अमेठी में चुनावी हत्या

चुनाव संपन्न हो चुके हैं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चुनाव आयोग ने चुने सांसदों का ब्यौरा भी दे दिया है। प्रधानमंत्री और कैबिनेट 30 मई की शाम को पद और गोपनीयता की शपथ भी ले लेंगे, लेकिन अब भी कहीं, किसी के भीतर प्रतिशोध धधक रहे हैं। अब भी चुनावी जीत या हार दो पक्षों के दरमियान दरारें पैदा कर रही हैं। काश! हम गलत साबित हों, लेकिन सवाल यह है कि अमेठी में भाजपा समर्थक, सांसद स्मृति ईरानी के करीबी एवं पूर्व ग्राम प्रधान सुरेंद्र सिंह पर गोलियों की बौछार करके उनकी हत्या क्यों की गई? क्या यह हत्यारी हरकत अमेठी को आतंकित करने के लिए की गई? जीवन में संयोग और समीकरण बेहद महत्त्वपूर्ण होते हैं। संभव है कि कोई पुरानी रंजिश, विवाद उभर कर सामने आ जाए, लेकिन फिर भी इसे राजनीतिक और चुनावी हत्या ही करार देंगे। सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी के सकारात्मक सियासत के सुझाव और सोच के दूसरे दिन ही यह हत्या क्यों की गई? फिलहाल यह दलील बचकाना लगती है कि भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी की ऐतिहासिक जीत और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की पराजय की कोख से यह ‘हत्यारी प्रवृत्ति’ जन्मी होगी। चुनावों का इतना सतही विश्लेषण नहीं किया जा सकता। बहरहाल मृतक सुरेंद्र सिंह उन सहयोगियों में से एक थे, जिन्होंने स्मृति की राजनीतिक जमीन तैयार की थी। अमेठी में भाजपा का कोई परंपरागत जनाधार नहीं रहा है, लिहाजा यह स्मृति ईरानी और उनके साथियों की जीत है। सुरेंद्र सिंह की भूमिका को भी नेपथ्य में नहीं डाला जा सकता। चुनावी प्रतिशोध की आशंका हमने इसलिए जताई है, क्योंकि मृतक के परिजनों का पहला शक ‘चुनावी’ ही है। यानी चुनाव हारने वालों ने बदले की आग में सुलगते हुए एक चुनावी कार्यकर्ता को ही खाक कर दिया। क्या यह संस्कृति और सोच किसी लोकतंत्र की हो सकती है? हमने उत्तर प्रदेश  में ऐसे राजनीतिक प्रतिशोध को पहले कभी महसूस नहीं किया। हालांकि उत्तर प्रदेश एक बेहद संवेदनशील राज्य रहा है। बंगाल और केरल में राजनीतिक हिंसा और हत्याओं के दौर जारी रहे हैं। हालिया चुनाव प्रचार और मतदान के विभिन्न चरणों में ऐसे वीभत्स दृश्य देखे ही गए हैं। केरल में तो आम मान्यता है कि एक औसत वामपंथी, कांग्रेस और संघ के कार्यकर्ता या नेता का अस्तित्व ही खत्म करने पर आमादा रहता है। इन तीन-चार राजनीतिक कार्यकर्ताओं में कोई भी, किसी को, किसी भी क्षण मार सकता है। सभी राजनीतिक विचारधाराओं में आपसी प्रतिद्वंद्विता नहीं है, बल्कि वे एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। दुश्मनी इस हद तक रहती है कि ओणम महापर्व के मौके पर भी सौहार्द और समभाव नहीं उमड़ते। यह कैसी लोकतांत्रिक और राजनीतिक संस्कृति है? और उसके समापन की ठोस, कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती रही है? कितनी जांचें की गईं और कितनी निष्कर्ष तक पहुंच पाईं? अभी तो सुरेंद्र सिंह की चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई होगी, लेकिन किसी ने फोन पर सांसद मेनका गांधी और उनके समर्थकों को गोली मार देने की धमकी दी है। यह राजनीतिक जंगलीपन और अराजकता अपने हिंसक रूप में सामने क्यों आ रही है? क्या चुनावी जीत-हार की सहिष्णुता भी समाप्त होती जा रही है? उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार है। वह बदमाशों, हत्यारों पर कड़ी कार्रवाई के दावे करती रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस महानिदेशक से तुरंत फोन पर बात करने के बाद एक निश्चित समय-सीमा में हत्यारों को पकड़ने और सख्त सजा दिलवाने का आदेश दिया है, लेकिन सवाल है कि यह मामला भी किसी निष्कर्ष तक पहुंच पाएगा? सांसद स्मृति ईरानी को सूचना मिली और वह तुरंत दिल्ली से अमेठी पहुंचीं। उन्होंने अपने साथी की अंतिम यात्रा में अर्थी को कंधा दिया और पार्थिव शरीर को नमन किया। जिस जन-भागीदारी और प्रतिबद्धता की बातें की जाती रही हैं, स्मृति की यह मुद्रा उसी का एक उदाहरण है। यदि नेता और कार्यकर्ता के बीच फासले उगते रहेंगे, तो कितना भी बड़ा नेता चुनाव हार  सकता है।

 

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