पहाड़ की दहलीज पर ग्लोबल वार्मिंग

Apr 23rd, 2019 12:05 am

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक, बिलासपुर से हैं

राज्य में टूलेन, फोरलेन आदि निर्माण कार्यों के लिए कटते पेड़ों पर सुप्रीम कोर्ट को अपने कड़े तेवरों के साथ हस्तक्षेप करके इनके कटान को रोकना पड़ा। सड़कों की चौड़ाई के लिए इनके किनारों से काटे गए पेड़ों का कुछ लाभ हासिल नहीं हुआ, बल्कि प्रकृति का नुकसान तथा शहरों का नैसर्गिक सौंदर्य जरूर बर्बाद हुआ। प्रकृति के नियमों को ताक पर रखकर किया गया विकास जो विनाश को आमंत्रण दे ऐसे विकास कार्यों की उपलब्धियां गिनाने का कोई औचित्य नहीं बनता…

ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती का लगातार बढ़ रहा तापमान जो कि वैश्विक स्तर पर एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है और पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या बल्कि नुकसानदायक सिद्ध हो रहा है। हिमाचल प्रदेश देवभूमि के साथ बागबानी व पर्यटन के लिए विख्यात है, गर्मियों में मैदानी राज्यों तथा विदेशों से कई पर्यटक यहां ठंडे पहाड़ों के पर्यटक स्थलों का रुख करते हैं, लेकिन कुछ अरसे से पर्यटकों को लुभाने वाले राज्य के इन शांत पहाड़ की हसीन वादियों में ग्लोबल वार्मिंग ने दस्तक देकर यहां की आबोहवा को प्रभावित करके अपना रौद्र रूप दिखा दिया है। राज्य के सात शहरों का प्रदूषण खतरनाक स्तर को छू चुका है। वहीं, गर्मी हर साल नए रिकार्ड तोड़ रही है, जिसके चलते सदियों पुराने कई प्राकृतिक जल स्रोत व झरने तथा तालाबों आदि का पानी सूख चुका है, शेष में पानी की अपेक्षाकृत मात्रा में प्रतिदिन गिरावट जारी है, जो कि पहाड़ पर पानी की किल्लत का मुख्य कारण बना है। इसके अलावा कृषि भूमि में फसलों पर बेहताशा रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों का प्रयोग, प्रतिदिन उद्योगों से निकलने वाला धुआं, हर साल जंगलों में लगने वाली भयंकर आग, डंपिंग साइट पर खुले में जल रहा कूड़ा या प्रदेश के पड़ोसी राज्यों में फसलों की कटाई के बाद उसके अवशेषों में लगाई जाने वाली आग से उत्पन्न धुएं के बादल, जिस पर एनजीटी की अपीलों व दलीलों का कोई असर नहीं हुआ, न ही नाड़ जलाने की परंपरा पर रोक लगी।

इस आग ने फसली अवशेषों के साथ कृषि भूमि को भी जलाकर जैव विविधता को ही नष्ट कर दिया, इनसे उठते धुएं ने वायुमंडल की दुर्गति करके ग्लोबल वार्मिंग को ज्वलनशील मुद्दा बना डाला है, जिसका सीधा दुष्प्रभाव कृषि व बागबानी के उत्पादन तथा कृषि उत्पादों की पोषकता पर भी पड़ा। पहाड़ी फसलों की कई प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण फसलों पर मौसम की बेरुखी, ओलावृष्टि तथा राज्य के निचले जिलों में कुछ सालों से अंधाधुंध कोहरे की मार पड़ने से आम व लीची जैसे पौधे भी जल चुके हैं। बढ़ते प्रदूषण का नकारात्मक प्रभाव स्वास्थ्य पर भी हावी हुआ, जहरीली हो रही हवा से कई बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं, लेकिन हैरत की बात यह है कि निरंतर गंभीर हो रहे ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे को मौजूदा चुनावी समर में किसी भी सियासी दल ने अपने मैनिफेस्टो में तवज्जो नहीं दी है। दूसरी समस्या यह है कि कुछ अरसे से देश में विकास के नाम का चश्मा पहनकर बेलगाम औद्योगिक वृद्धि को बढ़ाने की लालसा में तीव्रता से हो रहे अवैज्ञानिक विकास तथा गलत आधुनिक औद्योगिक नीतियों से प्राकृतिक संसाधनों का कई गुना अधिक विनाशकारी दोहन हो रहा है। नतीजतन प्रकृति के परिवेश में परिवर्तन होने लगा है, जिस विकास मॉडल के लिए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन हो जेसीबी व बड़ी पॉकलोन मशीनीकरण के प्रहारों से प्रकृति के हो रहे विनाश को यदि विकास की रफ्तार या उन्नति का पैमाना घोषित किया जाएगा, जिस मशीनीकरण की बढ़ती दखलअंदाजी से खोखले हो रहे पहाड़ों का वजूद दरकने की स्थिति में पहुंच चुका हो, तो इस परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण संरक्षण की कतई उम्मीद नहीं की जा सकती। आज आर्थिक तथा मशीनीकरण से हो रहे विकास को ज्यादा तरजीह दी जा रही है, जिस कारण कई लोगों को बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित होना पड़ रहा है। यदि प्रकृति के साथ जीना है तो अनियंत्रित रफ्तार से हो रहे औद्योगिक विकास के लिए पर्यावरण के नियमों के प्रति अपना दायित्व स्वेच्छा से निभाना होगा या विकास का दायरा प्रकृति की परिधि में रहकर तय करना होगा, ताकि असंतुलन की स्थिति न बने।  ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए पर्यावरण संरक्षण महत्त्वपूर्ण है, पर्यावरण बचाने के लिए वन संपदा जैसे अमूल्य धरोहर जिसका पुरातन भारतीय संस्कृति व सभ्यता से गहरा नाता रहा है, उसे वन माफिया व आग के कहर से बचाना होगा।

वनों के संरक्षण से ही जंगली जानवरों का भी संरक्षण होगा, जिनका प्राकृतिक आशियाना तो जंगल ही है व इन पर असली हक भी उन्हीं का है। जंगलों में लगने वाली आग की घटनाओं के मद्देनजर सीमित हो रहे वनों के क्षेत्रफल के कारण कई वन्य जीवों तथा पक्षियों की प्रजातियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ चुका है, जिसमें हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला ‘हिमालयन सीरो’ तो लगभग विलोपन की कगार पर पहुंच चुका है, इसके अलावा तिब्बतियन वोल्फ, स्नो लैपर्ड, जाजुराना तथा मोनाल जैसे पक्षी भी इसी श्रेणी में शामिल हैं, यही हाल पर्यावरण संरक्षण में अहम रोल निभाने वाली गिद्धों का भी है। वनों की आग, ग्लोबल वार्मिंग के अलावा वन्य जीवों की घटती संख्या में शिकारियों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता।

राज्य में टूलेन, फोरलेन आदि निर्माण कार्यों के लिए कटते पेड़ों पर सुप्रीम कोर्ट को अपने कड़े तेवरों के साथ हस्तक्षेप करके इनके कटान को रोकना पड़ा। सड़कों की चौड़ाई के लिए इनके किनारों से काटे गए पेड़ों का कुछ लाभ हासिल नहीं हुआ, बल्कि प्रकृति का नुकसान तथा शहरों का नैसर्गिक सौंदर्य जरूर बर्बाद हुआ। प्रकृति के नियमों को ताक पर रखकर किया गया विकास जो विनाश को आमंत्रण दे ऐसे विकास कार्यों की उपलब्धियां गिनाने का कोई औचित्य नहीं बनता। अतः प्रतिदिन बढ़ते तापमान में हो रही प्रत्यक्ष वृद्धि से निपटने में संजीदगी न दिखाई तो ग्लोबल वार्मिंग की आंच से अंटार्कटिका जैसे ग्लेशियर पिघलकर समुद्र में होंगे, जिन्हें फिर इतिहास में ही तलाशना पड़ेगा।

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