पांडवों की देन है जवाली का मिनी हरिद्वार

जवाली के राजमहल, नौण और लक्ष्मीनारायण मंदिर आज भी अपनी प्राचीन गाथा को उजागर करते हैं। जवाली की स्थापना गुलेर रियासत के राजा ने 1730 ई. के आसपास की थी। ऐसा कहा जाता है कि गुलेर के तत्कालीन राजा गोवर्धन सिंह ने अपनी रानी जवाला को यहां बसाया था। इसी कारण इस कस्बे का नाम जवाली पड़ गया। राजवंश के लोगों की धर्म के प्रति अटूट आस्था थी, इसके प्रमाण महलों की दीवारों पर कुछ देवी-देवताओं की अंकित तस्वीरों से मिलते हैं। महलों के प्रांगण में एक देवी शक्ति का चबूतरा भी मौजूद था, जिसे अब स्थानीय जनता की श्रद्धा ने महलां देवी मंदिर के रूप में संवारा है।  महलों के मुख्य द्वार से 50 कदम दूरी पर बने एक गेट से नीचे करीब 94 पौढि़यां उतरकर एक स्नानघर का भी निर्माण करवाया गया था। इस प्राकृतिक जल स्रोत को नौण कहा जाता है और यहां पर 12 महीने स्वच्छ व शीतल पेयजल बहता रहता है। यहां स्थापित सरोवर की बगल में एक ही दीवार पर करीब 14 मंदिर बने है और दीवार पर ही माता शीतला, मनसा देवी, शनिदेव व अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई गईं हैं, जो अपने प्राचीन स्वरूप को बयां करती प्रतीत होती हैं। लोग यहां स्नान करने के बाद इन मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं। सरोवर के साथ ही यहां पर तीन शिव मंदिर और एक हनुमान का मंदिर भी मौजूद है। नौण सुधार समिति ने इसकी उचित देखरेख करते हुए इस धरोहर को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।  नौण से कुछ ही मीटर दूरी पर देहर खड्ड के समीप हर साल 13 व 14 अप्रैल को जिला स्तरीय बैसाखी पर्व का आयोजन किया जाता है। इस स्थान को मिनी हरिद्वार कह कर भी पुकारा जाता है। किंवदंती है कि द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडव इस मनमोहक स्थल को देख यहां रुक गए थे। कहा जाता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान यहां पर स्वर्ग के लिए पौढि़यों का निर्माण करना चाहा और इस कार्य को एक ही रात में पूरा करने का निर्णय लिया। स्वर्ग के लिए जब केवल अढ़ाई पौढि़यां बननी शेष रह गईं, तो एक तेलिन ने सुबह होने की आवाज दे दी। इस कारण इस कार्य में विघ्न पड़ गया और सभी पौढि़यां गिर गईं, केवल अढ़ाई पौढि़यां ही शेष रह गईं। विघ्न पड़ जाने के कारण पांडव इस निर्माण कार्य को अधूरा छोड़ पश्चिम की ओर चले गए। तभी से इस स्थान को हरिद्वार के रूप में स्वीकारा जाता है। यह दंतकथा मिनी हरिद्वार की बगल में बने शिवमंदिर की दीवार पर भी लिखी हुई है। इसके साथ ही यहां धर्मराज का मंदिर भी बनाया गया है। इस स्थान की खास बात यह भी है कि शिवालिक और धौलाधार पहाडि़यों का नजारा इसकी सुंदरता को चार चांद लगाता है।  राजमहलों से करीब दो सौ मीटर दूरी पर लक्ष्मी नारायण मंदिर भी मौजूद है। कहा जाता है कि मंदिर में प्राचीन मूर्तियां तत्कालीन राजाओं ने ही स्थापित करवाई थीं। मंदिर परिसर में पंचमुखी हनुमान, शनिदेव, भोलेनाथ, गणेश, देवी दुर्गा व अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं।

-कपिल मेहरा, जवाली

You might also like