नोटा स्थायी हल नहीं है

राकेश शर्मा

जसवां, कांगड़ा

बीते अढ़ाई दशकों में देश की चुनाव व्यवस्था को सुदृढ़, निष्पक्ष और सरल बनाने के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा काफी सुधारात्मक प्रयास किए गए हैं। परंपरागत चुनाव व्यवस्था से भिन्न ईवीएम, नोटा और वीवी पैट मशीनें इस नई व्यवस्था के कुछ प्रचलित नाम हैं। पूरे देश के मतदाता इन नई व्यवस्थाओं के प्रति जागरूक भी हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों में पूरे देश में लगभग 60 लाख लोगों ने नोटा का प्रयोग किया था, जो देश की 20 पार्टियों को मिले वोटों से अधिक था। अब नोटा के प्रयोग से कुछ आगे सोचने की जरूरत है। फिलहाल नोटा का प्रयोग करने के लिए मतदाता पोलिंग बूथ तक आता है और वोट डालकर अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करता है, लेकिन अपने वोट से कुछ भी निर्णायक नहीं कर पाता है। नोटा को डाले गए वोट कुल मतदान प्रतिशत को बढ़ाने से ज्यादा और कुछ भी नहीं हैं। यदि किसी चुनाव में नोटा को चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशियों से अधिक वोट मिल भी जाते हैं, तब भी वही प्रत्याशी जीतता है, जिसको दूसरे प्रत्याशियों से ज्यादा वोट मिले होते हैं।  ऐसे में यह कोई सही तरीका नहीं है, इसलिए इसमें सुधार की गुंजाइश है। यह सुधार इस प्रकार भी हो सकता है कि एक निश्चित प्रतिशत तक वोट यदि नोटा के पक्ष में जाते हैं, तो उस चुनाव को अवैध घोषित किया जा सकता है तथा वहां पर नए प्रत्याशियों के साथ फिर से चुनाव करवाए जा सकते हैं। यह प्रतिशत कितना हो, यह निर्णय चुनाव आयोग का हो। केवल तभी नोटा का प्रयोग करने वाले मतदाता एक निर्णायक भूमिका में आ सकते हैं। इस नोटा से महज एक संदेश जाता है, जिसका फिलहाल राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों पर कोई असर नहीं पड़ता है, लेकिन यदि समय रहते जनता की नब्ज को नहीं भांपा गया, तो आने वाले लोकसभा चुनावों में नोटा का आंकड़ा और अधिक बढ़ सकता है। प्रतिदिन नोटा दबाने की धमकियां अखबारों और सोशल मीडिया में आम देखी जा सकती हैं। इसी कड़ी में पुरानी पेंशन  बहाली के लिए आंदोलनरत कर्मचारी भी नोटा के पक्ष में मतदान की धमकी दे चुके हैं। यदि वे अपने इस निर्णय पर अडिग रहते हैं, तो प्रदेश में बहुत अधिक मतदान नोटा के पक्ष में जा सकता है। मौजूदा परिस्थितियों में नोटा किसी भी समस्या का स्थायी हल नहीं है।

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