लोकलुभावन नीतियां और महंगाई

Apr 23rd, 2019 12:04 am

डा. अश्विनी महाजन

एसोसिएट प्रो. पीजीडीएवी कालेज, दिल्ली विवि.

दुनिया के इतिहास में कमरतोड़ महंगाई के कई उदाहरण मिलते हैं, जिसने आम आदमी के लिए भारी मुश्किलें खड़ी कर दीं। अमीरों के लिए महंगाई एक चर्चा का विषय होता है, लेकिन मध्यम वर्ग और गरीब के लिए यह जीवन दूभर कर देती है। कल्पना करें कि एक मेहनतकश मजदूर 200 से 300 रुपए की दिहाड़ी पाता है और उससे उसको अपने परिवार का गुजर-बसर करना होता है। कमरे का किराया, भोजन, स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा समेत उसे कई खर्च करने होते हैं। यदि महंगाई बढ़ती है, तो उसकी बदहाली की कल्पना आसानी से की जा सकती है। कमोबेश यही हालत मध्यम वर्ग की होती है। भारत में भी महंगाई का भयावह इतिहास रहा है। दो अंकों में महंगाई आम बात रही है। 1982 में उपभोक्ता कीमत सूचकांक का आधार वर्ष बदला गया। 1992 में औद्योगिक श्रमिकों के लिए उपभोक्ता कीमत सूचकांक का आधार वर्ष बदला गया और देखते हैं कि 1982 और 1992 के बीच यह सूचकांक 100 से बढ़ता हुआ, 1992 में 219 तक पहुंच गया, यानी 119 प्रतिशत वृद्धि यानी 8.2 प्रतिशत वार्षिक। यदि 1998-99 से 2003-04 का कालखंड देखें, तो कीमत सूचकांक 414 से महज 500 प्रतिशत तक ही पहुंचा, यानी सालाना मात्र 3.7 प्रतिशत वृद्धि। गौरतलब है कि महंगाई से यह राहत अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कालखंड में मिली, लेकिन यह राहत अल्पकालिक ही साबित हुई और 2004 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए शासन में दोबारा लौट आई थी। फिर से महंगाई ने गति पकड़ ली थी तथा उपभोक्ता कीमत सूचकांक (औद्योगिक श्रमिकों के लिए) फिर से तेजी से बढ़ता हुआ 2013-14 में 1106.6 तक पहुंच चुका था, यानी सालाना 8.3 प्रतिशत की महंगाई। फिर 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने सत्ता के सूत्र संभाले, तो महंगाई फिर नीचे आने लगी। 2014 से 2019 के बीच उपभोक्ता कीमत सूचकांक अप्रैल 2014 में 242 से जनवरी 2019 तक मात्र 307 तक ही बढ़ा, यानी सालाना महज 4.1 प्रतिशत वृद्धि। सीधे-सीधे पता चलता है कि पिछले लगभग चालीस वर्षों के इतिहास में 11 वर्ष के एनडीए शासन में महंगाई चार प्रतिशत या उससे कम रही, जबकि शेष समय अधिकांशतः  यह आठ प्रतिशत या उससे ज्यादा रही। यह महज एक संयोग नहीं हो सकता कि जब-जब एनडीए सरकार आती है, महंगाई थम जाती है। यदि अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार महंगाई का कारण समझने की कोशिश करें, तो ध्यान में आता है कि महंगाई का मुख्य कारण मांग में वृद्धि होता है। यूं तो मांग में वृद्धि के कारण उत्पादन भी बढ़ता है, लेकिन यदि मुद्रा की पूर्ति भी साथ-साथ बढ़ती है, तो कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। 1982 में जनता के पास करेंसी की कुल मात्रा 145 अरब रुपए थी, जो 1992 में बढ़कर 611 अरब रुपए हो गई, यानी 15.6 प्रतिशत सालाना की वृद्धि। इतनी तेजी से जनता के पास करेंसी में वृद्धि का असर यह हुआ कि महंगाई 8.2 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ी। जैसे ही हम एनडीए की पहली पारी (अटल बिहारी वाजपेयी का कालखंड) में प्रवेश करते हैं, तो 1997-98 में जनता के पास करेंसी की कुल मात्रा जो 1997-98 में 1456 अरब रुपए थी, वह 2003-04 तक 3150 अरब रुपए तक ही पहुंची, यानी सालाना मात्र 13.7 प्रतिशत की वृद्धि। जनता के पास करेंसी बढ़ने की गति धीमे होते ही महंगाई की दर 3.7 प्रतिशत पर आ गई, लेकिन 2004 से 2014 के बीच यूपीए की दो पारियां फिर से जनता के पास करेंसी की ग्रोथ में वृद्धि अंकित करती हैं। हम देखते हैं कि 2003-04 में जनता के पास करेंसी की मात्रा में पूर्ति 3150 अरब रुपए से बढ़कर 2013-14 में 12458 अरब रुपए तक पहुंच गई, यानी सालाना 14.7 प्रतिशत की सालाना वृद्धि। जनता के पास करेंसी की मात्रा में आई फिर से वृद्धि ने महंगाई को पुनः 8.2 प्रतिशत सालाना पर पहुंचा दिया। 2014 में पुनः एनडीए की सरकार आने के बाद हम देखते हैं कि जनता के पास करेंसी की मात्रा अप्रैल 2014 में 12458 अरब रुपए से बढ़कर फरवरी 2019 तक 20295 अरब रुपए तक पहुंची, यानी मात्र 10.3 प्रतिशत की सालाना वृद्धि। यानी समझ सकते हैं कि एनडीए की दोनों पारियों में जनता के पास करेंसी की मात्रा बढ़ने की गति कम थी और महंगाई बढ़ने की दर भी। हालांकि रिजर्व बैंक के पास करेंसी छापने का अधिकार होता है, तो भी रिजर्व बैंक सामान्यतः तभी करेंसी छापता है, जब केंद्र सरकार उससे उधार लेकर अपने बजट की भरपाई करती है। जब-जब कांग्रेस सत्ता में आती है, भ्रष्टाचार और लोकलुभावन नीतियों का अंततोगत्वा असर सरकारी घाटे पर पड़ता है और सरकारी घाटे की भरपाई के लिए रिजर्व बैंक करेंसी छापता है। देखा गया है कि जब-जब कांग्रेस सत्ता में आती है, तब-तब वह अत्यंत गैर जिम्मेदाराना तरीके से राजकोषीय घाटा बढ़ा देती है और उसका अधिकांश हिस्सा रिजर्व बैंक से उधार लेकर पूरा किया जाता है, जिससे जनता के पास करेंसी की मात्रा बढ़ती है, जो मुद्रा की पूर्ति को बढ़ाती है तथा महंगाई को भी। यहीं से पता चलता है कि जब-जब कांग्रेस की सरकार आई, तब-तब महंगाई बढ़ने की दर औसतन आठ प्रतिशत से ज्यादा हो गई और जब-जब एनडीए की सरकार आई, महंगाई बढ़ने की दर चार प्रतिशत या उससे कम हो गई। माना जा सकता है कि एनडीए सरकार ने चाहे वह अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार हो या नरेंद्र मोदी की, राजकोष का प्रबंधन अत्यंत जिम्मेदारी से किया, जिसका सीधा-सीधा फायदा आम जनता को पहुंचा, क्योंकि महंगाई पर काबू किया जा सका। चुनावों का माहौल है और कांग्रेस पार्टी ने गरीब जनता को लुभाने के लिए एक पैंतरा फेंका है। इस पैंतरे का नाम है ‘न्याय’ यानी न्यूनतम आय योजना। कांग्रेस पार्टी यह दावा कर रही है कि यदि वह सत्ता में आई, तो वह 5 करोड़ गरीब परिवारों को 72 हजार रुपए की न्यूनतम सालाना आय प्रदान करेगी। इसका सीधा मतलब है कि सरकारी खर्च में 360000 करोड़ रुपए की वृद्धि, यानी दो प्रतिशत जीडीपी के बराबर। जाहिर है कांग्रेस सरकार सत्ता में आने के बाद इसकी भरपाई राजकोषीय घाटा बढ़ाकर यानी अतिरिक्त नोट छाप कर करेगी और फिर से शुरू हो जाएगा महंगाई का कुचक्र। जरूरत इस बात की है कि आम जनता इस बात को समझे और इस प्रकार के लुभावने दुष्चक्र में न फंसे, क्योंकि महंगाई का यह टैक्स कुछ लोगों को नहीं, बल्कि सारी जनता को अदा करना होगा।

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