ईवीएम का रोना

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ईवीएम के मुद्दे पर चिंता जताई है, लेकिन उनका मानना है कि भारत में लोकतंत्र आगे बढ़ा है, तो उसका श्रेय चुनाव आयोग को जाता है। उन्होंने कहा है कि ईवीएम आयोग की हिफाजत में है और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी आयोग की है। संस्थागत सत्यनिष्ठा बनाए रखना और अटकलों को निराधार साबित करने का जिम्मा भी चुनाव आयोग पर है। जनादेश अत्यंत पवित्र होता है और उसमें लेशमात्र भी संशय नहीं होना चाहिए। ऐसे में आयोग की विश्वसनीयता को बनाए रखना बेहद जरूरी है। पूर्व राष्ट्रपति की यह चिंता और उनके सरोकार महज प्रवचन नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति सचेत और जागरूक करते हैं। दरअसल कांग्रेस समेत विपक्ष ने ईवीएम पर प्रलाप पहली बार शुरू नहीं किया है। 2001 से आज तक विपक्षी दल या उनके प्रतिनिधि 13 बार विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों और पांच बार सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा कर इनसाफ की गुहार लगा चुके हैं। फैसले दिए गए हैं, लेकिन विपक्ष फिर रोना शुरू कर देता है। अभी 21 मई को ही शीर्ष अदालत ने वीवीपैट पर्चियों के 100 फीसदी मिलान की मांग वाली याचिका खारिज की है। लगभग यही मांग मतगणना से पूर्व ही चुनाव आयोग के विचाराधीन है। उस पर 22 मई को विमर्श किया गया। सवाल यह है कि आखिर विपक्ष की अपेक्षा क्या है और संतुष्टि का आधार क्या मानते हैं? 2019 के आम चुनाव का जनादेश आज ही सार्वजनिक हो जाएगा। उसके पहले परंपरा अनुसार विभिन्न सर्वे एजेंसियों ने टीवी चैनलों पर एग्जिट पोल के अनुमान सार्वजनिक किए थे। चूंकि उनमें समूचे विपक्ष की पराजय के संकेत थे, लिहाजा एक बार फिर ईवीएम पर चीखा-चिल्ली शुरू हो गई। कांग्रेस समेत 22 प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं ने चुनाव आयोग से मुलाकात की। बेशक कुछ सवाल और संदेह महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। सवाल 20 लाख ईवीएम के अचानक गायब होने पर किया जा सकता है। सवाल बिना नंबर के वाहनों में ईवीएम को इधर-उधर ढोने या सड़कों पर लावारिस पड़े होने का भी संभव है, लेकिन उन सवालों को संबोधित करने का अंतिम अधिकार किसका है? जाहिर है कि संविधान के अनुच्छेद 344 के तहत चुनाव आयोग ही संवैधानिक संस्था है। यदि उसने इन सवालों को खारिज किया है और बार-बार आश्वस्त करने का प्रयास किया है कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ संभव नहीं है, तो चुनाव आयोग को कटघरे में खींचते रहने का औचित्य क्या है? अंततः मुद्दे और आशंकाएं तो एक ही हैं! ईवीएम और वीवीपैट पर्चियों के मिलान के मुद्दे पर ही 21 विपक्षी दलों ने सर्वोच्च  न्यायालय में बीते माह गुहार लगाई थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने वह याचिका सुनने से ही इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया था। उससे पहले सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को निर्देश दे चुकी थी कि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र से अचानक पांच वीवीपैट पर्चियां ली जाएं और उनका ईवीएम से मिलान कराया जाए। अब विपक्ष की मांग 50 फीसदी या 100 फीसदी मिलान की है, तो उसे व्यावहारिक कैसे माना जाए? बर्तन में चावल पक रहे हों, तो एक चावल ही बता देता है कि चावल पके या अधपके हैं। आखिर विपक्ष आयोग और सर्वोच्च अदालत से ऊपर कहां और किससे न्याय मांगने जाएगा? लगता है, हमारे विपक्षी दल चुनाव प्रणाली और प्रक्रिया को बूथ लूटने और छापने के दौर में वापस ले जाने पर आमादा हैं! उन्हें नवीनतम प्रौद्योगिकी समझ नहीं आती। यह असंख्य बार दोहराया जा चुका है कि ईवीएम स्ट्रांग रूम में किस तरह और कितनी हद तक सुरक्षित है। ईवीएम खोलने से पहले पक्ष-विपक्ष के चुनाव एजेंटों के हस्ताक्षर लिए जाते हैं। हम ईवीएम के सुरक्षा मानकों को इस बार नहीं दोहराएंगे, लेकिन मोदी सरकार में ही राज्यमंत्री रहे और अब बिहार में कथित महागठबंधन के हिस्सा बने उपेंद्र कुशवाहा के बयान की घोर भर्त्सना करेंगे, जिसमें उन्होंने ईवीएम की गड़बड़ी पर हथियार उठाने और खून-खराबा तक करने की बात कही है। क्या यह भी लोकतंत्र का आह्वान है? चुनाव में पराजय के मायने यही हैं कि हिंसा पर उतारू हो जाएं? घोर अलोकतांत्रिक, पाशविक और मध्यकालीन सोच है यह! गौरतलब यह भी है कि सोशल मीडिया पर जारी जिस वीडियो को विपक्ष अपनी दलीलों का आधार बना रहा है, आयोग ने उसे ‘फर्जी’ करार दिया है। सोशल मीडिया ही ईवीएम और चुनाव आयोग की प्रामाणिकता का आधार नहीं माना जा सकता। बहरहाल अब इस बहस को चुनाव आयोग को अंतिम तौर पर निपटा देना चाहिए और देश 23 मई को नए जनादेश, नई सरकार का स्वागत करे।

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