सितमगर कुदरत

हिमाचल में मानसून हर साल कहर बनकर बरप रहा है। प्रदेश को बरसात से करोड़ों का नुकसान हो रहा है। कहीं अवैध खनन तो कहीं बिजली परियोजनाओं के लिए जारी ब्लास्टिंग से पहाड़ खोखले हो रहे हैं । पर्यावरण से की जा रही यही छेड़छाड़ घातक सिद्ध हो रही है। नदी-नालों का रुख मोड़ कर इनसान खुद खतरे को दावत दे रहा है.. इन्हीं सब बिंदुओं को दखल के जरिए पेश कर रहे हैं…

 नदियों और खड्डों ने पहाड़ का सीना छलनी कर दिया है। लगातार हो रहा प्रोजेक्टों का निर्माण यहां ईको सिस्टम को खासा नुकसान पहुंचा रहा है। हालांकि पर्यावरण संरक्षण के लिए कई तरह की शर्तें लागू हैं परंतु इन शर्तों का सही तरह से अमल नहीं हो पा रहा है। पहाड़ में बिजली उत्पादन की क्षमता बहुत अधिक है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि जितना उत्पादन अभी हो रहा है, उसने ही पहाड़ों की हालत खस्ता कर दी है।

आने वाले समय में जो उत्पादन यहां पर प्रस्तावित है उसके बाद यहां के पर्यावरणीय परिवेश का क्या होगा ये गंभीरता से सोचने की बात है। हिमाचल प्रदेश में 27 हजार मैगावाट क्षमता से अधिक बिजली उत्पादन की संभावनाएं देखी गई हैं। इसमें से 20 हजार मेगावाट के प्रोजेक्ट आबंटित हो चुके है। 10 हजार मेगावाट का उत्पादन हो रहा है और शेष पर काम चल रहा है। करीब 5500 मेगावाट क्षमता के प्रोजेक्ट क्लीयरेंस की स्टेड पर हैं और शेष पर काम चल रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी। जिस तरह से राज्य में भारी बारिश ने तांडव मचाया है, उसने एक पक्ष ये भी है कि यहां का पर्यावरणीय संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है। कंकरीट का जंगल खड़ा होने से बेहद दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं वहीं बिजली प्रोजेक्टों का भी इसमें पूरा योगदान है। हिमाचल प्रदेश में किन्नौर, चंबा, कुल्लू, शिमला जिलों में बिजली परियोजनाएं हैं। चंबा जिला में  बरसात ने तबाही मचाई।

बताते हैं कि आने वाले समय में 2 हजार मेगावाट क्षमता से अधिक के प्रोजेक्ट चंबा जिला में ही प्रस्तावित हैं। प्रदेश के कुल्लू जिला में ब्यास नदी पर भी कुछ परियोजनाएं बनी हुई हैं, जिसने भी वहां के ईको सिस्टम को बदल दिया है।   यही कारण है कि केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने कई तरह की शर्तें यहां रखी हैं और उन्हीं शर्तों को पूरा नहीं कर पाने वाले प्रोजेक्टों को मंजूरी नहीं मिल पा रही है।

यहां पर प्रोजेक्टों को उतनी ही जमीन पर पर वनीकरण करना जरूरी है, जितने में प्रोजेक्ट लग रहे हैं। इतनी जमीन यहां नहीं मिल पा रही जिसकी शर्त में भी अब केंद्र ने कुछ छूट हिमाचल को प्रदान कर दी है।

यहां पर अभी 5500 मेगावाट के प्रोजेक्ट पाइपलाइन में हैं। इनमें से 1500 मेगावाट क्षमता के सरकारी प्रोजेक्ट हैं, वहीं 4 हजार मेगावाट के करीब निजी क्षेत्र की परियोजनाएं हैं,  जिनको अभी तक मंजूरी का इंतजार है। ये क्षमता यहां पर तैयार होती है तो हिमाचल के पहाड़ों की हालत और खराब हो जाएगी।

1450 करोड़ का नुकसान

प्रदेश में बरसात के दौरान 1450 करोड़ का नुकसान हो चुका है। इसमें सबसे अधिक नुकसान पीडब्ल्यूडी को हुआ है। पीडब्ल्यूडी को 929 करोड़ से ज्यादा की चपत लग चुकी है। इसके अलावा आईपीएच को 391 करोड़ की, कृषि को 79 करोड़ 55 लाख, पावर को 24 करोड़, बागबानी को 9 करोड़ का नुकसान हो चुका है।

66 घर ढहे, 285 ध्वस्त

मानसून के दौरान अब तक 66 पक्के मकान पूरी तरह से जमींदोज हो चुके हैं। 285 कच्चे मकान भी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हुए हैं। 362 पक्के और 1840 कच्चे भवनों को आंशिक नुकसान पहुंचा है और 1585 काऊ शैड भी मूसलाधार बारिश से जमींदोज हुए हैं।

30 करोड़ की घोषणा

मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर चार दिन पूर्व कुल्लू-मनाली में बाढ़ से हुए नुकसान का आंकलन करने के लिए भुंतर आए थे। इस दौरान मुख्यमंत्री ने नुकसान की भरपाई के लिए 30 करोेड़ रुपए की घोषणा भी की है और आगामी सहायता का भी  प्रशासन के साथ-साथ लोगों से आह्वान किया है।

अवैध खनन चुनौती

ब्यास नदी में तबाही का कारण अवैध खनन है। खनन को रोकना आसान काम नहीं रह गया है।  कोर्ट का डंडा कुछ दिन पड़ता है तो प्रशासन अलर्ट होता है और कुछ दिन ही खनन माफिया पर शिकंजा कसते हुए देखा जाता है। जब विभाग पर राजनेता हावी होते हैं तो विभाग कार्रवाई से पीछे हटता है और फिर माफिया सक्रिय होते हैं। फिलहाल खनन माफिया को रोक पानी बड़ी चुनौती है।

विकास के नाम पर विनाश लीला

हिमाचल में विकास के नाम पर विनाश की लीला रची जा रही है। अनियोजित विकास और अनियंत्रित निर्माण अब मानव पर ही भारी पड़ने लगा है। प्रदेश में विकास के नाम पर पहाड़ों का सीना छलनी किया जा रहा है। प्रदेश में विकास प्लानिंग से नहीं हो रहा है। जगह-जगह गगनचुंबी इमारतें खड़ी कर दी गई हैं। नदी-नालों में अवैध खनन हो रहा है। प्रकृति से इस तरह की छेड़छाड़ ने मौसम का स्वरूप ही बदल दिया है। प्रकृति से हो रही भारी छेड़छाड़ के चलते ही आज गर्मियों में सूरज आग उगल रहा है और बरसात में पिछले कुछ वर्षों के दौरान मूसलाधार बारिश कहर बरपा रही है। हालांकि बरसात के दौरान मूसलाधार बारिश होने के पीछे विशेषज्ञ बंगाल की खाड़ी के निचले क्षेत्रों में दबाव पड़ने के चलते मानसून के रौद्र और अचानक मूसलाधार बारिश होने को कारण मान रहे हैं। मगर प्रकृति से छेड़छाड़ को भी विशेषज्ञ नहीं नकार रहे हैं।

बेतरतीब निर्माण बन रहा जान का दुश्मन

हिमाचल में प्रकृति के खिलाफ मानव काम कर रहा है। भवन निर्माण के नियमों को ताक पर रखकर बड़ी इमारतें खड़ी की जा रही है, जो कि विनाश को दावत दे रही है। शहरी इलाकों में भवनों के निर्माण के लिए टीसीपी विभाग द्वारा नियम बनाए गए हैं,  लेकिन  नियमों की हवा निकाली जा रही है। हाल ही में एनजीटी ने भी शिमला में 35 डिग्री से अधिक ढलान पर भवनों के निर्माण पर रोक लगाई है, लेकिन इसका भी भवन मालिक विरोध कर रहे हैं। इस फैसले से पहले भी शिमला शहर व अन्य जगहों पर 90 डिग्री तक की ढलान में भवन बना दिए गए हैं। जाहिर है कि  भारी बारिश के दौरान अबकी बार शिमला सहित कई जगह पर भवनों को खतरा पैदा हो गया है।   हिमाचल में सतलुज, ब्यास जैसी बड़ी नदियों के किनारे घर, होटल व अन्य प्रतिष्ठान  बना दिए गए हैं। सतलुज नदी में भी पहले भी कई बार बाढ़ आकर कई घरों को बहा ले गई है, लेकिन इससे भी लोगों ने सबक नहीं लिया है।

25 साल बाद फिर मनाली में तबाही

कुल्लू में यूं बरपा कहर

 ट्रक यूनियन तबाह, ट्रक, कार, बाइक बहे

 कैंपिंग साइट, पर्यटन निगम के होटलों को नुकसान, नेचर पार्क, अखाड़ा बाजार, भुंतर,लंका बेकर, राम शिला,वबेली, रायसन, डोभी विहाल, पतलीकूहल, हाथीथान  जगमग्न

  जिला की 90 फीसदी सड़कें तबाह

  एनएच व फोरलेन को भारी नुकसान

 ववेली नेचर व माहौल नेचर पार्क में लाखों का नुकसान

 लुगड़भट्टी में 400 सौ मीटर सड़क का नामोनिशान खत्म

 ढालपुर स्कूल की ढही सुरक्षा दीवार।

 शास्त्री नगर में भू-स्खलन की चपेट में आया घर

  अखाड़ा बाजार में नगर परिषद कार्यालय में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र में भू-स्खलन की चपेट में

 एचआरटीसी की वर्कशॉप की दीवार चढ़ी ब्यास की भेंट

 भुंतर वैली ब्रिज हुआ ध्वस्त

 लगघाटी में सड़कें क्षतिग्रस्त

 मणिकर्ण घाटी में चट्टान ने दबी गाडि़यां

पच्चीस साल पहले मची भारी तबाही का मंजर भले ही लोग भूल गए हो, लेकिन जिस तरह से सितंबर माह में तीन दिनों में भारी नुकसान बाढ़ के कारण से झेलना पड़ा है। इस मंजर को कुल्लूवासी 25 साल पहले वर्ष 1995 में आई बाढ़ से भी भयानक मान रहे हैं।  बारिश व ब्यास नदी में आई बाढ़ से सबसे अधिक सड़कों व पुलों को क्षति पहुंची है। जहां पर लोगों का संपर्क एक-दूसरे से न केवल कटा है, बल्कि आने-जाने के लिए भी अब लोगों को भारी माथापच्ची करनी पड़ रही है। नेशनल हाई-वे में जगह-जगह पर कई किलोमीटर सड़कों के टूटने से मनाली जाने के लिए संपर्क कट गया है। साथ ही वामतट मार्ग से होकर जाने वाले रास्ते भी हर जगह से टूटे हुए हैं। कुल्लू के साथ लगते लुगढभट्टी के पास भी करीब डेड़ किलोमीटर तक सड़क पूरी तरह से पानी में बह गई है। इसी के साथ रायसन के पास भी सड़क के टूट जाने से यहां नए सड़क निर्माण की जरूरत है। हालांकि यहां पर पहाड़ी हर मौसम में जरूर ढह जाती है, जिसका कोई समाधान अगर आगे के लिए पहले ही सरकार ने नहीं किया तो आने वाले बारिश व बर्फबारी में यहां हमेशा इस रास्ते पर दिक्कत पेश आती रहेगी।   अनेकों गांव जिलाभर में ऐसे भी हैं, जहां पर लोगों को पीने का पानी मिल नहीं पा रहा है। लोगों को घरों से कई मीलों दूर जाकर पानी पीठ या फिर गाड़ी में लाना पड़ रहा है। पीने का साफ पानी न मिलने पर लोग घरों में पानी को उबाल कर पीने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं, भुंतर वैली ब्रिज के भी कमजोर हो जाने के चलते यहां स्थानीय लोगों सहित मणिकर्ण साहिब घूमने जाने वाले सैलानियों को भारी परेशानी से होकर गुजरना पड़ रहा है। भुंतर वैली ब्रिज 1995 के दौरान बनाया गया था, जो कि एलायन दुहांगन परियोजना के काम के चलते भारी भरकम मशीन लेकर जा रहे ट्रक के कारण से टूट गया था।

पर्यटन कारोबार पर भारी पड़ी बाढ़

जिला टूरिज्म अधिकारी भाग चंद नेगी कहते हैं कि बारिश की वजह से सड़कों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इस वजह से टूरिज्म सेक्टर को बड़ा झटका लगा है। उनका कहना है कि अभी नुकसान का आंकलन नहीं हुआ है, लेकिन हालात सुधरने में वक्त लगेगा।

200 करोड़ से ज्यादा का नुकसान

मनाली के विधायक और मौजूदा सरकार में मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर का कहना है कि अकेले कुल्लू को इस त्रासदी से 200 करोड़ से ज्यादा रुपए का नुकसान हुआ है। उनका कहना है कि सरकार पुनर्वास को लेकर प्रयासरत है।

वृद्ध आश्रम भी चढ़ा बाढ़ की भेंट

मनाली ब्यास नदी में आई बाढ़ से क्लाथ के वृद्ध आश्रम को भारी क्षति पहुंची है। आश्रम के साथ लगती सुरक्षा दीवार, जमीन, दो शौचालय, कार्यालय, रसोईघर, टिन का शेड, भंडार गृह और स्नानघर भी नदी के तेज बहाव में बह गए हैं। सहारा वृद्ध आश्रम की संचालक अनिता ठाकुर ने बताया कि  आश्रम में 30 से अधिक बुजुर्ग रह रहे हैं। वन मंत्री गोविंद ठाकुर ने कहा कि  बुजुर्गों की यथा संभव मदद की जाएगी।

कंकरीट के जंगल में तबदील हुई मनु की नगरी

विश्व भर के सैलानियों की पसंदीदा जगहों में से एक मनाली में पिछले कुछ वर्षों से प्राकृतिक आपदा  भी बढ़ गई हैं। यहां बेरोकटोक हो रहे बहुमंजिला इमारतों का निर्माण,जहां टीसीपी की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है, वहीं ब्यास किनारे हो रहा अवैध निर्माण भी इसका एक कारण बना है।   एनजीटी की  रिपोर्ट में भी इस बात कर खुलासा किया गया है कि मनाली के करीब 40 फीसदी होटल संचालक ऐसे हैं, जिन्होंने बिना अनुमति के ही बहुमंजिला बिल्डिंगों का निर्माण कर डाला है। इसके अलावा बाहंग, पलचान, बशिष्ठ के समीप ब्यास नदी के पास प्रवासी मजदूरों ने लंबे समय से जगह-जगह अपनी अस्थायी कालोनियों बनाकर नियमों की धज्जियां उड़ाई हैं। मनाली में करीब एक दर्जन छोटी-बड़ी जल विद्युत परियोजनाएं हैं। ऐसे में यहां बार-बार हो रही बादल फटने की घटनाओं के पीछे एक कारण इसे भी माना जा रहा है। यही नहीं पहाड़ों से बहने वाले नाले जैसे ही मनाली शहर में प्रवेश करते हैं यह बिलकुल ही सिकुड़ जाते हैं। कारण है यहां लोगों ने नालों को भी नहीं छोड़ा है और इनके रास्तों पर भी निर्माण कर डाला है। ऐसे में तेज बारिश के बीच जैसे ही यह नाले उफान पर बहते हैं मनाली व इसके आसपास के क्षेत्रों में भारी तबाही मचाते हैं। वहीं ब्यास तटीकरण योजना भी सिरे नहीं चढ़ पा रही है। हालांकि योजना को लेकर काफी लंबे से दावा तो पेश किया जा रहा है, लेकिन योजना फाइलों में भी दफन होती जा रही है।

न्यूगल ने बदली चाल

बह गया सौरभ वन विहार

कारगिल युद्ध के प्रथम शहीद कै. सौरभ कालिया के नाम पर पालमपुर के बंदला क्षेत्र में बहने वाली न्यूगल खड्ड के किनारे सौरभ वन विहार का निर्माण  2000 में सांसद शांता कुमार की सोच के चलते किया गया था।  सौरभ वन विहार में पर्यटकों के लिए काफी कुछ उपलब्ध करवाया गया। यह सारा स्थान,वह था जहां बरसों पूर्व न्यूगल बहती थी। समय के साथ न्यूगल खड्ड का जलस्तर कम हुआ तो खड्ड ने अपना मार्ग भी बदला, जो स्थान खाली हुआ वहां भारी संख्या में पेड़ और पत्थर थे। प्रकृति के करीब प्रकृति सा नजारा देने के लिए इस स्थान का चयन वन विहार के लिए किया गया। इस स्थल पर अब तक करीब अढ़ाई करोड़ रुपया खर्च किया जा चुका था।

कृत्रिम झील में नौकाविहार, 20 लाख की लागत से प्रदेश का सबसे बड़ा कृत्रिम एक्वेरियम, जिसमें 24 प्रजातियों की मछलियां रखी गई, कारगिल युद्ध को चित्रित करता रॉक गार्डन बरबस ही पर्यटकों के आकर्षक का केंद्र बन गया था। अब यहां रह गई हैं तो बस इन स्थलों की यादें, टूट चुका मीन कक्ष, जहां अब कोई मछली नहीं है। कृत्रिम झील का नामो निशान मिट गया है, तो नौकाएं टूट गई हैं। बता दें के कि न्यूगल खड्ड के एक किनारे पर सौरभ वन विहार का निर्माण किया जाना शुरू से ही वहां की आसपास की पंचायतों को रास नहीं आया था। समय-समय पर न्यूगल के रौद्र रूप को देख चुके ग्रामीणों ने इसका विरोध भी जताया था। लोगों का विरोध ऐसे ही नहीं था और 2004 में इसक प्रमाण भी मिल गया। न्यगूल में आई बाढ़ ने यहां काफी नुकसान पहुंचाया। उसके बाद भी यहां काम जारी रहा और करोड़ों रुपया खर्च किया गया। अब न्यूगल ने जिस कद्र यहां तबाही मचाई है, उससे सौरभ वन विहार के अस्तित्व पर ही बड़ा सवाल बन गया है। पूरा क्षेत्र रेत और प्रलय के रूप में आए पानी के साथ बहकर पहुंचे टूटे पेड़ों से भर चुका है, न्यूगल ने इशारा दे दिया कि स्थान के चयन में कहीं न कहीं कमी तो रही है। न्यूगल खड्ड एक बार फिर अपने रास्ते को ढूंढती दिखी और इसी खोज में न्यूगल ने वन विहार को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बंदला क्षेत्र में लगे पावर प्रोजेक्टों ने वहां पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया है, जिसकी चर्चा बीते समय में होती रही है। पेड़ों पर चली कुल्हाड़ी और पर्यावरण नियमों की अनदेखी भी पहाड़ों को चोट पहुंचाती रही तो एकत्रित किए गए पानी को एकसाथ छोड़ा जाना भी न्यूगल के जलस्तर को अचानक बढ़ा देता है।

पावर प्रोजेक्टों ने खोखले किए पहाड़

जिला में विकास के सूचक पावर प्रोजेक्टों के निर्माण कार्य के दौरान ब्लास्टिंग से जर्जर पहाड़ अब तबाही का सबब बनने लगे हैं। चुराह व भरमौर इलाके में प्रोजेक्ट निर्माण स्थल की साइटों के आसपास के हिस्सों के पहाड़ बुरी तरह जर्जर हो चुके हैं, जिससे जरा सी बारिश होने पर इनका दरकना आम बात होकर रह गई है। चुराह का मंगली व चांजू और बिहाली में बिजली उत्पादन में जुटे पावर प्रोजेक्ट के निर्माण कार्य दौरान पहाड़ों को काटने दौरान ब्लास्टिंग से इलाका स्लाइडिंग जोन बनकर रह गया है। पावर प्रोजेक्ट के निर्माण कार्य के दौरान निकलने वाले मलबे को नदी-नालों के किनारे अवैध तरीके से डंप किया जा रहा है। मगर पावर प्रोजेक्ट प्रबंधन की इस मनमानी के खिलाफ  अभी तक शासन व प्रशासन स्तर पर कोई बड़ी कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। पहाड़ों को काटकर संपर्क मार्गो के निर्माण भी प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन रहे हैं। मार्गों के दौरान ब्लास्टिंग व कटिंग से निकले मलबे को अवैज्ञानिक तरीके से डंप किया जा रहा है, जो कि बारिश में बहकर निचले हिस्से में बसे रिहायशी क्षेत्र के लोगों के लिए मुश्किल बनकर रह गया है। चंबा- पठानकोट-भरमौर एनएच मार्ग पर ढुंढियारा बंगला, रजेरा शिव मंदिर और जांघी के पास उपरी हिस्से में संपर्क मार्गों के निर्माण से दरके पहाड़ों के चलते नए डेंजर प्वाइंट बनकर उभरे हैं। हरदासपुरा, जुलाहकड़ी, बालू व उदयपुर में लोगों ने रावी और उपरी हिस्से बहने वाले नालों के नजदीक आशियाने बना डाले हैं।

 चैकडैम बनाने की मुहिम नहीं बढ़ी आगे

हिमाचल में भू-संरक्षण के लिए एक बड़ा कदम चैक डैम बनाने का लिया गया था। हिमाचल में विश्व बैंक द्वारा प्रायोजित मिड हिमालय प्रोजेक्ट के तहत चैक डैम बनाने का काम बड़े शोरों से किया गया।  इस प्रोजेक्ट के तहत अन्य कार्यों के अलावा वाटरशैड बनाने, सिंचाई के टैंकों का निर्माण, पौधारोपण कर फोरेस्ट कवर बढ़ाना, कृषि व भूमि संरंक्षण को बढ़ावा देने जैसे कार्य किए गए। प्रोजेक्ट के तहत चैकडैम बनाने का काम ग्राम पंचायत स्तर पर किया गया, लेकिन इस मुहिम को आगे नहीं बढ़ाया गया। यह प्रोजेक्ट अब अपनी मियाद पूरी कर चुका है।  हालांकि इस प्रोजेक्ट को विश्व बैंक की मदद से हिमाचल सरकार और भी आगे बढ़ाना चाह रही थी, लेकिन इसको आगे बढ़ाने में विश्वबैंक ने असमर्थता जताई है।

 नेचुरल ड्रेनेज सिस्टम तहस-नहस

हिमाचल में प्राकृतिक स्त्रोतों के साथ हो रही छेड़खानी पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचा रही है। पानी के नेचुरल सोर्स के समीप की जा रही इनक्रोचमेंट के साथ-साथ हरे-भरे पेड़ों की कटाई की वजह से पानी के सोर्स  सूख रहे हैं। वहीं नदी-नालों के साथ हो रहे अवैध निर्माण भी नेचुरल ड्रेनेज सिस्टम को तहस-नहस कर रहे हैं।

नदी-नालों का रुख मोड़ना सही नहीं

पहले वह भी समय था, जब नदी, नालों, कूहलों के नेचुरल ड्रेनेज के साथ कोई भी छेड़खानी नहीं की जाती थी। वहीं आज यह वक्त आ गया है कि हर कोई अपने घरों, होटलों और खेती के लिए पानी पहुंचाने के लिए नदी-नालों के नेचुरल रुख को ही बदल रहा है। यही एक वजह है कि राज्य के अधिकतर क्षेत्रों में बरसात के मौसम में बाढ़ आने की वजह से जानमाल का ज्यादा नुकसान हो रहा है।

अतिक्रमण करना  सबसे बड़ी भूल

प्रदेश में नदी-नालों को तबाह करने का  सबसे बड़ा कारण कामर्शियल कार्य करना और अवैध रूप से अतिक्रमण करना   है। वहीं नदी-नालों में फेंका जा रहा कूड़ा-कचरा भी पानी के नेचुरल सोर्स को खत्म कर रहे हैं। प्रदेश के नेचुरल ड्रेनेज को तबाह करने की प्रक्रिया थमी नहीं तो आने वाले समय में परिणाम गंभीर होंगे।

सूत्रधार : शकील कुरैशी, आशीष शर्मा, शालिनी राय भारद्धाज, दीपक शर्मा

जयदीप रिहान, टेकचंद वर्मा, प्रतिमा चौहान व मोहर सिंह पुजारी

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