पुस्तक मेलों के आयोजन से संतुष्ट नहीं हैं साहित्यकार

Apr 21st, 2019 12:05 am

 पुस्तक मेलों का औचित्य/किस्त-1

हिमाचल में कमोबेश पुस्तक मेले तो लगते हैं, किंतु इनके आयोजन से साहित्यकार संतुष्ट नहीं हैं। लेखकों का मत है कि पुस्तक मेलों को सरकार का सहयोग नहीं मिल पाता। उनका कहना है कि पंचायत व गांव स्तर पर पुस्तक मेलों का आयोजन होना चाहिए। उनका यह मत भी  है कि न केवल हिमाचली समाज, बल्कि पूरे भारतीय समाज का पुस्तकों से नाता नहीं जुड़ पा रहा है। साहित्यिक पत्रिकाओं की भूमिका को कई लेखक सिमटता देखते हैं, तो कई इसे बढ़ती हुई मानते हैं। पुस्तकालय कैरियर संबंधी पुस्तकों के अड्डे मात्र नहीं हैं, हां, उनमें सकारात्मक वातावरण पैदा करने की जरूरत अवश्य है। हिमाचल में पुस्तक मेलों के औचित्य पर साहित्यकारों व लेखकों की राय को व्यक्त करती यह सीरीज हम पाठकों के लिए लेकर आए हैं। इसमें हमने हर साहित्यकार से पांच प्रश्नों के जवाब जानने की कोशिश की। पेश है इसकी पहली कड़ी :

प्रश्नावलि

प्रश्न-1 : पुस्तक मेलों के आयोजन से आप कितने संतुष्ट हैं और अगर हैं तो क्यों?

प्रश्न -2 : पुस्तक मेलों का प्रारूप क्या होना चाहिए?

प्रश्न-3 : पुस्तकों से हिमाचली समाज का नाता क्यों नहीं जुड़ पा रहा है?

प्रश्न-4 : क्या साहित्यिक पत्रिकाओं की भूमिका अब सिमट रही है?

प्रश्न-5 : क्या पुस्तकालय अब कैरियर संबंधी किताबों का अड्डा हो गए हैं?

साहित्यकार एसआर हरनोट का नजरिया

उत्तर-1 : आज इंटरनेट, आभासी दुनिया और प्रायोजित टीवी चैनलों की बहसों ने जिस आक्रामकता से मनुष्य की सोच और समय दोनों पर हमले किए हैं, बच्चों और युवा पीढ़ी को इसने जिस पुरजोर तरीके से अपनी गिरफ्त में ले लिया है, उस समय में पुस्तक संस्कृति को बचाए रखना बेहद जरूरी हो गया है। इसका विकल्प केवल और केवल हर छोटी-बड़ी जगह पर पुस्तक मेले ही हो सकते हैं, बशर्ते कि उनमें जेन्युइन और रचनात्मक साहित्य को उचित स्थान मिले क्योंकि कुछ अर्से से यह देखा जा रहा है कि एक ख़ास किस्म की धर्मांधता पुस्तक मेलों पर हावी हो रही है। इससे बचना जरूरी है। इसलिए पुस्तक मेलों की प्रासंगिकता पहले से ज्यादा बढ़ गई है। इन दिनों जो पुस्तक मेले लग रहे हैं, हिमाचल की बात करें तो सरकार का कोई सहयोग उन्हें नहीं मिल पाता, इसलिए अच्छे प्रकाशक नदारद रहते हैं।

उत्तर-2 : विश्व पुस्तक मेले की तरह प्रति वर्ष हिमाचल में भी राष्ट्रीय पुस्तक मेला आयोजित होना चाहिए जिसे सरकार अपनी देखरेख में करे।

उत्तर-3 : इसलिए कि उस समाज तक पुस्तकें पहुंच ही नहीं पा रही हैं और जिन संस्थाओं के ऊपर यह दायित्व है, वे केवल नाममात्र की खरीद और पुस्तकों को बड़े पुस्तकालयों में डंप करने तक सीमित हैं। जब तक पंचायत स्तर तक पुस्तकों की प्रदर्शनियां नहीं लगेंगी, पुस्तकें आम आदमी से दूर रहेंगी।

उत्तर-4 : जी बिल्कुल। कहीं भी कोई प्रयास उनके प्रचार-प्रसार के लिए नहीं हो पा रहे हैं। सरकारें साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रति उदासीन हैं। हालांकि देश में निरंतर साहित्यिक पत्रिकाकी प्रकाशन संख्या बढ़ रही है, लेकिन उनकी सर्कुलेशन नाममात्र की है। सारिका या साप्ताहिक हिंदुस्तान की तरह आजकोई पत्रिका नहीं है जो आमजन तक पहुंच पाए।  उत्तर-5 : ऐसा भी नहीं है। पुस्तकालयों में आज भी कई योजनाओं के तहत पुस्तकें खरीदी जाती हैं, लेकिन पाठक नदारद हैं। पाठकों को आकर्षण के लिए कोई योजना पुस्तकालयों के पास नहीं है।

लेखक राजेंद्र राजन के विचार

उत्तर-1 :  देशभर में पुस्तक मेलों का प्रमुख आयोजक एनबीटी है। कहने को यह ट्रस्ट  है, पर है सरकारी नियंत्रण में। इसका मूल दायित्व पुस्तक संस्कृति को विकसित करना है, लेकिन यह कमाऊपूत है और प्रकाशकों से स्टाल के किराए के रूप में प्रतिवर्ष करोड़ों वसूलता है। मैं पुस्तक मेलों के आयोजन से कतई संतुष्ट नहीं हूं, क्योंकि ऐसे आयोजन ट्रस्ट में कार्यरत कुछ तथाकथित अधिकारी लेखकों और चहेते लेखकों के सैर-सपाटे का मंच हैं। कुछ लेखक धर्मशाला जहाज से पहुंच रहे हैं। सौजन्य होता है एनबीटी का। ट्रस्ट की गोष्ठियों व परिचर्चाओं का स्तर हमारी अकादमी और भाषा विभाग के आयोजन से भी बदतर होता है। श्रोता नदारद रहते हैं और हिमाचल के ‘जैनुअन’ लेखकों को आमंत्रित नहीं किया जाता।

उत्तर-2 :  अत्यंत खेदजनक है कि हिमाचल में एनबीटी की ओर से गत कई सालों से पुस्तक मेलों का आयोजन शिमला, कुल्लू, धर्मशाला जैसे ‘टूरिस्ट सिटीज’ तक सीमित है। पुस्तक संस्कृति के विकास के लिए जरूरी है कि छोटे-छोटे मेले गांवों तक पहुंचें। ये स्कूलों के प्रांगण में लगें, ताकि बच्चों में पुस्तकों के प्रति आकर्षण व संस्कार पैदा हो सके।

उत्तर-3 :  हिमाचल अपवाद नहीं, पूरे देश की यही स्थिति है। इंटरनेट, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया छपे हुए शब्द के दुश्मन हैं। हिमाचल का लेखक समाज भी ‘मेक बिलीव’ दुनिया में जी रहा है। हम लेखकों में पब्लिक डिस्कोर्स या ‘सेन्स ऑफ एप्रीसिएशन’ का नितांत अभाव है। हमने रचना को फेसबुक पर छद्म वाहवाही लूटने का माध्यम बना लिया है। प्रायोजित आलोचनाओं में जी रहे हैं। दूसरे, मुझे लगता है कि हिमाचल को रचनाशीलता में गुलेरी, यशपाल, निर्मल वर्मा जैसा सर्वश्रेष्ठ आना शेष है। गत 50 सालों में हिमाचल में ऐसा कुछ नहीं लिखा गया जो प्रांत की हदें लांघ कर देश व दुनिया में चर्चा का विषय बन जाए। हिमाचल में पुस्तकें पढ़ने का कल्चर विकसित नहीं हुआ है, उल्टे एक-दूसरे को नीचा दिखाने की संस्कृति पनप रही है।

उत्तर-4 : सिमट नहीं रही, बढ़ रही है। देश की बेहतरीन पत्रिकाओं में हिमाचल की रचनाशीलता बराबर बनी हुई है। नया ज्ञानोदय, हंस, वागर्थ, कथादेश, पहल और हिमाचल में विपाशा व हिमप्रस्थ उत्कृष्ट कार्य कर रही हैं। हिमप्रस्थ ने तो महात्मा गांधी के अलावा अनेक विशेषांक छापकर सबको चकित किया है। सभी बड़ी पत्रिकाओं ने कृष्णा सोबती पर विशेषांक निकाले हैं, जो चर्चा का विषय बने हैं।

उत्तर-5 :  हमारे पुस्तकालय मृतप्रायः हैं और खंडहर में तबदील हो रहे हैं। बहुत कम पाठक उनका रुख करते हैं। डिजिटल क्रांति ने पुस्तकालयों  को नष्ट कर दिया है। यह सही है कि शोध छात्र यहां आते हैं और करियर  संबंधी किताबों से सूचनाएं प्राप्त करने आते हैं। शिक्षा विभाग का कर्त्तव्य है कि वह स्कूली बच्चों को महीने में एक बार पुस्तकालयों में ले जाएं। वे किताबों को उलट-पलट कर तो देखें। बचपन के संस्कार बड़े होकर व्यक्तित्व निर्माण करते हैं।

साहित्यकार अजय पाराशर का मत

उत्तर-1 :  पुस्तक मेलों का आयोजन हमेशा मन को प्रसन्नता प्रदान करता है, किंतु संतुष्टि का स्तर या अनुभूति कैसी होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके आयोजन के पीछे कौन है? उसकी या उनकी मंशा क्या है? उदाहरण के लिए दिल्ली या कोलकाता में आयोजित होने वाले पुस्तक मेले का आयोजन अलग तरह का होता है और अगर यही मेला धर्मशाला या ऐसे ही किसी छोटे स्थान पर आयोजित हो, तो उसके उद्देश्यों के साथ, उसका स्तर भी बदल जाता है। अक्सर ऐसे स्थानों के मेले, आयोजन से पहले ही गुटबंदी का शिकार हो जाते हैं और प्रदर्शित पुस्तकों का स्तर भी अनुकरणीय नहीं होता है।

उत्तर-2 : बंधे-बंधाए खांचे के बाहर आकर, प्रारूप तय करना शायद ही आयोजकों को सुहाए। लेकिन पाठकों की रुचि को ध्यान में रखकर उनकी अधिक से अधिक सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। यह भी निश्चित किया जाना चाहिए कि केवल आयोजकों के पिट्ठू साहित्यकार ही विभिन्न सत्रों को न कब्जा लें। तमाम प्रतिभाशाली साहित्यकारों की उपस्थिति विभिन्न सत्रों में सुनिश्चित की जानी चाहिए। प्रायः देखा गया है कि पुस्तक मेलों को आकर्षक बनाने के लिए आयोजक ऐसे प्रसिद्ध व्यक्तियों को सत्रों की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित कर लेते हैं जिनका साहित्य से कोई लेना-देना नहीं होता। ऐसे पाठक, जो लेखन में रुचि रखते हों, उनके लिए विभिन्न कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए और खुले मन से उनकी जिज्ञासाओं के उत्तर दिए जाने चाहिए। 

उत्तर-3 :  हिमाचली समाज के सामने, यह प्रश्न सदियों से मुंह बाए खड़ा है और हम हैं कि इस समस्या का उत्तर ढूंढने की बजाय अन्य मुद्दों पर उलझते रहते हैं। आप इसके लिए केवल साहित्यकारों को ही दोष नहीं दे सकते। ऐसा नहीं है कि तमाम रचित या रचा जा रहा साहित्य, समाज के अनुकूल नहीं है। लेकिन बावजूद इसके हिमाचलियों का पुस्तकों से दूर-दूर का नाता नज़र नहीं आता। बंगाल, दक्षिणी तथा पश्चिमी राज्यों की स्थिति भिन्न है। पढ़ने का गुण हिमाचली समाज में कभी अंतर्निहित नहीं रहा; और इसके लिए आप नवीनतम प्रौद्योगिकी को नहीं कोस सकते। इसके अलावा हमारी शैक्षणिक व्यवस्था भी बच्चों में पाठक होने का भाव नहीं जगा पाती। यह गुण छोटी आयु में ही विकसित किया जा सकता है। घर और विद्यालय, दोनों स्थानों में यह प्रयास किया जाना चाहिए।

उत्तर-4 : मुझे लगता है कि भूमिका तो अब भी वही है, जो पहले थी, लेकिन उनका स्थान या महत्त्व हमारे जीवन में कई कारणों से घट गया है। माज़ी में मनोरंजन के साधन कम होने के चलते, पत्र-पत्रिकाओं का हमारे जीवन में अहम स्थान था और हमें अपने आप से जुड़ने के लिए उत्कृष्ट सामग्री उपलब्ध थी। किंतु पहले इडिअट बॉक्स और बाद में नेट, मोबाइल ने रही-सही कसर पूरी कर दी। किसी भी वस्तु के अस्तित्व के लिए उसकी भूमिका और महत्त्व पर्यायवाची हैं।

उत्तर-5 : इस प्रश्न का उत्तर, प्रश्न में ही निहित है, जो बेहद दुर्र्भाग्यपूर्ण है। कुछ अरसा पहले, राज्य पुस्तकालय की दुर्दशा के समाचार सामने आए थे। अगर हम ज़िला पुस्तकालयों की बात करें तो यहां अधिकांश साहित्यिक पुस्तकें ऐसी हैं, जो अब तक अल्मारी से बाहर ही नहीं आ पाई हैं। यहां केवल छात्र ही नज़र आते हैं, जो केवल प्रतियोगिता की तैयारी तक महदूद हैं। अगर आप उन्हें केवल वाचनालय भी उपलब्ध करवाएं तो वे कभी पुस्तकालय न होने की शिकायत करते नज़र नहीं आएंगे। ऐसे पुस्तकालयों में स्तरीय करियर पुस्तकें भी उपलब्ध नहीं होती।

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