विष्णु पुराण

इन अत्यंत रमणीक वर्ष पर्वतों तथा वर्षों में देवताओं और गंधर्वों सहित पाप रहित प्रजा रहती है। वहां के रहने वाले पुण्यवान और चिरायु होते हैं, उन्हें किसी प्रकार रोगादि से ग्रसित नहीं होना होता। वे सदा सुखी रहते हैं ..

वर्षचलेषु रम्येषु वर्षेष्वेतेषु चानघः।

वसन्ति देवगन्धर्व सहिता सततं प्रजाः।।

तेषु पुण्या जनपदाश्चिराच्च म्रियते जनः।

नाधयो व्याधयो वापिससर्व कालसुखं हि तत्।।

तेषां नद्यस्तु सप्तैव वर्षाणां च समुद्रगाः।

नामयस्ताः प्रवक्ष्यामि श्रुताः पाप हसंति या।।

अनुतप्ता शिखी चैव त्रिपाशा त्रिदिवाक्लमा।

अमृत सुकृता चैघ सप्तैततास्तत्र निम्नगाः।।

एते शैलास्तथा नद्यः प्रधाना कथितास्तवः।

क्षुद्रशैलास्था नद्यस्तत्र संति सहस्रशः।।

ताः पिवंति सदा हृष्टा नदीर्जनपदास्तु ते।

अपपिणा न तेषां वै न चवोत्सपिणी द्विज।।

न त्वेवास्ति युगावस्था तेषु स्थानेषु सप्तसु।

त्रेतायुगसमः कालः सवदैव महामते।।

प्लक्षद्वीपादिषु ब्रह्मत्र्छाकद्वीपपांतिकेष वै।

पंच वर्ष सहस्राणि जना जीवंत्यनामयाः।।

इन अत्यंत रमणीक वर्ष पर्वतों तथा वर्षों में देवताओं और गंधर्वों सहित पाप रहित प्रजा रहती है। वहां के रहने वाले पुण्यवान और चिरायु होते हैं, उन्हें किसी प्रकार रोगादि से ग्रसित नहीं होना होता। वे सदा सुखी रहते हैं। उन वर्षों में सात ही नदियां, जो समुद्र में गिरती हैं। मैं उनके नाम तुमसे  कहता हूं, जिनके सुनने मात्र से ही वे नदियां पापों से छुड़ा देती हैं। अनुतप्त, शिखी, विपाशा त्रिदिवा, अक्लमा, अमृता और सुकृता, यह उन सातों के नाम हैं। प्रमुख-प्रमुख नदियों और पर्वतों का मैंने तुमसे यह वर्णन किया है, वैसे छोटे-छोटे पर्वत और नदियां तो वहां हजारों ही होंगी। ऐसे देश के हृष्ट-पुष्ट मनुष्य सदैव उस नदियों का ही जल पीते हैं, इसलिए उनमें हृस अथवा वृद्धि का अभाव रहता है। उन सात वर्षों में युग को भी अवस्था नहीं है। हे ब्रह्मण! प्लक्षद्वीप के आक द्वीप पर्वत छहों द्वीपों में सदैव त्रेता युग जैसा समय रहता है। इन द्वीप के निवासी रोग रहित रहते हुए पांच हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं।

धर्मपिञ्च तथैतेषु वर्णाश्रमयिभागशः।

बर्णाश्च तत्र चत्वारस्तानिन्नजोधवदाभिते।

आर्यका कुरराश्च चैविदिश्या भाविनश्चते।

ब्रिपक्षत्रिश्यास्ते शूद्रश्त मुनिसत्तमः।

जम्बूवृक्षप्रमाणास्तु तन्मध्ये द्विजीत्तमः।

इच्यते तत्र भागवास्तैर्वर्णेबकादिभिः।

मोमरूपी जगत्स्रष्टा सव्र सर्वेश्वरो हरिः।

प्लक्षद्वीप मणेन प्लक्षद्वीपः समावृतः।

तथवेक्ष रसोदेन वरिवेषानुकारिणा।

इत्येव तव मैत्रेय प्लक्षद्वीप उदाहृतः।

संक्षेपेण मया भूयः शाल्मल में निशामयः।

वर्णाश्रम के विभागनुसार इनमें पांचों धर्म की विद्यमानता रहती है। अब यहां के चारों वर्षों का तुमसे वर्णन करता हूं। हे मुनिश्रेष्ठ! उस द्वीप में आर्यक, केरर, विदिश्य और भावी संज्ञक जातियां हैं, वही क्रम के समान ही प्लक्ष का वृक्ष है। उसी के नाम पर यह प्लक्षद्वीप कहा गया है। वहां आर्य को आदि जातियां ही जगत्स्रष्टा, सर्वगत, सर्बेश्वर श्री हरिका सोम रूप से यजन करती हैं। प्लक्षद्वीप अपने तुत्य परिणाम के वलयाकर ईशरस  के समुद्र से घिरा है। हे मैत्रेय जी इस प्रकार मैंने प्लक्षद्वीप कासंलिक्षप्त वर्णन किया अब शाल्मम द्वीप का वृत्तांत सुनो।

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