स्कूल प्रबंधन को दुरुस्त करें

शक्ति चंद राणा

लेखक, बैजनाथ से हैं

 

तीसरा, एसएमसी की ट्रेनिंग में जिन स्रोत व्यक्तियों को लगाया जाता है, उनका स्कूल वाइज ट्रेनिंग चार्ट ब्लॉक स्तर पर तैयार हो, ताकि तिथियों में टकराव न हो। चौथा, इन स्रोत व्यक्तियों के प्रतिदिन का मानदेय दो सत्रों का 600 रुपए से कम न रखा जाए, जिसकी अदायगी चेक अथवा ऑनलाइन उनके खाते में हो, क्योंकि किसी भी एक दिन प्रशिक्षण पर जाने वाला स्रोत व्यक्ति स्कूल पहुंचने के लिए घर से सुबह निकलता है, तो शाम को ही घर वापस लौटता है…

हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग में समस्त विद्यालयों को एलिमेंटरी अथवा इसके ऊपर जमा दो तक के स्तर के शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के अनुसार प्रदेश के समस्त राजकीय विद्यालयों में विद्यालय प्रबंधन समितियों का गठन प्रत्येक सत्र के आरंभ होने के 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य कहा गया है, जिसका अनुपालन प्रत्येक विद्यालय प्रमुख का उत्तरदायित्व है। इसमें नए सत्र में दाखिल नए विद्यार्थियों के अभिभावकों तथा कुछ पूर्व के सदस्यों, जिनके बच्चे उस विद्यालय विशेष के छात्र-छात्राएं होते हैं, को इस विद्यालय प्रबंधन समिति का सदस्य बनाया जाता है। इन सदस्यों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांग बच्चों के अभिभावकों के साथ-साथ उस वार्ड के वार्ड पंच, गांव के सेवानिवृत्त अधिकारियों अथवा कर्मचारियों को भी इस प्रबंधन समिति में बतौर मनोनीत सदस्य शामिल किया जाता है।

यह अलग बात है कि उन मनोनीत सदस्यों को मताधिकार नहीं होता, उनके परामर्श अथवा विद्यालय हित में रखे सुझावों को जरूर अधिमान दिया जाता है। विद्यालय प्रबंधन समितियों की यह योजना निस्संदेह एक बहुत सुंदर योजना तथा दूरगामी दृष्टिकोण से बनाई गईर् योजना है, जो प्रदेश के भीतर एलिमेंटरी तथा जमा दो तक के विद्यालयों में वहां की आवश्यकताओं के लिए प्रभावशाली ढंग से सहायक सिद्ध होने व शिक्षा में गुणात्मक सुधार लाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होने वाली है। बशर्ते इसे पूरी गंभीरता से विद्यालय के साथ-साथ उस विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्र-छात्राओं के अभिभावक भी एक औपचारिकता न समझें।

मुझे गत पांच-छह वर्षों से बतौर स्रोत व्यक्ति विभिन्न स्कूलों में विद्यालय प्रबंधन समितियों का प्रशिक्षण वर्ष में एक बार करने का अवसर मिला है और उन प्रशिक्षण शिविरों में जो मेरा अनुभव रहा है, उसे इस लेख के माध्यम से साझा करना चाहता हूं। बहुधा ऐसा देखा गया है कि विद्यालय प्रबंधन समितियों के सदस्य विद्यालय के बारंबार आग्रह करने पर भी तय तारीख को प्रशिक्षणार्थ उपस्थित नहीं होते। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, परंतु मुख्य कारण उनकी आर्थिक दशा ही कही जा सकती है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता या तो दिहाड़ी-मजदूरी करने वाले होते हैं या फिर किसान तथा पशुपालन के व्यवसाय से जुड़े होते हैं। उनको लगता है कि एक दिन उनका दिहाड़ी से वंचित हो जाएगा, तो अगले दिन काम पर रखा जाएगा भी या नहीं। दूसरा, घर पर बूढ़े बुजुर्गों तथा पशुओं की देखभाल का जिम्मा खासकर बच्चों की माताएं संभाले रहती हैं, ऐसी स्थिति में उनका घर से निकलना कठिन होता है। यह ऐसा व्यवसाय है, जिसमें इनको कोई अवकाश नहीं होता। इस बारे में यदि कोई विशेष पहल सरकार व विभाग से हो, जो उनको विद्यालय तक आने के लिए आकर्षित करे, इसमें शामिल की जाए। दूसरा इसी दिन बच्चों के उन अभिभावकों को भी प्रशिक्षण में शामिल करने पर सरकार विचार करे, जिन स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या अधिक है। वहां दो या तीन बैठकों में उन अभिभावकों को विद्यालय में आमंत्रित किया जाए और डायनामिक पेरेंटिग ट्रेनिंग या काउंसलिंग के अंतर्गत उनके घर में रहते बच्चों के प्रति मनोवैज्ञानिक व्यवहार, उनकी बुनियादी जरूरतों पर अभिभावकों का क्या करना है, घर के वातावरण को बालक-बालिकाओं की आवश्यकताओं के अनुरूप कैसे बनाना है, जैसे अनेक पहलुओं पर उनके साथ विचार-विमर्श  होना जरूरी है। बच्चों की शैक्षणिक सामग्री के लिए इनको कुछ आर्थिक अनुदान व किताबों, वर्दियों व अन्य लेखन साम्रगी के लिए सरकार सीधे इनके खाते में निश्चित धनराशि ट्रांसफर कर सकती है। इससे सरकार का टेंडर (सामग्री, वर्दियों इत्यादि) की प्रक्रिया को पूरा करने में जो ऊर्जा, समय और धन बर्बाद होता है, वह बचेगा। वर्दी, किताबें न मिलने की शिकायतें भी और जनाक्रोश भी कम हो जाएगा। इसमें विद्यालय के मुख्याध्यापक की पुष्टि के बाद जब वह तसदीक कर ले कि अमुक स्कूल में दाखिल सभी छात्र-छात्राओं के अभिभावकों ने सरकार द्वारा तय वर्दी, किताबें, कापियां अपने बच्चों को दे दी हैं और उनके बिल अथवा रसीदें जमा हो गई हैं, धनराशि एकमुश्त उनके खातों में डाल दी जाए। उस अमुक वर्ष की तमाम रसीदें एक फाइल में सुरक्षित रख ली जाएं। इससे वर्दियों के साइज बगैरा में भी कोई फर्क नहीं आएगा और अभिभावक स्वयं अपने बच्चों की जिम्मेदारी चाव से निभाएंगे।

तीसरा, एसएमसी की ट्रेनिंग में जिन स्रोत व्यक्तियों को लगाया जाता है, उनका स्कूल वाइज ट्रेनिंग चार्ट ब्लॉक स्तर पर तैयार हो, ताकि तिथियों में टकराव न हो। चौथा, इन स्रोत व्यक्तियों के प्रतिदिन का मानदेय दो सत्रों का 600 रुपए से कम न रखा जाए, जिसकी अदायगी चेक अथवा ऑनलाइन उनके खाते में हो, क्योंकि किसी भी एक दिन प्रशिक्षण पर जाने वाला स्रोत व्यक्ति स्कूल पहुंचने के लिए घर से सुबह निकलता है, तो शाम को ही घर वापस लौटता है। अतः उसका न्यूनतम मानदेय बनता है, जबकि उसे आने-जाने का बस किराया भी सरकार से नहीं मिलता है। अतः टीए / डीए रूल्ज के मुताबिक उसकी सेवाओं को भी देखा जाए।

यह बिंदु बहुत महत्त्वपूर्ण है कि ये स्रोत व्यक्ति जिनको कुछ वर्ष पूर्व डाइट में बुलाकर दो दिन का प्रशिक्षण दिया गया था, उस प्रशिक्षण के पश्चात इनको एक पहचान पत्र जारी होना चाहिए था, जो नहीं हुआ। यह जारी किया जा सकता है। पांचवां इन स्रोत व्यक्तियों का एक वर्ष में कम से कम एक ओरिएंटेंशन कोर्स विभाग डाइट में लगाए ही, लेकिन एक राज्य स्तरीय ओरिएंटेंशन एंड काउंसलिंग मीट स्टेट लेवल पर भी हो, जिसमें जिला से कम से कम 15 से 20 स्रोत व्यक्ति, जिनका कार्य उत्कृष्ट पाया जाए अपने रिकार्ड के साथ राज्य स्तर की इस स्टेट लेवल मीट में बुलाए जाएं। जहां ये अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य करते हुए अच्छे अथवा खराब अनुभव साझा कर सकें। इन सारे कार्यों के लिए विभाग को अलग से विचार-विमर्श के लिए कुछ विशेष पहल अलग से करनी चाहिए। जहां सकारात्मक सोच हो, तो परिणाम भी सकारात्मक रहते हैं। शिक्षा विभाग इन सुझावों पर विचार करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

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