उद्यमियों से जुड़े कुछ अहम मुद्दे

संजय शर्मा

लेखक, शिमला से हैं

विभिन्न एजेंसियों द्वारा लगाए जाने वाले ये अधिभार उद्यमियों पर भारी पड़ रहे हैं, जिसका वे शीघ्र समाधान चाहते हैं। औद्योगिकरण के रास्ते में उद्यमियों के लिए सबसे बड़ा रोड़ा ट्रक यूनियनों की मनमानी है। सामान्य ढुलाई की दरों के मुकाबले इनके रेट 30 से 40 प्रतिशत अधिक हैं, जिससे औद्योगिक उत्पाद बाजार में अधिक कीमतों की वजह से बिक नहीं पाते। ट्रक यूनियनें उद्योगों को अपने वाहनों से भी माल की ढुलाई नहीं करने देती। उद्योग जगत से इस विषय में बार-बार सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग उठती रही है…

1950 के दशक में प्रदेश की आर्थिकी मुख्यतः ‘कृषि व बागबानी’ यानी ‘प्राइमरी सेक्टर’ पर आधारित थी। मात्र 1.1 प्रतिशत  उद्योगों तथा 5.9 प्रतिशत सेवा क्षेत्र का योगदान था, परंतु उदारीकरण, लाइसेंस राज की समाप्ति, कारोबारी सुगमता के चलते नियमों, कानूनों व प्रक्रियाओं के सरलीकरण की वजह से आज औद्योगिक क्षेत्र का योगदान बढ़कर 29.2 प्रतिशत व सेवा क्षेत्र का 43.3 प्रतिशत हो गया है। आंकड़ों की मानें, तो प्रदेश में वर्तमान में 49700 से अधिक उद्यम लगे हैं, जिनमें लगभग 35000 करोड़ का निवेश किया गया है, जिससे लगभग चार लाख व्यक्तियों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए यह गर्व का विषय है कि मूलभूत भौगोलिक कठिनाइयों के बावजूद वर्ष 1971 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के पश्चात तथा अपने सीमित संसाधनों से पिछले 48 वर्षों में जो एक औद्योगिक ढांचा व माहौल तैयार हुआ है, यह सब उसी का परिणाम है। अन्य राज्यों की तर्ज पर इस वर्ष प्रदेश में एक ‘वैश्विक निवेशक सम्मेलन’ प्रस्तावित है, जिसकी तैयारियां चल रही हैं। प्रदेश सरकार के आला अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के नेतृत्व में हाल ही में बंगलुरू व हैदराबाद में ‘रोड शो’ आयोजित कर ‘प्रदेश में निवेश क्यों किया जाए’, इस बारे में प्रमुख औद्योगिक घरानों के प्रतिनिधियों से चर्चा की और उन्हें प्रदेश में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया। यह प्रयास किया जा रहा है कि निवेशक के सम्मुख एक ऐसा माहौल प्रस्तुत किया जाए, जो उसे और राज्यों की तुलना में ‘प्रभावी व सुगम’ लगे और वह प्रदेश में अपने निवेश प्रस्तावों को शीघ्र कार्यान्वित करे। इसी  इसी कड़ी में 25 फरवरी, 2019 को सरकार द्वारा संभावित निवेशकों के साथ एक ‘समझौता ज्ञापन हस्ताक्षर समारोह’ शिमला में आयोजित किया गया, जिसकी सदारत प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा की गई। पर्यटन, उद्योग, शहरी विकास, स्वास्थ्य, आयुर्वेद, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम, कला व संस्कृति, सूचना तकनीक व परिवहन जैसे अहम क्षेत्रों में यह समझौता ज्ञापन हस्ताक्षरित किए गए। कुल मिलाकर 16,800 करोड़ के 158 समझौता ज्ञापन हस्ताक्षरित किए गए। आशा की जानी चाहिए कि इससे प्रदेश की आर्थिकी और सुदृढ़ होगी तथा 39,400 से अधिक रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, परंतु राह सुगम नहीं है। समुचित औद्योगिक निवेश के लिए प्रदेश के समक्ष कुछ चुनौतियां हैं, जिनको पार करके ही इसे निवेशक की नजर में एक उत्तम निवेश स्थली बनाया जा सकता है। 31 मार्च, 2010 तक लगने वाली इकाइयों को तैयार माल पर आबकारी डयूटी में उत्पादन प्रारंभ करने की तिथि से 10 वर्षों की छूट थी। जुलाई 2017 में वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के पश्चात उन इकाइयों को शेष बचे समय के लिए किस प्रकार छूट दी जाए, उद्योगों की यह मांग सरकार के समक्ष रखी गई है। कुछ राज्य सरकारों जैसे जम्मू-कश्मीर, असम ने अपने राज्य बजट से जीएसटी के अंतर्गत राज्य सरकार को मिलने वाले हिस्से से ऐसी इकाइयों को प्रोत्साहन दिया है। वस्तु एवं सेवा कर लागू करने का उद्देश्य यह था कि उद्यमी को विविध करों के स्थान पर केवल एक ही कर देना पड़े, परंतु अभी भी सर्टेन गुड्ज कैरिड बाय रोड (सीजीसीआर) तथा वस्तु कर (एजीटी) दो ऐसे कर हैं, जिन्हें वस्तु एवं सेवा कर में समाहित नहीं किया गया है। प्रदेश के उद्यमी चाहते हैं कि राज्य सरकार इन दो करों को समाप्त कर केंद्र सरकार से प्रदेश को इससे होने वाली राजस्व हानि की प्रतिपूर्ति का मामला उठाए। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ग्रीन व औरेंज श्रेणी के अंतर्गत आने वाले उद्योगों को एक मुश्त पांच साल के लिए उद्योग चलाने की सहमति का प्रमाण पत्र दिया है।

पहले यह वार्षिक आधार पर दिया जाता था व तदानुसार ही शुल्क वसूल किया जाता था। अब पांच वर्ष का शुल्क बोर्ड द्वारा शुरू में ही वसूल किया जा रहा है, जो एक बड़ी राशि बनती है। उद्यमी इसे अपनी जेब पर एक अनावश्यक बोझ समझते हैं व चाहते हैं कि इसको एक मुश्त लेने की बजाय वार्षिक रूप से लिया जाए। बद्दी, बरोटीवाला, नालागढ़ औद्योगिक क्षेत्र में कई सरकारी एजेंसियां जैसे एचपीएसआईडीसी, हिमुडा, उद्योग विभाग व बद््दी बरोटीवाला नालागढ़ विकास प्राधिकरण द्वारा अपनी सेवाएं दी जा रही हैं व उसके एवज में ये उद्योगों से कुछ वार्षिक शुल्क वसूलते हैं। अब शहरी विकास विभाग द्वारा सभी औद्योगिक परिसंपत्तियों, जो नगरपालिका के दायरे में आती हैं, चाहे वे औद्योगिक क्षेत्र में स्थित हों या निजी भूमि में, पर प्रॉपर्टी टैक्स लिया जा रहा है। विभिन्न एजेंसियों द्वारा लगाए जाने वाले ये अधिभार उद्यमियों पर भारी पड़ रहे हैं, जिसका वे शीघ्र समाधान चाहते हैं। औद्योगिकरण के रास्ते में उद्यमियों के लिए सबसे बड़ा रोड़ा ट्रक यूनियनों की मनमानी है। सामान्य ढुलाई की दरों के मुकाबले इनके रेट 30 से 40 प्रतिशत अधिक हैं, जिससे औद्योगिक उत्पाद बाजार में अधिक कीमतों की वजह से बिक नहीं पाते। ट्रक यूनियनें उद्योगों को अपने वाहनों से भी माल की ढुलाई नहीं करने देती। उद्योग जगत से इस विषय में बार-बार सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग उठती रही है। प्रदेश के उद्यमी यह अपेक्षा रखते हैं कि सरकार प्रदेश में निवेश आकर्षित करने के लिए जो प्रयास कर रही है, वे स्वागत योग्य हैं, परंतु वर्तमान में जो इकाइयां चल रही हैं, वे उपरोक्त मुद्दों के कारण दिक्कत महसूस कर रही हैं। इनका भी समय पर समाधान किया जाना आवश्यक है।

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