कोर्ट ने जगाया निर्वाचन आयोग

कमलेश भारतीय

स्वतंत्र लेखक

आखिर निर्वाचन आयोग को सुप्रीम कोर्ट ने जगाया, तब जाकर योगी आदित्यनाथ, मेनका गांधी, मायावती और आजम खान पर प्रचार करने पर दो-दो, तीन-तीन दिन का प्रतिबंध लगा ही दिया। आखिर इस तरह की बयानबाजी किसलिए? मेनका गांधी जैसी परिपक्व नेता भी मुस्लिमों को मंच पर जनसभा में खुलेआम धमकाने लग जाएं, तो कैसी आचार संहिता और कैसा निर्वाचन आयोग? योगी आदित्यनाथ मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने के लिए उनके अली और हमारे बजरंगबली की बात कह रहे थे, तो मायावती तीन-तीन बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद मुस्लिम वोटर को एकमुश्त बसपा या सपा गठबंधन के प्रत्याशियों को वोट देने का आह्वान कर रही थी। आजम खान तो कमाल पर कमाल करते हैं, जैसे आईपीएल में गेल या रसेल छक्के पर छक्के मारे जा रहे हों। कह रहे हैं कि कलेक्टर से मायावती के जूते साफ करवाऊंगा। तभी तो आईएएस बनने की क्रेज कम होती जा रही है। उन्हें निजी नौकर समझने की भूल की जा रही है। आईएएस होकर भी निजी कंपनियों में जाने लगे हैं, प्रतिभाशाली लोग। आखिर नेताओं की इस बदजुबानी का नोटिस क्यों नहीं ले रहा था निर्वाचन आयोग? क्यों सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा? सब कार्य सुप्रीम कोर्ट ही कर रहा है। मोदी बायोपिक पर रोक लगाई, तो सुप्रीम कोर्ट ने। नमो टीवी को काम करने से रोका, तो कोर्ट ने। फिर निर्वाचन आयोग किस काम के लिए है? सवाल उठता है कि कहीं केंद्र के इशारे पर काम, तो नहीं कर रहा? क्या यह भी सीबीआई की तरह केंद्र का पालतू तोता तो नहीं बन गया? किसी टीएन शेषन की जरूरत महसूस होने लगी है, जिन्होंने यह एहसास करवाया था कि निर्वाचन आयोग कोई आयोग है। उसके बाद कोई उन जैसा क्रांतिकारी मुख्य निर्वाचन आयुक्त भी नहीं आया। कोई अपनी शिक्षा बदले जा रहा है, तो क्यों? सिर्फ नोटिस देकर पहले योगी को क्यों छोड़ दिया? जब उन्होंने मोदी सेना कह दिया। प्रधानमंत्री मोदी पुलवामा के शहीदों के नाम पर वोट मांग रहे हैं, क्या यह सही है? सेना को राजनीति में लिप्त करना, कहां तक जायज है और निर्वाचन आयोग की चुप्पी तोता बनाए जाने की ओर संदेह पैदा नहीं करती? बहुत कुछ विचारणीय है।

 

 

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