अर्की का निर्माता समझा जाता है किशन सिंह को

May 22nd, 2019 12:03 am

किशन सिंह को अर्की का निर्माता समझा जाता है। उसने अपने महल को और बड़ा किया और कई मंदिर बनवाए। वह अर्की नगर  को सुनियोजित ढंग से बनाने में बड़ी रुचि लेता रहा। दीवान खाने में चित्रकारी कराई। उस समस अर्की में जो चित्रकारी हुई  उसमें कुछ सिख प्रभाव भी आने लगा था। अर्की नगर के आसपास बहुत सी फालतू भूमि थी। इस भूमि पर किशन सिंह ने बिलासपुर और कांगड़ा के कुछ काश्तकारों को बुला कर बसाया था…

गतांक से आगे …

 किशन सिंह (1840-1876 ई.)

किशन सिंह को अर्की का निर्माता समझा जाता है। उसने अपने महल को और बड़ा किया और कई मंदिर बनवाए। वह अर्की नगर को सुनियोजित ढंग से बनाने में बड़ी रुचि लेता रहा। दीवान खाने में चित्रकारी कराई। उस समस अर्की में जो चित्रकारी हुई  उसमें कुछ सिख प्रभाव भी आने लगा था। अर्की नगर के आसपास बहुत सी फालतू भूमि थी। इस भूमि पर किशन सिंह ने बिलासपुर और कांगड़ा के कुछ काश्तकारों को बुला कर बसाया था। इससे कृषि में उन्न्ति आई और अर्की के लोगों  की स्थिति सुधरने लगी।

1857 ई. के विद्रोह में बाघल के राणा किशन सिंी ने अंग्रेजों की सहायता की। उसने उपने संबंधी मियां जय सिंह को कुछ आदमियों के साथ शिमला भेजा। वह और उसके साथी क्योंथल, धामी, कोटी और जुब्बल के 250 आदमियों के साथ आवश्यकता  के लिए शिमला में तैयार रहे। नालागढ़ में भी गड़बड़, फैल गई थी। इसे दबाने के लिए शिमला के डिप्टी कमीशनर विलियम हे ने  बाघल के मियां जय सिंह को दबाने के लिए वहां भेजा । राणा की इस सेवा  के लिए अंग्रेज सरकार ने उसे 1857 ई. में पुश्त-दर-पुश्त के लिए ‘राजा की उपाधि’ से सम्मानित किया।

बाघल में यह नियम था कि राणा का छोटा भाई वजीर बनता था । यह व्यक्ति बड़ी कुशलता से  राज्य  का प्रशासन चलाता रहा। कुछ कर्मचारी उससे किसी कारण रुष्ट हो गए और उन्होंने  राणा के कान भर दिए। जब उसे इस बात  का पता लगा तो उसने वजीर के पद से जुदा  होकर वहां से अपनी जागीर पर चला गया। उसके स्थान पर मियां राम सिंह को वजीर नियुक्त किया गया । मियां जय सिंह की जब मृत्यु हो गई तो उसके पुत्र ध्यान सिंह को वजीर बना दिया गया। किशन सिंह  के समय तब राज्य के सभी आदेश तथा निर्णय  मौखिक  हुआ करते थे, लेकिन बहुत ही आवश्यक आदेश और फैसले वहीं में लिखे जाते थे। बहियों में आया और व्यय का हिसाब राणा के सामने किया जाता था।

किशन सिंह के समय में बाघल के इलाका पौबर  के लोगों ने विद्रोह किया जिसका कारण यह था कि सरली क्षेत्र की भूमि जयालंगके जमींदारों की थी। राणा ने यह भूमि उनसे छुड़ा कर सरली के दयालों को दे दी। इस पर परगना के लोग रुष्ट हो गए और उन्होंने विद्रोह कर दिया । उन्होंने मालगुजारी देना बंद कर दी। राज्य के कर्मचारियों और लोगों  में आपस में मार-पीट हुई जिसमें मालगुजारी घायल हो गए। इस पर विद्रोहियों के नेता को सुपरिटेंडेंट शिमला  हिल स्टेट्स ने पकड़ कर रियासत को दे दिया। राणा ने दंड के तौर पर उन पर मालगुजारी बढ़ा दी और  आठ हजार जुर्माना लगा कर विद्रोहियों को छोड़ दिया । इसके साथ विद्रोह समाप्त हो गया ।

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