अंब में बही ज्ञान की गंगा

अंब—सारा जगत परमात्मा से ही आच्छादित है। किसी अन्य तत्त्व की कोई सत्ता नहीं है। पर जब तक चित्त में अज्ञान की छाया है तब तक घट-घट व्यापी ईश्वर की सत्ता का अनुभव नहीं होता। जिनके नेत्र ज्ञान से निर्मल हो चुके हैं उन्हें वृक्षों-वनस्पतियों में भी भगवान की छाया दिखाई पड़ जाती है। फिर तो देह के पीछे जो आत्मा छिपी है वह भी दिख जाती है। प्रभु में तन्मय दृष्टि जितनी गहरी होती जाती है जगत उतना ही मिटता चला जाता है। उक्त अमृतवचन परम श्रद्धेय अतुल कृष्ण जी महाराज ने श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में शिव मंदिर नैहरियां में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि ईश्वरीय अनुभव में एक घड़ी ऐसी भी आती है जब इस जगत में जगत नहीं रह जाता सिर्फ परमात्मा बचता है। वह घड़ी परम आनंद एवं धन्यता की घड़ी होती है। ऐसी शुभ घड़ी के आते ही जीवन की सारी दरिद्रता मिट जाती है। जीवन से विकारमय विश समाप्त होकर अमृत का प्राकट्य हो जाता है। जीव में परमात्मा का अनुभव होते ही प्रेम एवं करुणा की सुगंध सर्वत्र फैलने लगती है। पराए भी अपने लगने लगते हैं। मनुष्य यदि अपने जन्म को सार्थक करना चाहता है तो प्रभु प्रेम से वंचित न रहे।  कथा में प्रमुख रूप से सर्वश्री रमेश चंद एडवोकेट, सुखदेव सागर बस्सी, तरसेम लाल बस्सी, रछपाल सिंह, राजेश धीमान, अशोक कुमार, पं अश्विनी कौंडिन्य,  तिलकराज शर्मा, मास्टर ओमदत्त षर्मा, अश्विनी शर्मा, अनिल षर्मा, सुनील शर्मा, सोमनाथ शर्मा, राजिंद्र शर्मा, महेश शर्मा, रमन शर्मा, विजय कुमार, मुनीश कुमार, दीपक शर्मा, डा. राज कुमार गौतम, सुरेंद्र षर्मा, रमेश शर्र्मा, जीवनदास, यशपाल वर्मा, अशोक वर्मा, अंशू शर्मा, गौरव शर्मा, प्रवीण शर्मा, व्योम शर्मा, नानक चंद दत्ता, पं किशन चंद, डा. नरेश वोहरा, कनिका शर्मा, अनिता देवी, प्रेमलता, राजकुमारी, इत्यादि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। 

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