सरकारी शिक्षा की दुरावस्था सुधारो

Apr 16th, 2019 12:06 am

उत्तम चंद डोगरा

लेखक, मंदल से हैं

 

भाई-भतीजावाद बंद करना होगा। अध्यापकों के स्थानांतरण के लिए 25 किलोमीटर दूरी का नियम सख्ती से लागू करना होगा। घर के पास या 5-7 किलोमीटर के दायरे में ही नौकरी की चाह रखना उन अध्यापकों की कमजोरी को दर्शाता है। हां, 50-55 की आयु के बाद या लंबी बीमारी इसका विकल्प हो सकता है, लेकिन राजनीतिक पहुंच शिक्षा व्यवस्था के लिए हितकारी नहीं है। राज्य या राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चयन के समय इस बात को भी प्रमुख रूप से देखा जाना चाहिए कि उस अध्यापक के सेवाकाल में 25 किलोमीटर के बाहर का कितना सेवाकाल रहा है…

सरकार भले ही सरकारी शिक्षा की बेहतरी के लिए सैकड़ों दावे कर ले, लेकिन सरकारी स्कूलांे में शिक्षा व्यवस्था की छिपी हुई सच्चाई कुछ और ही है। कुछ सरकारी स्कूलांे में अध्यापकांे का दबंगपन आज भी अभिभावकों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों मंे ले जाने से उनके कदम पीछे खींचता है। सरकारी स्कूलों के अध्यापक गरीब और भोले-भाले अभिभावकों को स्कूलों में वह सम्मान नहीं देते, जो उन्हें देना चाहिए। अगर कोई अभिभावक बच्चों की भलाई के लिए कोई सुझाव देना चाहे, तो उसे राजनीति का शिकार बना दिया जाता है और अध्यापक अपनी राजनीतिक या आधिकारिक पहुंच दिखाकर उस अभिभावक की आवाज को दबाने का प्रयत्न करता है और अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए चुप रहना ही बेहतर समझता है। यही कारण है कि बच्चों के अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजना चाहते।

अध्यापक शिक्षा व्यवस्था पर खरा उतरे, चाहे न उतरे, लेकिन उसकी राजनीतिक पहुंच कहां तक है, यह ज्यादा मायने रखता है। सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को राजनीतिक शरण के कारण 5-7 किलोमीटर मंे वर्षों तक टिकाए रखना शिक्षा व्यवस्था की बहुत बड़ी खामी है। यह टिकाऊपन अध्यापकों को दबंग बना रहा है और गांव के भोले-भाले लोग उनके दबंगपन का शिकार होने के लिए मजबूर हैं। कुछ स्कूल प्रबंधन समितियों में निष्पक्ष रूप से लोग चुने नहीं जाते हैं, इनमें केवल ‘यशमान’ प्रवृत्ति वाले लोगों को अधिक महत्त्व दिया जाता है, जो स्कूल में होने वाली कमियों के बारे में अपना मुंह नहीं खोलते हैं। सरकार समय-समय पर शिक्षकों के लिए कई दिशा-निर्देश जारी करती है, लेकिन दबंग अध्यापक उन निर्देशों का पालन करना भी जरूरी नहीं समझते, क्योंकि इसके पीछे उनकी मजबूत आधिकारिक और राजनीतिक पकड़ रहती है, परंतु यह मजबूत पकड़ देश को जरूर कमजोर बना रही है। कई सरकारी आदेश, सरकारी अध्यापकों के आगे धूल फांक रहे हैं। सरकार ने स्कूलों में सादे ड्रेस में आने के आदेश दे रखे हैं, लेकिन आज भी बहुत से शिक्षक जीन पैंट पहनने में अपनी शान समझते हैं। बच्चों की नोटबुक तिथि सहित चैक करने की आदत भी कुछ दबंग अध्यापकों ने नहीं डाली। बायोमीट्रिक मशीनें अध्यापकों की समय पर हाजिरी सुनिश्चित करने में असफल रही हैं। जो अध्यापक राजनीतिक पहुंच के चलते 5-10 किलोमीटर में ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं, वे सुबह-शाम सही समय मशीन में दर्शाकर दिन में अपना काम करके, पुनः तीन बजे हाजिरी के समय स्कूल पहुंच जाते हैं। क्या कर लेगी सरकार उनका और क्या कर लिया? जब सरकार ने एक स्कूल से दूसरे स्कूल में तबादले का 25 किलोमीटर दूरी का नियम बनाया था, तो सरकार अपने ही फैसले से क्यों पीछे हट गई? क्या मात्र अपने चहेतों को पांच-सात किलोमीटर में ही नौकरी करवाने के लिए? इसलिए बायोमीट्रिक मशीनें अध्यापकों को बांधने में पूरी तरह असफल रही हैं और सरकारी धन का भी दुरुपयोग हुआ है। अगर अध्यापक का तबादला तीन वर्षों के बाद नियमानुसार एक स्कूल से दूसरे स्कूल में 25  या 15 किलोमीटर दूरी पर ही बदला जाता, तो वह उस स्कूल मंे पहुंच कर उसी स्कूल का हित सोचता। वहां की जनता और अभिभावकों का उसे डर रहता, बल्कि अध्यापकों पर भी अपने विधानसभा क्षेत्र में नौकरी न करने का नियम लागू होना चाहिए, क्योंकि अपने विधानसभा क्षेत्र में सेवाएं देने से न उन्हें चुने हुए प्रतिनिधि का डर रहता है और न ही अभिभावकों का, क्योंकि चुना हुआ प्रतिनिधि उनमंे अपना वोटबैंक देखता है और अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य। यही कारण है कि सरकारी स्कूलों से बच्चों का पलायन जारी है।

आज सरकार करोड़ों रुपए सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर खर्च कर रही है, लेकिन यह पूरी तरह से इसलिए फलीभूत नहीं हो रहे, क्योंकि सरकार जो कार्य बिना पैसों से कर सकती है, उन्हें कर पाने में भी असफल रही है। कोई भी व्यवस्था तभी फलीभूत होगी, जब कड़े नियम लागू होंगे। पहले भाई-भतीजावाद बंद करना होगा। अध्यापकों के स्थानांतरण के लिए 25 किलोमीटर दूरी का नियम सख्ती से लागू करना होगा। घर के पास या 5-7 किलोमीटर के दायरे में ही नौकरी की चाह रखना उन अध्यापकों की कमजोरी को दर्शाता है। उनके मेहनतकश न होने का अंदाजा इसी से ही लगाया जा सकता है।

हां, 50-55 की आयु के बाद या लंबी बीमारी इसका विकल्प हो सकता है, लेकिन राजनीतिक पहुंच शिक्षा व्यवस्था के लिए हितकारी नहीं है। आज उन अध्यापकों की भी कमी नहीं है, जो वर्षों से 30-35 किलोमीटर के बाहर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जो उनके जुझारूपन, मजबूत आत्मविश्वास, मेहनती होने का प्रमाण देता है।  राज्य या राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चयन के समय इस बात को भी प्रमुख रूप से देखा जाना चाहिए कि उस अध्यापक के सेवाकाल में 25 किलोमीटर के बाहर का कितना सेवाकाल रहा है। अगर नहीं रहा है, तो ऐसे अध्यापकों को शिक्षक पुरस्कार के लिए पात्र नहीं माना जाना चाहिए।

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