धरती मां को वेदों में माना गया है विष्णुरूपा

नालागढ़—साध्वी गरिमा भारती ने कहा कि धरती को वेदों में विष्णुरूपा माना गया है। धरती हमारा भार वहन करती है और धन-धान्य से हमारा भरण-पोषण करती है। यह बात उन्होंने दिव्य ज्योति जागृति संस्थान एवं गोशालाएं संचालक संघ नालागढ़ के तत्त्वावधान में शहर की हिंदू पब्लिक धर्मशाला में चली पांच दिवसीय कथा के समापन अवसर पर अपने प्रवचनों में कही। अंतिम दिवस के प्रवचनों में उन्होंने रूकमणि विवाह पर प्रकाश डाला। रूकमणी माधव का विवाह उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। कथा का समापन पूजन एवं प्रभु की पावन आरती से किया गया। प्रभु की पावन आरती में मास्टर सुरेंद्र शर्मा, किशोरी लाल शर्मा एवं राजेश रामा सम्मिलित हुए। कथा के अंतिम दिवस का शुभारंभ चमन लाल बंसल, विक्रांत शर्मा, सेवानिवृत्त एक्साइज कमीशनर डीसी दिवेदी, सेवानिवृत्त तहसीलदार जगदेव चंद, दभोटा गोशाला से मास्टर बख्शी राम, गुरुद्वारा सिंघ सभा के प्रधान परमजीत सिंह ने प्रभु पावन ज्योति को प्रज्वलित कर के किया। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक एवं संचालक आशुतोष महाराज की परम शिष्या साध्वी गरिमा भारती ने बहुत ही सुंदर ढंग से भगवान श्रीकृष्ण के अलौकिक एवं महान व्यक्तित्व के पहलुओं से अवगत करवाया। रूकमणी विवाह प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि प्रभु उस आत्मा का वरण करते हैं, जिसमें उन्हें प्राप्त करने की सच्ची जिज्ञासा होती है। उन्होंने कहा कि धरती को वेदों में विष्णुरूपा माना गया है और धरती को मां कहा गया है। कुदरत को भी मां का दर्जा दिया गया है, लेकिन आज मानव प्रकृति का दोहन कर रहा है, इसलिए प्रकृति संहारक चंडिका का रूप धारण कर चुकी है। कहीं ज्वालामुखी फटते है तो कहीं चक्रवात, सुनामी, भूखमरी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं, क्योंकि हमने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है। जब मनुष्य अपनी आत्मा से जागृत होता है तो प्रकृति का दोहन नहीं उसका पूजन करता है। जब उसका मन संतुलित होगा तो यह प्रकृति भी अपने आप संतुलित हो जाएगी। इसलिए आज आवश्यकता है उस ब्रह्मज्ञान की, जिसके माध्यम से मानव का मन शांत हो। कथा के समापन अवसर पर गोशालाएं संचालक संघ नालागढ़ ने दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के सभी साधु समाज का धन्यवाद किया एवं संस्थान की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे कार्यक्रम समय-समय पर क्षेत्र में होते रहने चाहिए।

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