अमानवीय चीखों के बीच

इस बार कोटखाई प्रकरण शिमला की सड़कों पर घूम गया और समाज के तहखाने में घूरती निगाहें सिर्फ एक घटनाक्रम ही जोड़ पाईं। राजधानी में एक युवती से दुराचार की घटना अब आरोप बनी, लेकिन इससे पहले शरारती सड़कों की शिकायत पर तवज्जो क्यों नहीं मिली। हिमाचल क्यों असहज प्रवृत्तियों के दामन में प्रवेश कर रहा है या अपराध की मिलीभगत में सारा परिवेश संदेह कर रहा है। घटना के सामाजिक-आपराधिक पहलुओं के बीच राजनीतिक वजह ढूंढने की कशमकश इसलिए भी क्योंकि चुनाव के समय ऐसी हरकतें ही मुद्दा बनती हैं। जाहिर है विपक्षी कांग्रेस के पास शर्मनाक हथियार है और इसलिए सरकार से पूछा जाएगा। यह बेवजह नहीं और न ही विपक्षी मर्यादा के खिलाफ कि सरकार से जोरदार ढंग से न पूछा जाए। शिमला कोई गांव नहीं या ऐसा स्थान नहीं जहां कानून-व्यवस्था की ऐसी लापरवाही को माफ कर दिया जाए। अगर राज्यपाल के पास आरोप बनकर यह घटना चीख रही है, तो उन कारणों का पता लगाना आवश्यक है कि राजधानी में सरेआम कोई कैसे ज्यादती कर सकता है। हैरानी यह कि युवती की शिकायत पर पुलिस महकमे ने संज्ञान नहीं लिया, तो पूछना होगा कि शिमला में आला अधिकारी किसकी सुरक्षा में मशगूल थे। यह कौन सी प्रवृत्ति है कि कानून-व्यवस्था के पक्ष में दी गई अर्जियां मौन कर दी जाती हैं। इसमें दो राय नहीं कि हिमाचल में हर तरह का आपराधिक तंत्र संगठित रूप से काम कर रहा है। पुलिस फाइल को समझा जाए तो ही मामले पर्वतीय सौम्यता के खिलाफ  हो जाते हैं। हो सकता है कि बाहरी तत्त्व ऐसी हरकतों से प्रदेश को बदनाम कर रहे हैं, लेकिन कानून-व्यवस्था फिर किस काम की। नादौन में पशु चिकित्सक का अपहरण और फिर घटनाक्रम के आंचल में फंस के छूट जाना हैरान करता है। क्या प्रदेश अपनी हैसियत को भूलकर अपराध से समझौता कर रहा है या व्यवस्था इतनी नाकारा कर दी गई कि इसे भी रूटीन माना जाने लगा है। किसी घटना की संवेदना ही सियासी संवेदना बनकर प्रकट होनी चाहिए या सामाजिक संवेदना में इतनी लाज बची है कि अपराध के बीच हिमाचली नैतिकता की लाठी बना जाए। जो भी हो शिमला की घटना ने पूरे प्रदेश को पुनः यह सोचने पर विवश किया है कि कहीं हमारी प्रगति निरर्थक हो रही है या हमारे वजूद को अपमान के घूंट पीने पड़ रहे हैं। मसला क्योंकि चुनावी दौर को संबोधित कर रहा है, इसलिए ऊंची आवाज में राजनीति बहुत कुछ बोलना चाहेगी, जबकि ऐसी बहस अब निरंतर होनी चाहिए। हिमाचल अपनी प्रवृत्ति से हटकर व्यवहार कर रहा है, तो अमानवीय चीखों की पड़ताल होनी चाहिए। ये सवाल केवल सरकार से ही नहीं, बल्कि निरंकुश होते समाज के दायित्व से भी पूछे जाएंगे। प्रदेश में नशे की तरफ आकर्षित होते युवाओं या प्रतिस्पर्धा में विफल होने पर खुदकुशी तक पहुंच रही भावी पीढ़ी के लिए बदलती सामाजिक प्राथमिकताएं दोषी नहीं। दसवीं का रिजल्ट अगर किसी छात्रा के गले में फंदा बनकर दर्ज हो तो यहां केवल एक बच्चा असफल नहीं हो रहा, बल्कि शिक्षा की पूरी व्यवस्था प्रश्नांकित है। हम ऐसे मसलों को केवल एक घटना मान कर भूल जाते हैं जबकि देखना यह होगा कि असली खामियां कहां पैदा हो रही हैं। शिक्षा के मात्रात्मक विकास ने जीवन का अर्थ ही बदल दिया, जबकि काबिलीयत के ऊपर भी राजनीति सवार हो गई। ऐसे स्कूल खुल गए जहां बच्चों से कहीं अधिक शिक्षक नियुक्त हुए, लेकिन शिक्षा हार गई। हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड परीक्षाओं में गिरते परीक्षा परिणाम में अंततः गिरा कौन? छात्र या शिक्षक। ऐसे भी स्कूल हैं जहां जमा दो के मात्र तीन से छह छात्रों के लिए अध्यापकों के वेतन पर तीन से चार लाख मासिक व्यय हो रहे हैं, लेकिन परीक्षा परिणाम अगर मुश्किल से पचास फीसदी आता है तो शिक्षा और शिक्षक की भूमिका कम अपराधी नहीं। बहरहाल अमानवीय चीखो पुकार में हिमाचल अपने आसपास माफिया, असामाजिक तत्त्व तथा खंडित समाज के अनेक टूटते आईने देख सकता है। ये मसले राजनीतिक दृष्टि से अहम हो सकते हैं, लेकिन असली समाधान गैरराजनीतिक तथा व्यवस्थागत ही होना चाहिए।

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