निरंकुश होने की छूट अमरीका से अधिक भारत में

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’

लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं

ट्रंप और मोदी के मध्य यह तुलना दर्शाती है कि जहां एक अमरीकी राष्ट्रपति को अंधाधुंध दौड़ने से तुरंत रोक दिया जाता है, एक भारतीय प्रधानमंत्री अपने समूचे कार्यकाल के दौरान मनमानी जारी रख सकता है। यह दो शासन प्रणालियों के बीच एक बुनियादी अंतर के कारण है। अमरीकी राष्ट्रपति प्रणाली शक्तियों को कइयों में बांटती है, जबकि भारतीय संसदीय मॉडल समस्त कार्यकारी और विधायी शक्तियां एक ही पदाधिकारी, प्रधानमंत्री, में समाहित कर देता है…

नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप दोनों पर निरंकुश व्यवहार के आरोप हैं। इस आरोप को सही साबित करने के लिए प्रत्येक ने पद ग्रहण करने — क्रमशः पांच वर्ष और दो वर्ष पहले — से अब तक काफी एकपक्षीय कार्य किए हैं। परंतु कौन सा मुख्यकार्यकारी सचमुच निरंकुश होने में सफल रहा है? यह विडंबना है कि ट्रंप, जिनके बारे में माना जाता है कि वह ‘वन मैन शो’ चला रहे हैं, यह मुकाबला हार जाते हैं। निरंकुश होने में मोदी अधिक सफल हैं।

आइए ट्रंप के रिकार्ड से शुरुआत करें। उन्होंने पहली मनमानी करने का प्रयास अपने पहले ही सप्ताह में किया, जब उन्होंने सात मुस्लिम बहुल राष्ट्रों के लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। पंरतु 24 घंटे के भीतर न्यूयार्क राज्य में एक जज ने उस कार्यकारी आदेश को रोक दिया। उनके अपने अटार्नी जनरल ने रोक का बचाव करने से इनकार कर दिया। ट्रंप को इस निहित धार्मिक भेदभाव वाली नीति को छोड़ने, इसमें तीन बार संशोधन करने, और इसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट से अंतिम अनुमोदन की प्रतीक्षा करने के लिए मजबूर कर दिया।

शरणस्थली बने नगरों के खिलाफ कार्रवाई के उनके चुनावी वादे के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनकी अप्रवास विरोधी नीतियों से सहयोग से इनकार करने वाले शहरों को धन देने से मना करने के उनके आदेश को कैलीफोर्निया की दो काउंटियों ने चुनौती दी। ट्रंप से कहा गया कि कांग्रेस द्वारा अनुमोदित व्यय पर वह नई शर्तें नहीं थोप सकते। मामला अभी भी न्यायालय में है।

ट्रंप को एक और बड़ा झटका उनके राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र से लगा। उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, एकमात्र उच्चस्तरीय नियुक्ति जो वह सेनेट के अनुमोदन बगैर कर सकते थे, को इस्तीफा देने के लिए विवश किया गया। माइकल फ्लिन पर आरोप था कि उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान रूसी राजदूत के साथ प्रतिबंधों पर चर्चा की थी। उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया ट्रंप के अपने न्याय विभाग ने आरंभ की।

फ्लिन का रूसी प्रसंग ट्रंप के गले की फांस बन गया। ट्रंप की अपनी खुफिया एजेंसी एफबीआई ने जांच शुरू कर दी। जब उन्होंने एफबीआई निदेशक जेम्स कोमी को पद से हटा दिया, तो उनके न्याय विभाग ने मामले की और गहराई से पड़ताल करने के लिए एक विशेष अभियोजक नियुक्त कर दिया। विशेष अधिवक्ता म्यूलर ट्रंप के 30 से अधिक लोगों को अभियुक्त बना चुके हैं। अगर म्यूलर की अंतिम रिपोर्ट यह साबित कर देती है कि ट्रंप ने रूसियों के साथ साठगांठ की, या न्याय बधित किया, उन्हें संभवतया महाभियोग के माध्यम से पद से हटा दिया जाएगा।

ट्रंप का दंभ विधायी मोर्चे पर भी रोका गया। उनके पद ग्रहण करने के बाद कांग्रेस ने दो वार्षिक बजटों का अनुमोदन किया, परंतु चुनाव प्रचार के दौरान सीमा पर दीवार बनाने संबंधी ट्रंप के वचन को निभाने के लिए धन देने से इनकार कर दिया। इसी प्रकार ओबामाकेयर निरस्त करने की उनकी चुनावी शपथ सेनेट ने मात्र एक वोट से पूरी नहीं होने दी। यह वोट उनकी अपनी ही पार्टी के सेनेटर जॉन मैक्केन का था। यह तब हुआ जब ट्रंप की ही रिपब्लिकन पार्टी का कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण था। अब क्योंकि सदन का नियंत्रण डेमोक्रेटिक पार्टी के हाथ आ चुका है, टं्रंप के एकपक्षवाद की आगामी सफलता की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं।

यह नहीं कहा जा सकता कि ट्र्रंप को दो वर्षों में कोई सफलता ही नहीं मिली। वह चुनाव प्रचार के दो बड़े वचन पूरा करने में सफल रहे हैंः कार्पोरेट करों में कटौती, और सुप्रीम कोर्ट में रूढि़वादी न्यायाधीशों की नियुक्ति। परंतु दोनों ही पुराने रिपब्लिकन पार्टी प्लेटफार्म हैं। जहां भी ट्रंप और उनकी पार्टी को समान आधार मिले, वह काम करने में सफल रहे।

केवल विदेश संबंधी मामलों में ही ट्रंप एकतरफा कार्रवाइयां करने में सफल रहे हैं। उन्होंने चीन से आयात पर शुल्क बढ़ा दिए, और ईरान समझौते व पेरिस जलवायु परिवर्तन सहमति से हाथ खींच लिए। उन्होंने साझा सुरक्षा के लिए पर्याप्त धन न देने पर नाटो के साथ हंगामा किया। पंरतु ये अचानक की गई मनमौजी कार्रवाइयां नहीं थीं। उन्होंने इन मसलों पर चुनाव अभियान चलाया और जीते, और ये कदम उनके संवैधानिक अधिकारों के दायरे में हैं।

एक भारतीय प्रधानमंत्री को ऐसे प्रतिबंधों का सामना नहीं करना पड़ता। एक प्रधानमंत्री को निचली अदालत में संवैधानिक चुनौती के माध्यम से अपना चुनावी वादा पूरा करने से नहीं रोका जा सकता। प्रधानमंत्री का विधि मंत्री उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को पद से हटाने के लिए विवश नहीं कर सकता। इसी प्रकार, प्रधानमंत्री को उनकी ही पार्टी चुनाव में वचनबद्ध प्रिय परियोजना को धन देने, या कानून बनाने से इनकार नहीं कर सकती।

सच्चाई यह है कि एक भारतीय प्रधानमंत्री के पास एक अमरीकी राष्ट्रपति से अधिक विस्तृत शक्तियां हैं। मोदी ने अपना शासन, ट्रंप की ही तरह, संसद को बाइपास करते हुए अध्यादेश जारी कर आरंभ किया। पंरतु इनमें से कोई भी फरमान न्यायालय में चुनौती के चलते वापस नहीं लेना पड़ा। अपने पहले वर्ष में मोदी सरकार ने नौ अध्यादेश जारी कर ‘ऑर्डिनेंस राज’ का उपनाम हासिल किया। अध्यादेशों की यह मात्रा यूपीए सरकार के 10 वर्षों में जारी किए गए 61 अध्यादेशों को पीछे छोड़ तेजी से आगे बढ़ रही है। हालांकि नेहरू और इंदिरा गांधी के समय में आंकड़े इससे भी बुरे थे। मोदी के आदेशों में तीन तलाक पर रोक, कृषि भूमि अधिग्रहण का अधिकार, और बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश बढ़ाना शामिल है। भू-अधिग्रहण संबंधी आदेश किसानों के विरोध के कारण जान-बूझकर निरस्त होने दिया गया।

फरमान से शासन करने का सबसे बड़ा उदाहरण मोदी की नोटबंदी है। इसे थोपने के लिए अध्यादेश तक का सहारा भी नहीं लिया गया, जिसके लिए राष्ट्रपति की सहमति की आवश्यकता होती, बल्कि अपने वित्त विभाग की मात्र एक अधिसूचना द्वारा उन्होंने यह काम कर दिखाया। इससे देश की आर्थिकी को हानि पहुंचाने वाली सरकार की एक योजना को कोई चुनौती देने की स्थिति में नहीं रहा। अमरीका में मोदी एक अधिसूचना या अध्यादेश के जरिए केंद्रीय बैंक को देश की करंसी पर रोक लगाने की आज्ञा नहीं दे पाते। उन्हें विधायिका द्वारा एक नया कानून पास करवाने की आवश्यकता होती।

मोदी देश की संस्थाओं के साथ भी मनमानी कर पाए। भारतीय रिजर्व बैंक के साथ ताजा रस्साकशी, और सीबीआई में पनपा क्लेश, इन संस्थाओं के प्रधानमंत्री के सीधे और एकल नियंत्रण में होने के ही परिणाम हैं। अमरीका में मोदी अथवा उनके मंत्री विधायिका के अनुमोदन बिना देश के केंद्रीय बैंक को आदेश देने या खुफिया एजेंसियों के उच्च अधिकारियों को नियुक्त करने में सक्षम नहीं होते।

मोदी विधायी मोर्चे पर भी अपनी ही मनवाने में सफल रहे हैं। उनके सबसे दबंग रिफॉर्म, जीएसटी बिल, का पास होना बेहतरीन साक्ष्य प्रस्तुत करता है। यह बुरी तरह दोषपूर्ण कानून निकला। इसे लागू करने के पहले दस महीनों में ही सरकार को इसमें 376 परिवर्तन करने पड़े। परंतु कोई भी इसे संसद में पास होने से नहीं रोक सकता था। यहां तक कि संशोधन के लिए भी विवश नहीं कर सकता था। क्योंकि भाजपा के पास लोकसभा में शर्तिया बहुमत था। एक भाजपा सदस्य दलबदल विरोधी कानूनों के कारण विधेयक के खिलाफ खड़ा नहीं हो सकता था। और राज्यसभा में विरोधी पार्टियां आखिरकार बिल के संयुक्त सत्र में पास होने की संभावना के चलते चुप रहीं।

ट्रंप और मोदी के मध्य यह तुलना दर्शाती है कि जहां एक अमरीकी राष्ट्रपति को अंधाधुंध दौड़ने से तुरंत रोक दिया जाता है, एक भारतीय प्रधानमंत्री अपने समूचे कार्यकाल के दौरान मनमानी जारी रख सकता है। यह दो शासन प्रणालियों के बीच एक बुनियादी अंतर के कारण है। अमरीकी राष्ट्रपति प्रणाली शक्तियों को कइयों में बांटती है, जबकि भारतीय संसदीय मॉडल समस्त कार्यकारी और विधायी शक्तियां एक ही पदाधिकारी, प्रधानमंत्री, में समाहित कर देता है।

अंग्रेजी में ‘दि क्विंट’ में प्रकाशित

(20 दिसंबर, 2018)

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