आती है। सीजन के दौरान त्रियूंड में दो से अढ़ाई हज़ार तक पर्यटक पहुंचते हैं। इस दौरान अवैध रूप से लगने वाले टैंट और दुकानें भी हरियाली को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जिन स्थानों में बर्फ और प्राकृतिक जल स्रोत थे, वहां पर कूड़ा-कचरा और प्लास्टिक नजर आता है।

150 को पार्किंग, पांच हजार गाडि़यां

मकलोडगंज में मौजूदा समय में सरकार और निगम की तरफ से मात्र 150 वाहनों की पार्किंग की व्यवस्था है,जबकि पर्यटक सीजन में तीन से पांच हजार तक रोजाना वाहन भी मकलोडगंज में पहुंचते हैं। मकलोडगंज में भागसूनाग रोड, मकलोडगंज नौरोजी चौक, भागसूनाग मल्टी स्टोरी पार्किंग और मकलोडगंज में दो पार्किंग की आवश्यकता है। उक्त पार्किंग बनाए जाने के लिए नगर निगम धर्मशाला और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में प्रोपोजल बनाए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक पार्किंग  नहीं बन पाई है।

घोषणाएं नहीं चढ़ीं सिरे

पर्यटन एवं बौद्ध नगरी मकलोडगंज को सौंदर्यीकरण और सुधार किए जाने के लिए सरकार, प्रशासन और विभाग द्वारा कई घोषणाएं की गई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पर्यटन को विकसित किए जाने की योजनाएं शुरू ही नहीं हो पाती हैं,जिसके कारण अब बौद्ध नगरी में पर्यटक और पर्यटन दम तोड़ता हुआ नजर आता है।

दलाईलामा के आने से बनी बौद्ध नगरी

तिब्बती धर्मगुरु एवं विश्व शांति नोबेल पुरस्कार विजेता दलाईलामा ने मकलोडगंज को अपना घर बनाया है। इसके चलते ही विदेशी पर्यटकों का हर वर्ष लाखों की संख्या में पहुंचने का सिलसिला मकलोडगंज में शुरू हुआ। ऐसे में हर वर्ष देश-विदेश से आने वाले लोगों पर्यटकों की भीड़ को शहर सह नहीं पा रहा है। विदेश से आने वाले पर्यटकों की सुविधा के लिए हर गली-कोने और नाले को बंद करके भी अंधाधुंध होटल निर्माण किया गया। मकलोडगंज के हर क्षेत्र जिसमें मुख्य चौक, भागसूनाग, धर्मकोट, नड्डी, तोतारानी, सतोवरी, हीरू, दलाईलामा रोड सहित हर क्षेत्र में  बेतरतीब निर्माण कार्य हुआ, जिसके कारण क्षेत्र की पर्यटकों को लुभाने वाली खूबसूरत वादियां भी तबाह हो गईं। क्षेत्र में सरकारी भवनों के नाम पर मात्र कुछेक गिने-चुने भवन ही नज़र आते हैं, लेकिन मकलोडगंज में होटलों के निर्माण ने अब मात्र कंकरीट का जंगल बना दिया है।  पर्यटक प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने की बजाय मात्र भीड़भाड़ भरे क्षेत्र में घूमते नजर आते हैं।

तो यूं निखेरेगी स्मार्ट सिटी

विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल मकलोडगंज को टूरिज्म इंडस्ट्री के रूप में विकसित किए जाने के लिए कई योजनाएं बनाई गई हैं। इनमें स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत मकलोडगंज चौक की री-डिवेलपमेंट, अंतरराष्ट्रीय स्तर का कम्युनिटी ओडिटोरियम, धर्मशाला-मकलोडगंज रोप-वे, मकलोडगंज में दो मल्टी स्टोरी पार्किंग, भागसूनाग में मल्टी स्टोरी पार्किंग और बंद पड़े हुए वैकल्पिक मार्गाें को खोलने का प्लान बनाया गया है। इसके अलावा भागसूनाग वाटर फॉल के तहत आने वाले एरिया में पार्क बनाए जाने की भी योजना बनाई गई है। इसके साथ ही ग्रीन ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट के निर्णय के बाद निर्माण कार्यों को भी व्यवस्थित तरीके से करवाया जा रहा है। इसमें क्षेत्र में होटलों, रेस्तरां सहित अन्य भवनों के लिए भी पार्किंग बनाई जा रही है।

कंकरीट के बोझ तले धंसने लगी जमीन

मकलोड़गंज के दलाईलामा टेंपल, कालापुल, गमरू, खजांची मोहल्ला, कश्मीर हाउस से लेकर चरान खड्ड तक के क्षेत्र कंकरीट के बोझ तले दब चुके हैं। उक्त क्षेत्रों में बढ़ते हुए निर्माण कार्य के कारण अब लगातार जमीन धंसने से भौगोलिक स्थिति में भी बड़ा परिवर्तन आ रहा है। चार वर्ष पूर्व टीहरा लाइन कैंट में बहुत बड़े क्षेत्र की जमीन पूरी तरह से धंस गई, जिसके कारण आर्मी के दर्जनों क्वार्टर उसकी जद में आने के साथ-साथ दो दर्जन के करीब परिवारों को पलायन करने के लिए भी मजबूर होना पड़ा। ऐसा ही हाल अन्य क्षेत्रों में भी लगातार आने वाले ल्हासों और जमीन खिसकने के मामलों में सामने आता रहा है। आने वाले समय में भूकंप जोन-पांच क्षेत्र में हल्का सा भी भूकंप का झटका बड़ी तबाही ला सकता है।

आधा दर्जन सड़क मार्ग खुलने से सुधरेंगे हालात

पर्यटन नगरी धर्मशाला-मकलोडगंज में आधा दर्जन से अधिक वैकल्पिक सड़क मार्ग खोलने से ट्रैफिक जाम का बोझ कम किया जा सकेगा। इतना ही नहीं सड़क मार्गों को सुचारू रूप से चलाने से धर्मशाला के अन्य महत्त्वपूर्ण पर्यटक स्थलों को जोड़ने में भी अहम भूमिका हो सकती है। धर्मशाला के इदं्रुनाग-चोहला और भागसूनाग सड़क मार्ग अब तक अधूरा पड़ा है। इसके अलावा नड्डी-सतोवरी से करेरी सड़क मार्ग भी अधर में लटका है। उक्त मार्ग के जुड़ने से मकलोडगंज से ट्रैफिक का बोझ कम होने के साथ ही नए पर्यटक स्थल करेरी, इंद्रुनाग, अंघजर महादेव, खनियारा, श्री चांमुडा, खड़ौता और ठठारना में पर्यटकों को जाने का आसानी से मौका मिलेगा।  इसके अलावा मकलोडगंज में ही कैंट-धर्मकोट-भागसूनाग रोड, नड्डी डल झील से धर्मकोट रोड, भागसूनाग-हीरू और जोगीबाड़ा रोड, दुसालिनी से करमू मोड़ सड़क मार्ग, ऊपरला कालापुल से दलाईलामा मंदिर रोड, जो अब तक बंद पड़े हैं। उक्त मार्गाें के बहाल होने से ट्रैफिक व्यवस्था में काफी अधिक सुधार हो सकता है।

अवैध निर्माण ने खोखला किया ‘टियालू’

पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला के पर्यटक स्थल मकलोडगंज को 200 से 250 वर्ष पहले टियालू नाम से जाना जाता था, जो कि चंबा-भरमौर के राहगीरों और भेड़पालकों का मुख्य जंक्शन हुआ करता था। धौलाधार के इंद्रहार पास से कांगड़ा से चंबा पहुंचने वाले लोग आज के आधुनिक मकलोडगंज में आराम करते थे, और यहीं से सफर का सिलसिला शुरू होता था। इसके बाद ब्रिटिशकाल के दौरान अंगे्रजों ने मकलोडगंज को राजधानी बनाए जाने का प्रयास किया था, लेकिन भूकंप जोन की संभावना को देखते हुए इस विचार को रद्द कर दिया गया था। मकलोडगंज में वर्ष 1853 गोरखा रेजिमेंट की बटालियन को भेजा गया, जिसके चलते बहुत से क्षेत्र को रिजर्व फोरेस्ट भी घोषित किया गया, जिससे मकलोडगंज में रहने वाले लोगों का नई जगह में भी पलायन हुआ, जिससे क्षेत्र बहुत अधिक बढ़ गया। इसके बाद 1959 में तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा शरणार्थी के रूप में मकलोडगंज में पहुंचे। दलाईलामा ने मकलोडगंज के स्वर्ण आश्रम में अपना अस्थायी निवास स्थान बनाया। उसी समय से ही मकलोडगंज में चद्दरों के खोखे बनने का सिलसिला शुरू हुआ, जो कि बड़े-बड़े भवनों में तबदील हो गया। इस दौरान देश-विदेश के पर्यटकों के आने का सिलसिला धीरे-धीरे शुरू हो गया।  बेतरतीब तरीके से हुए निर्माण और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के कारण अब पूरी तरह से खोखला हो चुका है। जो कि कांगड़ा भूकंप जोन-पांच में आने से कभी भी बड़ी आपदा को न्योता दे सकता है।  1985 के बाद कश्मीर में भी आतंकवादी घटनाएं शुरू होने के बाद मकलोडगंज में पर्यटकों का हुजूम बड़ी मात्रा में उमड़ना शुरू हो गया। इस समय ही विश्व प्रसिद्ध ट्रैकिंग साइट त्रियूंड में भी देश-विदेश के पर्यटक ट्रैकिंग के लिए पहुंचना शुरू हुए। वर्ष 1992 में रिकार्ड तोड़ पर्यटकों ने धर्मशाला-मकलोड़गंज का भ्रमण किया। जिसके बाद से चलने वाला सिलसिला अब तक लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस दौरान ही पर्यटकों की बाढ़ आ जाने से बेतरतीब तरीके से निर्माण कार्य बड़े स्तर पर शुरू हो गए। इतना ही नहीं होटलों के साथ-साथ घरों को भी देश-विदेश के पर्यटकों के लिए प्रयोग में लाए जाने का सिलसिला शुरू हो गया, जिससे आज के समय में धौलाधार को आंचल में बसा हरा-भरा मकलोडगंज कंकरीट के बोझ तले  दबकर रह गया है, जिस पर अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को भी बड़ा हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

मकलोडगंज की चुनौतियां

नशे की खपत

पर्यटन नगरी मकलोडगंज में भारी मात्रा से नशे के कारोबार होता है और यह अभी से शुरु नहीं हुआ है। यह अवैध कारोबार कई दशकों से चल रहा है। इस नगरी में देश व दुनिया का सबसे महंगा नशा भी खुलेआम बिक रहा है। प्रशासन की पकड़ में यदि कोई केस आता भी है तो वह फाइलों में लैबोरेटरी में दफन होकर रह जा रहा है। नशे के कारोबारी शासन से लेकर प्रशासन तक को पैसे के दम पर चुप्पी साधने को मजबूर कर रहे हैं।

देह व्यापार

मकलोडगंज को  धर्मगुरु दलाईलामा की नगरी कहा जाता है, लेकिन इस नगरी में भारी संख्या में देशी व विदेशी पर्यटक पहुंचता है। पर्यटकों के लिए बाहरी राज्यों से विभिन्न नेटवर्क के जरिए खुलेआम देह व्यापार किया जा रहा है। इस देह व्यापार में स्थानीय व पहुंच रखने वाले लोगों का भी हाथ है। इस काम को करने के लिए आनलाइन वेबसाइटें भी तैयार की गई हैं।

ट्रैफिक मैनेजमेंट

पर्यटन नगरी के ट्रैफिक को कंट्रोल करने को प्रशासन पूरी तरह से फेल हो रहा है। ग्रीष्म ऋतु में मकलोडगंज में सालभर के सर्वाधिक पर्यटक पहुंचते हैं, उस दौरान मकलोडगंज में करीब दो से तीन घंटे जाम लगना आम बात हैं। अढ़ाई किलोमीटर का सफर तय करने के लिए दो घंटे से अधिक समय लगता है। इतना ही नहीं पर्यटन नगरी को देखने पहुंचे पर्यटक कई बार रास्ते से ही जाम की वजह से वापस हो जाते हैं। इस समस्या के कारण मकलोडगंज के पर्यटन में भी गिरावट आ सकती हैं।

बाहरी कारोबारी कर रहे बदनाम 

मकलोडगंज में बाहरी राज्यों के कारोबरी पर्यटन को बदनाम कर रहे हैं। इन्होंने यहां स्थानीय लोगों से अत्यधिक महंगे किराए पर दुकानें ले रखी हैं। ये दुकानदार पर्यटकों को झूठ बोलकर दिल्ली व लुधियाना में बना  सामान हिमाचली ब्रांडों के नाम पर बेच देते हैं। हिमाचली ब्रांड बताकर ये कारोबारी 500 रुपए की चीज को पांच हजार रुपए में भी बेच देते हैं। जो कि सीधे तौर पर ग्राहक के साथ धोखा किया जा रहा है। अपने राज्य लौटकर जब ग्राहक पर्यटन नगरी में खरीदी हुई चीजों को इस्तेमाल करता है तो वह सामान्य वस्तु पाकर अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है। जिससे उसके मन में बाहरी राज्यों के कारोबारी नहीं, लेकिन पर्यटन नगरी के खिलाफ अवधारणा आ जाती है, लेकिन प्रशासन इस समस्या पर भी रोक लगाने में असर्मथ है, हालांकि कई बार पर्यटक शिकायत भी करते हैं, लेकिन आपसी समझौता करवाकर पर्यटकों की आवाज को दबा दिया जाता है।

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