आत्मनिर्भरता के सवाल पर

संसदीय चुनाव की परिपाटी से गुजर रहे हिमाचल के लिए केंद्र सरकार हमेशा की तरह आर्थिक विषयों की प्रासंगिकता में देखी जाएगी। इस तथ्य को राज्य सरकार के प्रदर्शन और केंद्र की परिस्थितियों में हमेशा से देखा जाता रहा है। हिमाचल में राष्ट्रीय नेताओं की छवि पर बहस करते चौराहे न पहले खामोश थे और न ही वर्तमान दौर में चर्चा के ये केंद्र शांत हैं। कहना न होगा कि राज्य सरकारों के प्रदर्शन में केंद्र के साथ सदा रिश्ते देखे गए, तो इस बार भी मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के हवाले से चुनाव के अर्थ पढ़े जाएंगे। ऐसी राजनीतिक पद्धति और परंपरा का सबसे बड़ा दोष यह रहा  कि राज्य सरकारों ने आत्मनिर्भरता के जोखिम उठाने ही छोड़ दिए। कभी-कभी तो यह लगता है कि हिमाचल में सत्ता भी केवल एक ‘बांट’ की तरह हो गई है और मतदाता चुनाव परिस्थितियों के दबाव में हमेशा जीतना चाहता है। ऐसे में क्या कभी राज्य को आत्मनिर्भर बनाने पर जनता की जागरूकता का सहयोग मिलेगा या यह विषय अब केवल सरकार दर सरकार के बढ़ते ऋण की पैदाइशी ख्वाहिश बन जाएगा। दरअसल राज्य की आत्मनिर्भरता के बिना समाज को आत्मनिर्भर बनाने का सत्य भी फरेबी हो चला है और केवल राजनीतिक चमत्कार में हिमाचल का बजटीय ढांचा अपनी हैसियत व हसरत के साथ बेमेल दिखाई देने लगा है। चुनाव के सापेक्ष जनता की मांग निजी संभावनाओं का दोहन तो करती है, लेकिन जीत-हार के बीच राज्य की प्रवृत्ति नहीं बदलती। लिहाजा हर तरह के चुनाव या इसके परिणामस्वरूप राजनीतिक सत्ता को केवल जनता का कृतज्ञ फर्ज निभाते हुए खजाना ही खाली करना होगा। ऐसे में हिमाचल कब आत्मनिर्भरता के सवाल पर सियासी मंथन करेगा और क्या यहां समाज सत्ता से पाने की निरंतर चाह में कभी अपना योगदान नहीं करेगा। चुनावी सुर में मतदान बहिष्कार के विरोधी स्वर तो सुने जा रहे हैं, लेकिन हिमाचल के नागरिक समाज की सोच पर जो प्रश्न चस्पां हैं, उन्हें अनदेखा किया जा रहा है। चुनाव के बीच खड़ा हिमाचल खुद को अव्यवस्थित तसदीक कर रहा है, तो इसकी एक वजह नागरिक समाज भी तो है। यही समाज तरक्की के भूखंड पर खड़ा होकर अवैध निर्माण, अतिक्रमण, पर्यावरणीय असंतुलन, अव्यवस्थित वाहन पार्किंग का सबब बनते हुए भी सरकार के बढ़ते घाटे में अपनी कर अदायगी को शून्य रखना चाहता है या गृह कर अदा न करते हुए स्थानीय निकायों को चकाचक रखना चाहता है। जाहिर है ऐसी सोच को सकारात्मक बिंदुओं पर ले जाने की जरूरत को, राज्य व्यवस्था को नए विचारों और समाधानों से परिपूर्ण करना होगा। कम से कम पर्यटक शहरों में ग्रीन टैक्स लगाने जैसे फैसले तो प्रभावी हों। जहां तक स्थानीय निकायों की वित्तीय अक्षमता का सवाल है, तो विद्युत व जलापूर्ति के साथ कर अदायगी का दायरा बढ़ाना चाहिए। यानी शहरी घर में विद्युत मीटरों के हिसाब से गृह कर वसूला जाए तो आमदनी बढ़ेगी। कुछ इसी तरह वाहन पंजीकरण में एकमुश्त पार्किंग शुल्क लिया जाए, तो राज्य की अधोसंरचना में विस्तार होगा। शहर-कस्बों के व्यापार मंडलों के साथ सहभागिता से कई व्यवस्थाएं स्थापित की जा सकती हैं, तो विभागीय निर्देशों से अफरातफरी के माहौल पर नकेल कसनी होगी। क्यों नहीं सरकारें अपनी ताकत का इजहार करते हुए नागरिकों के सामने गलत-सही के बीच का अंतर बढ़ा रही हैं। मसलन जिस किसी के पास पार्किंग सुविधा नहीं, उसे वाहन पंजीकरण की छूट न दी जाए या इसी तरह कर अदायगी की व्यावहारिकता के साथ नागरिक सुविधाएं बढ़ाई जाएं। चुनाव की शर्तों में बंधी सियासत को हकीकत के दर्पण से सारी धूल हटानी होगी, ताकि जवाबदेही प्रतिबिंबित हो। क्या प्रचार के भीतर राज्य की आत्मनिर्भरता की गूंज सुनना जनता पसंद करेगी या यूं ही भीड़ में खड़ा लोकतंत्र केवल अपने नागरिकों का बंधुआ बना रहेगा।

 

 

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