धरती को नरक न बनाओ

 राजेश कुमार चौहान

महात्मा गांधी ने पर्यावरण और सतत विकास पर कहा था कि आधुनिक शहरी औद्योगिक सभ्यता में ही उसके विनाश के बीज निहित हैं। इनसान ने अपने हाथों ही प्रकृति की नाक में दम करके अपने और अन्य प्राणी जाति के विनाश का सामान तैयार कर लिया है। 22 अप्रैल को धरती दिवस संपूर्ण विश्व में मनाया गया, लेकिन आज जिस तरह पूरा विश्व ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से चिंतित है, उसके लिए तो प्रतिदिन ही धरती दिवस मनाया जाना चाहिए और जो धरती पर बढ़ रहे प्रदूषण से कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं उन्हें जगाने के लिए भी यह जरूरी है। क्योंकि आज जरूरत है लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने की। धरती को हरा भरा बनाने की। अगर भारत की बात की जाए तो यहां दिन प्रतिदिन हरे भरे जंगलों की जगह कंकरीट के जंगल बनते जा रहे हैं। इनसान ने अपने हाथों ही प्रकृति की नाक में दम करके अपने और अन्य प्राणी जाति के विनाश का सामान तैयार कर लिया है। बढ़ते प्रदूषण से बढ़ती जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ने की आशंका है। इनसान हर क्षेत्र में चाहे जितनी मर्जी तरक्की कर ले, लेकिन शुद्ध आबोहवा के बिना इनसान स्वस्थ रहकर अपना जीवन खुशहाली से नहीं जी सकता। धन दौलत से इनसान महंगा इलाज करवा सकता है, लेकिन पैसे से अच्छा स्वास्थ्य नहीं खरीद सकता।  एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब धरती पर प्राणी जाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

 

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