बेरोजगारी और विषमता

भारत डोगरा

स्वतंत्र लेखक

निर्धनता दूर करने का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि सभी के लिए संतोषजनक रोजगार उपलब्ध हों तथा रोजगारों से जुड़ी विभिन्न विषमताओं को कम किया जाए। इस संदर्भ में यदि भारत की स्थिति को देखा जाए, तो हमारे देश में रोजगार से जुड़ी विषमताएं अनेक स्तर पर मौजूद हैं व उन्हें दूर करने की दिशा में अभी बहुत कुछ करना शेष है। इनमें से अनेक विषमताओं की ओर हाल ही में जारी की गई विख्यात वैश्विक एनजीओ ‘आक्सफैम-इंडिया’ की रिपोर्ट ‘विषमताओं पर ध्यान दें- भारत में रोजगार की स्थिति’ (माइंड द गैप्स) ने ध्यान दिलाया है। ‘राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थान’ के नवीनतम बेरोजगारी सर्वेक्षण (2011-12) ने बताया है कि इस वर्ष देश में 15 से 64 आयु वर्ग के 40.2 करोड़ व्यक्ति रोजगार में थे। इनमें से 29 करोड़ (72 प्रतिशत) पुरुष थे व 11 करोड़ (28 प्रतिशत) महिलाएं थीं। कुल रोजगार करने वालों में से  20.6 करोड़ (51.4 प्रतिशत) स्व-रोजगार में थे व शेष 19.6 करोड़ मजदूरी या वेतन अर्जन कर रहे थे। इन 19.6 करोड़ मजदूरी या वेतन अर्जन करने वालों में से 12.1 करोड़ (62 प्रतिशत) अस्थायी तरह का रोजगार करते थे, जबकि मात्र  7.5 करोड़ (38 प्रतिशत) ही स्थायी रोजगार में थे। महिला कामगारों में मात्र 30 प्रतिशत स्थायी या वेतन प्राप्त करने वाले रोजगार में थीं। अस्थायी रोजगारों में स्थायी वेतन वाले रोजगारों की अपेक्षा औसत आय मात्र 36 प्रतिशत पाई गई। इस वर्ष राष्ट्रीय औसत दैनिक मजदूरी 247 रुपए पाई गई, पर शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत फर्क पाया गया। शहरी क्षेत्रों में यह मजदूरी 384 रुपए पाई गई, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह मात्र 175 रुपए पाई गई। महिलाओं की भागीदारी श्रम-शक्ति में कम ही नहीं पाई गई, अपितु मजदूरी में भी उनसे बहुत अन्याय देखा गया। एक से कार्य को, एक ही योग्यता से करने पर भी महिलाओं को पुरुषों से 34 प्रतिशत कम वेतन मिलता हुआ पाया गया है। वैश्विक स्तर पर यह अंतर बहुत अधिक माना गया है। स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्ट-2018 के अनुसार भारत में 82 प्रतिशत पुरुषों और  92 प्रतिशत महिलाओं की मासिक आय 10,000 रुपए प्रतिमाह से कम है, जो एक बहुत चिंताजनक स्थिति है। सातवें वेतन आयोग ने तय किया था कि न्यूनतम मासिक आय 18,000 रुपए होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए कृषि सबसे बड़ा रोजगार बना हुआ है, पर इस क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। अनेक दलित महिला मजदूरों की स्थिति बंधुआ मजदूरों जैसी है। शहरी क्षेत्रों में घरेलू कर्मियों में 81 प्रतिशत महिलाएं व तंबाकू-बीड़ी के कार्य में 77 प्रतिशत महिलाएं हैं। इन दोनों कार्यक्षेत्रों में स्थितियां कई स्तरों पर अन्यायपूर्ण हैं। अनेक संघर्षों के बाद मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए कुछ कानून बने हैं, पर उनका लाभ मजदूरों के कम हिस्से को ही मिल सका है। श्रम कानूनों में जो सुधार इस समय प्रस्तावित हैं, उनमें से अनेक मजदूरों के हितों के विरुद्ध जा सकते हैं। विभिन्न उद्योगों में ठेका मजदूरों का प्रचलन रहा है। ठेका मजदूर उन अनेक अधिकारों व सुविधाओं से वंचित होते हैं, जिनका लाभ स्थायी कर्मियों को मिलता है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संस्थान (एनएसएसओ) के अंतिम दो रोजगार सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2004-05 और 2011-12 के बीच प्रति वर्ष स्थायी रोजगारों का सृजन लगभग 25 लाख था। वर्ष 2011-12 व 2016 के बीच स्थायी रोजगारों में शुद्ध वार्षिक वृद्धि लगभग 15 लाख पर सिमट गई। इतना ही नहीं, ऐसे स्थायी कामगारों का हिस्सा श्रम-शक्ति में कम हुआ, जिनके पास प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी, पेंशन, बीमा आदि का सहारा है। लगभग आधे स्थायी मजदूरों को वर्ष 2004-05 में किसी रूप में सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध थी। यह प्रतिशत 2011-12 में 45 व वर्ष 2016 में  38 हो गया। एनएसएसओ के अनुसार केवल एक-तिहाई भारतीय मजदूरों के पास कोई लिखित अनुबंध है। 28 प्रतिशत मजदूर ही संगठित मेन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में हैं और उनमें से कइयों के रोजगार में सुरक्षा कम हुई है। उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 और 2013 के बीच संगठित मेन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की कुल श्रम-शक्ति में ठेके के मजदूरों का हिस्सा लगभग दोगुना हो गया है। ठेके के कामगार एक स्थायी रोजगार वाले व्यक्ति से एक-तिहाई से भी कम आय अर्जित करते हैं। इससे आय व कार्य की गुणवत्ता में असमानता उत्पन्न होती है। अब तो सरकारी सेवाओं में भी डाक्टरों, नर्सों व अध्यापकों के अनुबंध की शर्तों पर कार्य करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। श्रम मंत्रालय के पांचवें वार्षिक रोजगार व बेरोजगारों के सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार 77 प्रतिशत भारतीय परिवारों में नियमित वेतन वाला एक भी सदस्य नहीं पाया गया। आक्सफैम की इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी एक बड़ा संकट है। इस संकट का उचित समय पर समाधान न हुआ, तो इसका समाज की स्थिरता और शांति पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। एक ओर जो दसियों-लाख युवा श्रम-शक्ति में प्रतिवर्ष आ रहे हैं, उनके लिए पर्याप्त रोजगार नहीं हैं, दूसरी ओर इन रोजगारों की गुणवत्ता व वेतन अपेक्षा से कहीं कम हैं। लिंग, जाति व धर्म आधारित भेदभावों के कारण भी अनेक युवाओं को रोजगार प्राप्त होने में अतिरिक्त समस्याएं हैं। इस चिंताजनक स्थिति को सुधारने के लिए इस रिपोर्ट ने व्यापक स्तर पर सुधार की संस्तुतियां प्रस्तुत की हैं। विकास में प्राथमिकता श्रम-सघन क्षेत्रों को देनी चाहिए, ताकि अधिक रोजगारों का सृजन हो। रोजगार में वृद्धि समावेशी होनी चाहिए। नए रोजगारों में रोजगार सुरक्षा, बेहतर कार्य स्थितियां, सामाजिक सुरक्षा लाभ व संगठन बनाने का अधिकार उपलब्ध रहना चाहिए। स्वास्थ्य व शिक्षा में अधिक निवेश से उत्पादकता में सुधार होगा। कुशलता बढ़ाने पर बेहतर ध्यान देना चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में टिक सकें। विषमता व बेरोजगारी बढ़ाने वाले अन्य कारकों जैसे ‘याराना पूंजीवाद’ (क्रोनी कैपिटलिस्म) को नियंत्रित करना चाहिए। कर-नीतियों में विषमता की दर कम होनी चाहिए। कारपोरेट टैक्स में छूट देने का अतिरिक्त उत्साह उचित नहीं है। इस तरह जो अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो, उसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य व सामाजिक सुरक्षा  सुधारने के लिए करना चाहिए।

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