बाबा जी से कितनी दूर महिला

राजेंद्र राजन

साहित्यकार

प्रतिवर्ष चढ़ावे के रूप में अपनी झोली में करोड़ों भरने वाला मंदिर पुरुष श्रद्धालुओं की सुरक्षा करने में तो सक्षम है, महिलाओं के मामले में वह कोई रिस्क नहीं ले सकता। केरल में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर घोर राजनीति जारी है। वोट बैंक हावी है। सबरीमाला कई कारणों से राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है, लेकिन बाबा बालकनाथ मंदिर में महिलाआें के प्रवेश पर पाबंदी व उन्हें रिमोट से दर्शन के लिए बाध्य करना शायद कभी भी मुद्दा न बने…

हमीरपुर से 45 किलोमीटर दूर स्थित बाबा बालकनाथ मंदिर पुनः चर्चा में है। श्रद्धालुओं से कायराना दुर्व्यवहार, फिर उनका धरना प्रदर्शन मंदिर प्रबंधन में खामियों को उजागर करता है। नवरात्र में बेशुमार भीड़ को नियंत्रित करना और श्रद्धालुओं को तनावरहित व सद्भावपूर्ण माहौल में दर्शन करवाने का दायित्व प्रबंधन पर है। दशकों से अन्य मंदिरों की तर्ज पर बाबा बालकनाथ शक्तिपीठ भी सरकार के नियंत्रण में है। करोड़ों की आय से अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित हो रही हैं, मगर भीड़ वाले दिनों या त्योहारों में इस मंदिर में प्रवेश पाना किसी यातना से गुजरने के समान है। साफ-सफाई, लंगर व्यवस्था, पार्किंग व भीड़ को रेगुलर करने के लिए जिस कुशलता और कल्पनाशीलता की दरकार होती है, उसका नितांत अभाव यहां देखने को मिलता है। श्रद्धालु ही अगर आंदोलन पर उतर आएं, तो प्रदेश के बाहर देश के अन्य राज्यों में हिमाचल की छवि का दागदार होना लाजिमी है, लेकिन इससे बड़ा मुद्दा यह है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद महिलाओं को बाबा की पिंडी के दर्शनों से वंचित रखा जा रहा है, उन्हें एक चबूतरे यानी रिमोट से दर्शन कराए जाते हैं, जिसका विरोध यदा कदा देखने को मिल जाता है।

पिछले साल भी एक महिला ने बाबा बालकनाथ की पिंडी के दर्शन करने चाहे थे, तो सुरक्षा कर्मियों और पुजारियों द्वारा दर्शन करने से रोका गया तो उसने मंदिर प्रशासन के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। खबर कुछ अखबारों की सुर्खियां बनीं और डीसी तक शिकायत पहुंची, लेकिन लीपापोती के अलावा कुछ भी ठोस नहीं हुआ। पुनः मंदिर में महिलाओं की एंट्री या दर्शन पर अघोषित पाबंदी चर्चा में है। एक रिपोर्ट के मुताबिक हद तो तब सामने आई जब चंद रोज पहले हमीरपुर की उपायुक्त संभवतः मंदिर के निरीक्षण व मीटिंग के लिए यहां पहुंचीं और महिलाओं के लिए बने चबूतरे से ही बाबा के दर्शन कर संतुष्ट हो गईं और स्वयं को उन्होंने धन्य समझा। चाहिए तो यह था कि वे महिला श्रद्धालुओं के साथ बाबा की पिंडी में माथा टेकने जातीं और मीडिया में इस दर्शन की चाह करतीं, ताकि उनका यह प्रयास पूरे देश में सकारात्मक संदेश के रूप में देखा जाता, लेकिन रिचा वर्मा ने शायद पुजारियों और प्रबंधन की सलाह पर सांकेतिक दर्शन का रास्ता चुना, जिसे उचित नहीं ठहराया जा सकता। हिमाचल में महिला अधिकारों की पैरवी करने वाले एक्टिविस्ट मीडिया में वूमन एंपावरमेंट के नारे बुलंद कर अपने निजी स्वार्थ साधने का कोई मौका नहीं चूकते, लेकिन बाबा बालकनाथ मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर उनकी जुबान को सांप सूंघ जाता है। यह दोहरे मापदंडों का सूचक है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस मंदिर में पुजारियों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को पराजित कर रखा है। मंदिर प्रबंधन का जिम्मा सुरक्षा कर्मियों व पुजारियों को नियमानुसार दिशा-निर्देश देना है, न कि रूढि़यों व परंपराओं के आधार पर स्वयं को पंगु बना लेना? इस विषय पर जब मेरा संवाद मंदिर कमेटी के चेयरमैन व एसडीएम बड़सर विशाल शर्मा से हुआ तो उनका अत्यंत नेगेटिव दृष्टिकोण सामने आया। उनका कहना था कि बाबा की पिंडी तक की सीढि़यां बेहद संकरी हैं। वहां महिलाआें की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती।

अतः वे चबूतरे में खड़े होकर रिमोट से ही दर्शन कर ‘खुश’ हो जाती हैं। शायद उनका तर्क यह है कि जब महिलाओं को आपत्ति नहीं है तो मुझ जैसे लेखक को फिकरमय होने की क्या जरूरत? एसडीएम बड़सर की दलील किस कद्र बेहूदा व अटपटी प्रतीत होती है। यानी प्रतिवर्ष चढ़ावे के रूप में अपनी झोली में करोड़ों भरने वाला मंदिर पुरुष श्रद्धालुओं की सुरक्षा करने में तो सक्षम है, महिलाओं के मामले में वह कोई रिस्क नहीं ले सकता।

यह संविधान में वर्णित ‘राइट टू इक्वेलिटी’ की धारा की मूल भावना के विरुद्ध है, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट बार-बार पूरे देश के राज्यों की सरकारों को अपने आदेश सुना चुका है, लेकिन बाबा बालकनाथ मंदिर के मामले में मंदिर प्रशासन व जिला प्रशासन के विरुद्ध शिमला में बैठी सरकार कोई एक्शन लेगी कोई नहीं जानता। केरल में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर घोर राजनीति जारी है। वोट बैंक हावी है। सबरीमाला कई कारणों से राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है, लेकिन बाबा बालकनाथ मंदिर में महिलाआें के प्रवेश पर पाबंदी व उन्हें रिमोट से दर्शन के लिए बाध्य करना शायद कभी भी मुद्दा न बने? हमीरपुर को देश भर के सभी जिलों में विकास की कसौटी पर सर्वाधिक विकसित जिला होने के खिताब से अलंकृत किया जाता है। मगर यहां का प्रशासन मानसिक रूप से बेहद पिछड़ा दिखाई देता है और परंपराओं की अदृश्य बेडि़यों में जकड़ा प्रतीत होता है।

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