सियासत ने दिखाई ‘जात’

1952 के प्रथम आम चुनाव से ‘जातीय समीकरण’ का जो सिलसिला शुरू हुआ था, आज उसने उग्रता और कट्टरता का रूप धारण कर लिया है। 1955 में ‘वोट बैंक’ की अवधारणा भी स्थापित कर दी गई। आज पंचायत से लेकर संसदीय चुनावों तक राजनीतिक दल इसी अवधारणा में विभाजित हैं। दिलचस्प है कि आज भारत 21वीं सदी में प्रवेश करने के बाद विविध स्तरों पर विकसित और विस्तृत हो रहा है, लेकिन अब भी औसतन 55 फीसदी नागरिक जातीय आधार पर सोचते हैं, उसे अहमियत देते हैं और उसी आधार पर वोट देना पसंद करते हैं। अनपढ़ों में करीब 63 फीसदी लोग जातीय आधार पर ही वोट देते हैं। उनके लिए काम, कार्यक्रमों, योजनाओं का कोई मतलब नहीं है। वे जातीय उम्मीदवार के बाहर जाना ही नहीं चाहते। ये निष्कर्ष भी कई अध्ययनों और सर्वेक्षणों के बाद स्पष्ट हुए हैं। मौजूदा आम चुनाव के दौरान जब बसपा प्रमुख मायावती ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘नकली’ और ‘फर्जी पिछड़ा’ करार दिया, तो आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि यही वोट बैंक की सियासत है। राजद नेता एवं लालू प्रसाद के छोटे बेटे तेजस्वी यादव ने भी मोदी को ‘फर्जी ओबीसी’ करार दिया। जवाब में प्रधानमंत्री को कबूल करना पड़ा कि वह पिछड़े नहीं, अति पिछड़ी जाति में पैदा हुए हैं। केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने भी इसकी पुष्टि की है। दरअसल यह बहस ही शुरू नहीं होनी चाहिए थी। यह ग्राम पंचायत या नगरपालिका का चुनाव नहीं है, बल्कि देश की 17वीं लोकसभा चुनने के लिए चुनाव-प्रक्रिया जारी है। यह राष्ट्रीय चुनाव है, जिसमें अंततः नए प्रधानमंत्री का भी चुनाव किया जाना है, देशभर से 543 सांसद चुने जाने हैं। मायावती और तेजस्वी ने यहां तक बयान दिए हैं कि मोदी जन्मजात ‘अगड़े’ हैं,यानी बड़ी जाति के हैं, लेकिन राजनीतिक फायदे के लिए वह ‘पिछड़े’ बन गए हैं। क्या वाहियात विमर्श है? बुनियादी सवाल यह है कि क्या एक आम चुनाव जात-पात के आधार पर ही लड़ा जाएगा? क्या 2019 के भारत का भविष्य और विकास अगड़े-पिछड़े, मुस्लिम-यादव, दलित-पिछड़े और अति पिछड़े-महादलित आदि जातीय और सामुदायिक समीकरणों पर ही तय होगा? दरअसल यह कानूनन आपराधिक हरकत है। जन प्रतिनिधित्व कानून,1951 के मुताबिक, दो समुदायों के बीच मतभेद, खटास, नफरत पैदा करने की कवायद पर कानूनन कार्रवाई की जा सकती है। तीन साल तक की जेल भी हो सकती है। संविधान में उल्लेख है और सर्वोच्च न्यायालय का भी फैसला है कि जाति,धर्म, समुदाय, मत, संप्रदाय आदि के नाम पर वोट नहीं मांगे जा सकते। इस तरह वोट मांगना ‘भ्रष्ट आचरण’ है, लेकिन इसका सरेआम उल्लंघन किया जाता रहा है। मुलायम सिंह ने ‘यादवों’ को लामबंद कर रखा है और साथ में मुसलमानों को भी अपने साथ लगाए रखने की कोशिश की है। लगभग यही सियासत बिहार में लालू ने की थी। इस वोट बैंक को ‘एमवाई’ का नाम दिया गया है। मायावती जन्मजात ‘जाटव’ हैं, लिहाजा यह दलित समुदाय उन्हें ही अपना नेता मानता रहा है। सभी दलित वर्ग मायावती के साथ नहीं हैं, लिहाजा उन्होंने पिछड़ों,अति पिछड़ों, मुसलमानों को भी आकर्षित करने का प्रयास किया है। सियासत की यही मजबूरी है कि मायावती को आज मुलायम सिंह को ‘जन्मजात पिछड़ा’ करार देना पड़ा है। अलबत्ता दोनों ही नेता करीब 26 साल तक विपरीत धु्रव की तरह राजनीति करते रहे हैं। चूंकि अब पिछड़ों और अति पिछड़ों के नए नेतृत्व के तौर पर मोदी का नाम भी चर्चा में है, यह वोट बैंक बंटने या छिनने के आसार हैं, सियासी मलाई भी सूख सकती है, लिहाजा ‘जातीय गालीबाजी’ शुरू हुई है। दरअसल 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें स्वीकार कर उन्हें सरकारी स्तर पर लागू करने के बाद ‘पिछड़ेपन’ की सियासत ज्यादा ‘जातिगत’ हुई है। अब कोई कुर्मी, कोई निषाद, कोई लोध, तो कोई शाक्य, लुहार, जुलाहा, कुशवाहा, तेली, धोबी आदि जातियों के नेता माने जाते हैं या उन्हें इस तरह राजनीतिक लाभ मिलने की खुशफहमी है। सवाल है कि देश का प्रधानमंत्री और सांसद क्या एक वर्ग विशेष के ही नेता माने जाएं? इस विडंबना को ध्वस्त करना चाहिए, जबकि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में ऐसा संभव नहीं लगता।

 

 

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