चिट्टे में रंगे हाथ

सोलन पुलिस के हत्थे चढ़े नशे के सौदागरों में एक सरकारी स्कूल के शिक्षक का नाम दर्ज होना, हिमाचल के सामाजिक परिदृश्य की शिकायत करता है। अचानक नशे का कारोबार नहीं बढ़ने लगा, बल्कि इसके यथार्थ में कई सफेदपोश दलाल हैं। हैरानी यह कि इस दिशा में केवल हिदायतें हैं या गुजारे लायक कार्रवाई, जबकि नशे का तंत्र पूरे प्रदेश के सामने प्रभावशाली साबित हो रहा है। अब यह सीमांत क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के शैक्षणिक संस्थानों के बाहर खड़ा है। किसी शिक्षक के हाथों का नशे में रंगे होने का अर्थ भयावह है और यह सबूत उस लापरवाही से जुड़ता है, जो बार-बार खतरे को नजरअंदाज करने का सबब बनती जा रही है। आश्चर्य तो यह कि जिस गति और पुलिस व्यवस्था में आक्रामक कार्रवाई से नशे के खिलाफ हल्ला बोला जाना चाहिए, उसे भी कुंद किया जाता रहा है। अतीत से वर्तमान तक पुलिस के कुछ अधिकारी अगर नशे पर गहरी चोट करना चाहते हैं, तो उन्हें परास्त करने की सियासी सोच व पहुंच सारे किए धरे को खुर्द-बुर्द कर देती है। ऐसे भी उदाहरण हैं कि जिला पुलिस प्रमुखों की नियुक्तियों में जनप्रतिनिधि किसी कमजोर या अक्षम साबित हुए व्यक्ति को अपनी पसंद बनाते हैं, ताकि इलाके में ‘तंत्र’ न टूटे। विडंबना यह भी है कि सक्षम अधिकारियों को बुलंद करने के बजाय उन्हें बैरक में भेजा जाता है। नशा जिस सीमा से हिमाचल में दस्तक दे रहा है, वहां बंदोबस्त है क्या। होना तो यह चाहिए कि सीमाई जिलों में चौकसी व कार्रवाई बढ़ाने के लिए पुलिस की मौजूदा व्यवस्था को बदला जाए। कांगड़ा जैसे जिला के नूरपुर क्षेत्र में अलग से पुलिस प्रबंधन की जरूरत है। ऐसे में पुलिस आयुक्तालय के तहत शहरी-ग्रामीण एसपी नियुक्त करते हुए नूरपुर के लिए अलग से पुलिस जिला बनाना होगा। शिमला, मंडी व कांगड़ा जिलों में पुलिस कमिश्नर नियुक्त करते हुए अपराध नियंत्रण के अलग-अलग खाके तय करते हुए, एसपी स्तर की पोस्टिंग बढ़ाई जाए। शहरी एसपी अगर निगम स्तर की व्यवस्था देखे, तो ग्रामीण के तहत अन्य क्षेत्र लाए जाएं। ट्रैफिक एवं परिवहन के दायरे में पुलिस प्रबंधन की बढ़ती चुनौती को देखते हुए आवश्यक सुधार की गुंजाइश है। इसी तरह नशे के खिलाफ एक सशक्त बल खड़ा करने की जरूरत है। सामान्य पुलिस परिपाटी के तहत हम केवल चिट्टा पकड़ सकते हैं, उसके प्रवेश को खत्म नहीं कर सकते। यहां एक शिक्षक का जिक्र चिट्टे से जुड़ रहा है, तो शिक्षा विभाग का दायित्व भी इससे जुड़ता है। ऐसा क्यों हो रहा कि बच्चों को स्कूल प्रांगण में भेजने से डर लगने लगा है या मार्गदर्शन इतना कमजोर क्यों हो गया। क्या स्कूली शिक्षा के जरिए मानव चरित्र भी चौराहे पर खड़ा है या सामाजिक दर्पण ने इन पहलुओं को प्रतिबिंबित करना छोड़ दिया। वार्षिक परीक्षाओं के फलक पर खड़ी तमाम वर्जनाएं अपने मुखौटे में नशे का जहर भर रही हैं या बच्चों के नैतिक उत्थान में अध्यापन का आचरण ही हार चुका है। जो भी हो नशे की गिरफ्त में समाज का एक बड़ा हिस्सा और भविष्य की पीढ़ी समाहित हो रही है, तो यह महज कानूनी उपचार नहीं। समाज भी निजी स्वार्थ और महत्त्वाकांक्षा में अपने दायित्व से दूर नहीं भाग सकता और न ही जनप्रतिनिधियों को इस हकीकत से दूर अपनी खिचड़ी पकाते हुए पुलिस व्यवस्था को शिथिल करना होगा। नशे के खिलाफ अभियान का नेतृत्व समाज के सभी वर्गों को करना है और साथ ही उसके खिलाफ तरीके ईजाद करते हुए समन्वित कार्रवाई अभिलषित है। बच्चे घर से शैक्षणिक संस्थान तक की दूरी में अपने व्यक्तित्व विकास की एक रूपरेखा चुनते हैं, लिहाजा अभिभावकों से शिक्षकों के बीच कई सामाजिक उधेड़बुने हैं। परिवारों के बीच टूटते रिश्तों और एकाकी जीवन में भरती भौतिक उपलब्धियों ने बच्चों के प्रति समाज की मूल भावना ही समाप्त कर दी है। जीवन की होड़ में अभिभावक यह भूल रहे हैं कि उनकी औलाद का अवमूल्य इन्हीं कडि़यों से जुड़ रहा है। खोखली महत्त्वाकांक्षा में इनसानी फितरत केवल अपनी औलाद को प्रतिस्पर्धा में आगे रखना चाहती है। ऐसे में खेल, संगीत, नृत्य, सामुदायिक तथा सामाजिक अधोसंरचना से जुड़े कर्त्तव्यबोध को जागृत करना होगा। शिक्षा विभाग को अपने पाठ्यक्रमों के कठोर पन्नों के बीचोंबीच बच्चों के जीवन में आनंद भरने के लिए गीत, संगीत, खेल तथा भ्रमण के आयोजनों पर केंद्रित होना होगा।

 

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