एग्जिट पोल की विश्वसनीयता

डा. वरिंदर भाटिया

पूर्व कालेज प्रिंसीपल

कई लोग अपना मत गुप्त ही रखना चाहते हैं, तो कई लोग पार्टियों के सक्रिय कार्यकर्ता हैं, ऐसे में उनका जवाब उनकी निजी निष्ठा पर आधारित होता है। ऐसे कई कारक सर्वे के नतीजों में अंतर पैदा करते हैं। मीडिया जिस तरह एक्जिट पोल्स को परोसता है, उससे टीआरपी तो मिल जाती है, लेकिन बाद में एक्जिट पोल के असली नतीजों से मेल न खाने पर किरकिरी भी होती है…

देश में चुनावी बुखार चरम सीमा पर है। 23 मई को लोकसभा चुनावों के नतीजे आ जाएंगे। इस बीच एक्जिट पोल अलग-अलग दावे कर रहे हैं। हर बार चुनावी नतीजों से पहले एक्जिट पोल और चुनावों से पहले ओपिनियन पोल सुर्खियों में छाए रहते हैं। ओपिनियन पोल लोगों की रायशुमारी के लिए किया जाता है। इसमें जो भी एजेंसी ओपिनियन पोल करवाती है, वह वोटरों से आने वाले चुनाव में वे किस तरह से वोट करेंगे, किन मुद्दों और किन पार्टियों को तरजीह देंगे आदि बातों की जानकारी ली जाती है। वहीं एक्जिट पोल चुनाव में वोट डालकर बाहर आ रहे वोटर से सवाल-जवाब करता है। इसीलिए चुनावों के पहले आपको हर चैनल पर अलग-अलग संस्थाओं द्वारा करवाए गए ओपिनियन पोल दिखते हैं। वहीं चुनावों के बाद इन्हीं चैनलों पर एक्जिट पोल के आंकड़े दिखाए जाते हैं। नामवर सर्वे संस्थाएं एक्जिट पोल और ओपिनियन पोल आयोजित करवाती हैं। इन संस्थाओं की अपनी पेशेवर टीम होती है, जो हर लोकसभा सीट के हिसाब से रणनीति बनाती है। कई स्तरों पर एक लोकसभा सीट को बांटा जाता है। यह विधानसभा सीटों, उम्र वर्ग, शहरी-ग्रामीण, पेशेगत विभाजन आदि आधारों पर वोटर का विभाजन करते हैं। इसके बाद सैंपल साइज चुना जाता है। सैंपल साइज यानी सर्वे में शामिल होने वाले लोगों की कुल संख्या। यह संख्या अलग-अलग संस्थाओं में अलग होती है। अमूमन सैंपल साइज की संख्या 1500 से 50,000 तक होती है। सीएसडीएस ने भारत में सबसे पहले 1965 में केरल विधानसभा चुनावों में पहला ओपिनियन पोल किया था।
एक सर्वे एजेंसी कैसे एक्जिट पोल या ओपिनियन पोल सर्वे कराती है, आइए इसे समझें। हम 2019 लोकसभा चुनावों के उदाहरण से इसे समझने की कोशिश करते हैं। देशभर की कुल 543 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं, जो सात चरणों में समाप्त होंगे। अब एक सर्वे एजेंसी सबसे पहले अपना सैंपल साइज चुनती है। सैंपल साइज यानी एजेंसी कितने लोगों से बात करेगी। जैसे कोई एजेंसी यह तय कर सकती है कि वह कुल 50 हजार लोगों से बात करेगी, जो इन 543 सीटों के वोटर होंगे। ऐसे में वह इन वोटरों का अलग-अलग आधारों पर विभाजन करेगी। इन्हें वह शहरी और ग्रामीण वोटरों में बांट सकती है। इन्हें वह पुरुष और महिला वोटर, अलग उम्र वर्ग के वोटरों, जैसे 18-35 वर्ष, 35 से 60 वर्ष और 60 से ऊपर आदि वर्गों में बांट सकती है। सर्वे एजेंसी उन्हें जाति और धर्म के आधार पर भी बांट सकती है। इसी तरह विभाजन का आधार लोगों का पेशा, आय आदि हो सकता है। ऐसे ही विभिन्न आधारों पर सैंपल का वर्गीकरण सर्वे से पहले ही कर लिया जाता है। सर्वे में लोगों से सवाल पूछे जाते हैं, जिससे उनका मत किस तरफ पड़ने की संभावना है इसका अंदाजा लगाया जाता है। अगर एक्जिट पोल सर्वे के सवाल हैं, तो लोगों ने किसे चुना यह पता लगाने के उद्देश्य से सवाल तय किए जाते हैं। सवालों को तय करने के पीछे भी एक खास गणित काम करता है। सवाल छोटे और स्पष्ट होने चाहिए। सवाल ऐसे होने चाहिए जिनके जवाब से एजेंसी जरूरी आंकड़े निकाल सके। सवालों की संख्या भी 5 से 10 के बीच होती है। ऐसे सवालों का चयन करने की कोशिश की जाती है, जिनका हां या ना में जवाब लिया जा सकता हो। हर सवाल से वोटर की प्रवृत्ति, मूड, पसंदीदा नेता या पार्टी का पता चलता हो। वोटर की अपनी समस्याओं को लेकर भी स्पष्ट राय लेने की कोशिश की जाती है कि वह वर्तमान सरकार को पांच में से या दस में से कितने नंबर देता है। वोटर की मार्किंग भी इस ओर इशारा करती है कि वह वर्तमान सरकार से खुश है या नाराज। सर्वे एजेंसियां इस बात का ध्यान रखती हैं कि सर्वे में शामिल लोग प्रमाणिक हैं। इसके साथ ही सर्वे प्रक्रिया सही तरीके से संपादित हो। ऐसा न हो कि एक व्यक्ति कई लोगों के लिए जवाब दे। इसलिए सर्वे एजेंसियां पेड वर्कर्स नियुक्त करती हैं, जो अलग-अलग जगहों पर जाकर सर्वे करते हैं। उन्हें लिखित और अब तो डिजिटल प्रमाण भी देने होते हैं कि सर्वे करने वाले लोग उन इलाकों में पहुंचे थे, जहां सर्वे हुआ। 2019 लोकसभा चुनावों में भारत में लगभग 90 करोड़ वोटरों ने वोट डाला है। ऐसे में किसी सर्वे एजेंसी के लिए यह संभव नहीं है कि वह सभी लोगों से बात कर सके। ऐसे में एजेंसी यह कोशिश करती है कि वह लोकसभा सीटों को इस आधार पर बांटे और अपने सैंपल साइज का चयन इस तरीके से करे कि उसमें हर वर्ग का प्रतिनिधित्व हो जाए। जैसे एक लोकसभा सीट जहां सर्वे होना है, वहां का सैंपल साइज 1000 है। अब अगर इस लोकसभा सीट में 10 विधानसभा सीटें आती हैं, तो इस सैंपल को इन 10 भागों में बांटा जाएगा। अगर इन 10 विधानसभा सीटों में मान लेते हैं 25 पंचायत हैं, तो एजेंसी कोशिश करती है कि वह अधिकांश पंचायतों में अपने सर्वे एजेंट को भेज कर पंचायतों का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित करे। इस लोकसभा सीट के जातीय-धार्मिक गणित के आधार पर भी सैंपल को बांटा जा सकता है। प्रतिनिधित्व के प्रतिशत के आधार पर सैंपल साइज के प्रतिशत को भी बांट दिया जाता है, ताकि हर वर्ग के लोगों से सवाल पूछा जा सके, जो एजेंसियां इन सभी आधारों पर बांटकर अपना सैंपल चुनती हैं, उनके एक्जिट पोल के ज्यादा सटीक होने की उम्मीद होती है। सर्वे एजेंसी के सवाल पहले से तय होते हैं। सवालों के जवाब के आधार पर क्या आंकड़े निकल सकते हैं, इसका हिसाब-किताब भी सवालों के चयन के वक्त कर लिया जाता है। सर्वे पूरा होने के बाद एजेंसियां जवाबों का वर्गीकरण करती हैं। जवाबों के हिसाब से क्षेत्रवार, उम्रवार, जातिवार आदि आंकड़े निकाले जाते हैं। इससे एजेंसी को यह अंदाजा लगता है कि वोटर का मूड किस तरफ है। आंकड़े तैयार होने के बाद अलग-अलग मीडिया संस्थानों के साथ करार के तहत ये सर्वे बेचे जाते हैं।

सर्वे एक अनुमान भर बताता है। कोई तयशुदा तौर पर यह दावा नहीं कर सकता कि उसके सर्वे 100 फीसदी सही साबित होंगे। यह बात समझने वाली है कि भारत में 2019 लोकसभा चुनावों में वोटर हैं 90 करोड़। बड़ी से बड़ी सर्वे एजेंसी का भी सैंपल साइज एक लाख से ज्यादा नहीं होता। ऐसे में एक फीसदी वोटर के पास भी आज तक कोई सर्वे एजेंसी नहीं पहुंच पाई है। ऐसे में पूरे देश का मिजाज क्या है, यह दावे के साथ कोई नहीं बता सकता। सर्वे एजेंसियां एक अनुमान जारी करती हैं। कई बार यह अनुमान असली नतीजों के करीब पहुंचता है, तो कई बार तस्वीर बिलकुल विपरीत भी हो जाती है। जिस सर्वे एजेंसी ने ऊपर लिखे गए आधारों का सच्चाई के साथ पालन किया होगा, उसके नतीजे सत्य के आस-पास हो सकते हैं। एक और बात यहां समझनी होगी कि जिन लोगों से सवाल पूछा जाता है, उन्होंने किस मनोस्थिति में जवाब दिया है, यह पता लगाने का कोई उपाय सर्वे एजेंसी के पास नहीं है।
भारत में गुप्त मतदान की व्यवस्था है। ऐसे में कई लोग अपना मत गुप्त ही रखना चाहते हैं, तो कई लोग पार्टियों के सक्रिय कार्यकर्ता हैं, ऐसे में उनका जवाब उनकी निजी निष्ठा पर आधारित होता है। ऐसे कई कारक सर्वे के नतीजों में अंतर पैदा करते हैं। मीडिया जिस तरह अतिरेक में इन एक्जिट पोल्स को परोसता है, उससे टीआरपी तो मिल जाती है, लेकिन बाद में एक्जिट पोल के असली नतीजों से मेल न खाने पर किरकिरी भी होती है। चुनावी दावों का यह खेल हर चुनाव में शुरू होता है और नतीजों के बाद खत्म हो जाता है। सब कुछ रोचक और सनसनीखेज रहता है। 23 मई, 2019 को देश की जनता का क्या मत है, यह सबके सामने होगा। तब तक एक्जिट पोल का बाजार गर्म रहेगा।

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