एक पत्रिका – दो दर्पण

आम चुनाव के जनादेश ने प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘टाइम’ का रुख ही बदल दिया है। जिस पत्रिका ने चुनावों से पूर्व आवरण कथा छापी थी कि प्रधानमंत्री मोदी ‘देश को बांटने वाले मुखिया’ हैं, उसी पत्रिका ने पलटी मारने में सिर्फ 18 दिन लगाए और नया जनादेश प्राप्त प्रधानमंत्री को ‘जोड़ने वाला’ कहना पड़ा। यह दीगर है कि दोनों विश्लेषण अलग-अलग लेखकों ने लिखे, लेकिन पत्रिका तो ‘टाइम’ ही थी। उसकी विश्वसनीयता का सवाल था। वैसे ‘टाइम’ का साम्राज्यवादी इतिहास रहा है, लेकिन उस सोच से हमारा इतना सरोकार फिलहाल नहीं है। बहरहाल चुनाव पूर्व किन आधारों पर प्रधानमंत्री मोदी को ‘विभाजनकारी मुखिया’ करार दिया गया था और अब पत्रिका का रुख क्यों बदल गया है, ये आश्चर्यजनक और विभाजक सवाल हैं। पिछली आवरण कथा पाकिस्तान के ऐसे लेखक-पत्रकार ने लिखी थी, जो सियासी पृष्ठभूमि के हैं और बुनियादी तौर पर प्रधानमंत्री मोदी से नफरत करते रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रवाद का मुद्दा उछालने, जनता को बहकाने और भारत-पाक संबंधों का फायदा उठाने के आरोप मोदी की चुनावी रणनीति पर चस्पां किए थे। उस आवरण कथा में प्रधानमंत्री मोदी को नाकाम बताया गया था और यह विश्लेषण किया गया था कि वह आर्थिक सुधारों, नीतियों की बात ही नहीं करते, बल्कि बड़े-बड़े सपने दिखाते हैं। हिंदू-मुस्लिम स्थितियों के नेपथ्य में 2002 के गोधरा दंगों को याद किया गया। उस एकतरफा विश्लेषण के बावजूद ‘टाइम’ पत्रिका का आकलन था कि मोदी चुनाव जीत सकते हैं, लेकिन 2014 वाला करिश्मा नहीं दोहरा पाएंगे। जनादेश ने उस आकलन और विश्लेषण को गलत साबित किया। इस बार जनादेश ऐसा रहा, जो आजादी के बाद कोई भी गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री और एक दल प्राप्त नहीं कर सके। नतीजतन ‘टाइम’ पत्रिका को नए अंक में यह ‘विचार’ छापना पड़ा कि मोदी ‘जोड़ने वाले प्रधानमंत्री’ हैं। उन्होंने देश को एक सूत्र में पिरोया है। प्रधानमंत्री ने जाति-धर्म के विभाजन और उनकी राजनीति को खत्म किया है। उन्होंने हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमानों को भी गरीबी से बाहर निकाला है। पांच दशकों में जो काम कोई नहीं कर सका, वह प्रधानमंत्री मोदी ने किया है। आलेख में मोदी सरकार की प्रगतिशील और सामाजिक नीतियों की भी सराहना की गई है। दो विरोधाभासी विश्लेषण, एक ही देश और एक ही प्रधानमंत्री के, एक ही पत्रिका में कैसे संभव हैं? जाहिर है कि विश्लेषण करते हुए दुराग्रह आड़े आ रहे थे। यह ‘टाइम’ पत्रिका से अपेक्षा नहीं की जा सकती। हालांकि कोई भी अंतरराष्ट्रीय अखबार या पत्रिका भारत के जन-मानस को प्रभावित नहीं कर सकते, क्योंकि उनके पाठक बेहद सीमित हैं। फिर लोग अपने अनुभवों के आधार पर तय करते हैं कि किसे चुनाव में चुनना है? इस बार का आलेख मनोज लडवा ने लिखा है, जो 2014 में मोदी के चुनाव अभियान से जुड़े थे। यह भी कह सकते हैं कि मोदी के खास रणनीतिकारों में शामिल थे। लिहाजा तटस्थ वह भी नहीं माने जा सकते, लेकिन  जिस तरह का जनादेश भाजपा-एनडीए को हासिल हुआ है, उससे प्रधानमंत्री मोदी की छवि ‘समावेशी’ और ‘जोड़ने वाले’ नेता की उभरी है। अलबत्ता जाति-धर्म के विभाजन न तो खत्म हो सकते हैं और न ही मोदी उन्हें समाप्त कर पाए हैं, लेकिन मजहबी के साथ-साथ राजनीतिक धु्रवीकरण जारी हैं। आज भी देश में हिंदू-मुसलमान के वृत्तांत सुने और देखे जा रहे हैं। बेशक गरीबोन्मुखी नीतियों के निचले सिरे तक लागू करने ने मोदी को नायक बना दिया है। हालांकि जब ‘टाइम’ ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘बांटने वाला’ करार दिया था, तब कांग्रेस समेत प्रमुख विपक्षी दलों ने भी उस पर मुहर लगाई थी कि प्रधानमंत्री ‘बांटो और राज करो’ की नीति को अपनाए हैं। जनादेश ने उन्हें लंबा-चौड़ा आइना दिखा दिया है और रही-सही कसर इस आलेख ने पूरी कर दी है। हास्यास्पद तो यह है कि आज भी जनादेश के बावजूद कुछ बौनी-सी पार्टियों के प्रवक्ता सवाल कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री के अलावा, गृहमंत्री, वित्त मंत्री, विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और तीनों सेनाओं के प्रमुख ‘हिंदू’ हैं। जाहिर है कि मजहबी सोच अब भी मौजूद है। यह नई सरकार और कैबिनेट के शपथ ग्रहण से पहले के उछाले हुए सवाल हैं। मोदी सरकार अब विधिवत रूप से शपथ ले चुकी है, लेकिन विभाजनकारी मानसिकता कब तक बरकरार रहेगी? यदि यही स्थिति रही, तो ‘टाइम’ फिर लिख-छाप सकती है कि भारत का समाज तो सांप्रदायिक आधार पर बंटा हुआ है। इस पर भारतीय ही सामूहिक तौर पर मंथन-चिंतन कर सकते हैं।

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