ऐतिहासिक शिव मंदिर मठोली

हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां कई धार्मिक स्थल हैं। ऐसा ही एक ऐतिहासिक शिव स्थल जसूर में मठोली में स्थित है। कथानुसार उक्त स्थान पर कोटा शहर होता था, जोकि राजा जयचंद के राजवाड़े में आता था। मठोली में एक मंदिर होता था, जिसको अब शिवद्वाला कहा जाता है। उक्त मंदिर में महात्मा निर्वाण नाथ जी रहते थे, जो बहुत ही ज्ञानी थे। इसी कोटे शहर में बरसोली के एक लड़के की शादी हुई थी। उक्त लड़का जब भी अपने ससुराल आता था, तो महात्मा निर्वाण नाथ के पास ज्ञान लेने जरूर आता। राजा जयचंद की कोई भी संतान नहीं थी। विवाह के बहुत समय बाद उनके घर कन्या ने जन्म लिया। जब कन्या के नामकरण के लिए राजपुरोहित को बुलाया गया, तो पुरोहित ने राजा से कहा कि यह कन्या आपके लिए शुभ नहीं है, आप इसे गरेल गंगा (गरेली खड्ड) में बहा दो। राजा ने पुरोहित की बात को मानकर कन्या को चंदन के संदूक में डालकर खड्ड में बहा दिया। किनारे पर कपड़े धो रहे धोबी ने संदूक को बहते देख पकड़ा, तो उसमें अंगूठा चूस रही कन्या को पाया। धोबी को पता था कि यह लड़की राजा जयचंद की है। धोबी ने निसंतान अपने कुम्हार मित्र को यह कन्या पालने के लिए दे दी। कुम्हार ने कन्या का नाम सोरठ रखा। कई वर्ष बीत जाने के बाद राजा जयचंद जंगल मे शिकार खेलने के लिए आया तथा वन में मिट्टी लेने आई सोरठ कन्या पर उसकी नजर पड़ी। नजर पड़ते ही राजा लड़की पर मोहित हो गया तथा मन ही मन उससे शादी का ख्याल पालने लगा। सोरठ ने मिट्टी की टोकरी भर ली, लेकिन उसे टोकरी उठाने के लिए कोई नहीं मिल रहा था। सोरठ को परेशान देखकर मिट्टी से भरी टोकरी ने कहा कि लड़की तू मुझे हाथ लगा, मैं खुद ही तेरे सिर तक आ जाऊंगी। राजा जयचंद उक्त लड़की के घर का पता लगाकर महल में वापस आ गया। राजा ने अपने वजीर के पास न्योता भेजा कि कन्या के घर जाकर कहो कि राजा को उनकी लड़की पसंद है तथा वह उससे शादी करना चाहता है। कुम्हार के घर शादी का न्योता लेकर गए वजीर को उसने बताया कि यह लड़की राजा की ही है तथा अपनी लड़की के साथ शादी कैसे कर सकता है। वजीर ने सारी बात राजा जयचंद को बताई। राजा जयचंद ने दूसरी रियासत के मशहूर पंडित को बुलाया और कहा कि अपनी ही घर की घोड़ी के आगे बछेरी हो, तो क्या उस पर सवारी कर सकते हैं। पंडित ने जवाब दिया कि इसमें तो कोई बात नहीं है। राजा ने सभी को निमंत्रण देकर शादी की तैयारियां शुरू कर दीं। जिस दिन शादी थी उस दिन बरसोली वाला लड़का भी परिवार के साथ मठोली में आया हुआ था तथा महात्मा के पास प्रवचन सुनने गया। निर्वाण नाथ ने जैसे ही लड़के को देखा, तो अपनी व्याकुलता को छुपाने लग गए। लड़के द्वारा व्याकुलता का कारण पूछने पर महात्मा ने कहा कि आज सारा कोटा शहर नरक हो जाएगा तथा तू अपने परिवार को लेकर वापस चला जा। लड़का जल्दी-जल्दी परिवार को लेकर वापस चलने लगा और जब गरेल गंगा में पहुंच गए, तो लड़के से उसकी पत्नी ने पूछा कि रात को ही वापस क्यों जा रहे हैं? लड़के ने सारी बात अपनी पत्नी को बता दी। यह सुनकर पत्नी बोली आप यहां पर रुको मैं कुछ सामान मायके में भूल आई हूं उसे लेकर आती हूं। वह मायके में अपने छोटे बच्चे को मां के पास सुला कर भाई को लेकर वापस आ गई ताकि उसका कुल खत्म न हो। उधर राजा जयचंद की बारात आ गई। पंडित विवाह पढ़ने लगा तभी कन्या सोरठ बीच में ही बोल पड़ी कि व्याह पढ़ते पंडता तेकी डस लै काला नाग, राजा जयचंद मैं बेटी ते सोरठ मेरा नाम। पंडित ने कहा कि राजा यह वही लड़की है, जिसको आपने गरेल गंगा में बहा दिया था। अब तो सारा कुछ नष्ट हो जाएगा। यह सुनकर राजा दौड़ कर महात्मा निर्वाण नाथ के पास गया तथा भूल का पश्चाताप करने लगा। महात्मा निर्वाण नाथ ने राजा को मक्खी बनाकर डंडे पर चिपका दिया तथा उसी समय कन्या सोरठ भी महात्मा के पास पहुंच गई। उसने कहा कि आप मुझे राजा का पता दे दो वरना मैं श्राप दे दूंगी। यह सुनकर महात्मा निर्वाण नाथ ने डंडे को बाहर फेंक दिया तथा राजा सहित सारी बारात हरनोट कुवाल में सियाल पत्थर हो गई, जो आज भी साक्षात है। महात्मा ने भी समाधि ले ली। सारा शहर नष्ट हो गया तथा सोरठ भी कोटे वाली माता के जंगलों में सती हो गई। महात्मा की समाधि के पश्चात मंदिर भी नष्ट हो गया तथा शिवलिंग भी जमीन में धंस गया। लाखों सालों के उपरांत वजीर राम सिंह के पूर्वजों को सपने में जमीन में धंसे शिव के दर्शन होने लगे और शिवलिंग को जमीन से बाहर निकलने को कहा जाने लगा। यह बात राजा को बताई गई। राजा ने शिवलिंग की खुदाई करवाकर बाहर निकालने का कार्य शुरू किया। एक दिन में जितना शिवलिंग बाहर आता, रात में उससे ज्यादा जमीन में धंस जाता। राजा क्रोधित होकर शिवलिंग पर लोहे के शस्त्र का प्रयोग करने लगा, जिससे खून की धारा निकल आई। उसके बाद राजा ने शिवलिंग को कस कर पकड़ लिया और उसके साथ ही चिपक गया। राजा ने वहीं पर मंदिर का निर्माण करवाया तथा अपनी गलती की क्षमा मांगी। 

– सुनील दत्त, जवाली

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