करियर के सूत्र जोड़ने होंगे

करियर की सूत्रधार बनतीं राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाएं अंततः हिमाचली समाज की महत्त्वाकांक्षा का ऐसा द्वार भी हैं, जहां छात्र और अभिभावक केवल संघर्ष का सफर तय करते हैं। जेईई मेन्स के बाद नीट परीक्षाओं में हिमाचली तनाव की एक झलक और भविष्य के फलक पर रेखांकित होते सपनों का यथार्थ। इस तरह की प्रवेश परीक्षाओं का मनोविज्ञान, जहां शिक्षा प्रबंधन की कसौटी हो सकता है वहीं करियर की लहरों के बीच नाव छोड़ने का मंजर भी है। नीट परीक्षा के आयाम पर टिके सपने और शिमला तथा हमीरपुर के दो केंद्रों में बिखरी महत्त्वाकांक्षा को समेटना इसलिए फिर कठिन हुआ, क्योंकि इंतजाम हर बार की तरह कष्टप्रद होते हैं। यह केवल एक परीक्षा का सवाल नहीं, बल्कि ऐसे कई इम्तिहान छात्र समुदाय की चिंताएं बढ़ा देते हैं। ऐसे में हिमाचल को अपने स्तर पर बच्चों को इस काबिल बनाना है ताकि राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा प्रणाली से होकर सफलता हर कदम चूमे। क्या स्कूल बोर्ड परीक्षाओं में अधिकतम अंक लेकर उच्च शिक्षा के प्रोफेशनल मानदंड पूरे हो जाते हैं या ऐसी प्रवेश परीक्षाओं का सफर कुछ हद तक पूरा हो जाता है। नकारात्मक उत्तर को सकारात्मक बनाने की सीढ़ी अगर नहीं लगाई गई, तो डाक्टरी-इंजीनियरिंग की पढ़ाई से पहले छात्रों को अपने सफर का मध्यांतर किसी न किसी अनौपचारिक, लेकिन अनिवार्य प्रशिक्षण के तामझाम में करना होगा। यह हो रहा है और अगर शिनाख्त की जाए तो डमी हाजिरी भरते हुए, एक बड़ा हिमाचल हर साल पड़ोसी राज्यों में शिक्षा की पाजेब पहनकर, प्रोफेशनल कालेजों की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है। ऐसे में क्यों नहीं हिमाचल स्कूल शिक्षा बोर्ड अपने तौर पर आवासीय अकादमियां बनाकर अध्ययन को ऐसे मुकाम तक पहुंचाए, जहां से बच्चे राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की काबिलीयत में सफलता दर्ज करें। प्रदेश से हर साल करीब पांच हजार बच्चे ऐसे निकलते हैं, जो हर सूरत करियर सफलता के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। ऐसे में दसवीं परीक्षा के बाद स्कूल शिक्षा बोर्ड को विभाग के साथ मिलकर श्रेष्ठता का आकलन करना चाहिए, ताकि चयनित छात्र आगे की पढ़ाई विशेष स्कूलों के जरिए कर सकें। हिमाचल के जो शहरी सरकारी स्कूल छात्र संख्या में निकम्मे साबित हो रहे हैं, उन्हें आवासीय अकादमी में बदल कर पूरे प्रदेश के चयनित पांच हजार के करीब छात्रों के लिए बतौर अकादमी उपलब्ध करा दिया जाए। ऐसे लगभग एक दर्जन स्कूल भी अगर उपलब्ध हों, तो शिक्षा बोर्ड हर साल करीब पांच हजार बच्चों के सामर्थ्य को करियर के उत्थान के साथ जोड़ सकता है। टेलेंट हंट के जरिए जमा एक व दो की पढ़ाई के साथ-साथ भविष्य की पैरवी का समाधान अगर ऐसे अकादमिक स्कूलों में हो, तो प्रदेश के बच्चे करियर प्रवेश की दुकानों में लूटे नहीं जाएंगे। हर साल हिमाचल से दस से पंद्रह हजार बच्चे बाहरी प्रदेशों में जाकर सपनों को पूरा करने के लिए पनाह ढूंढते हैं, लेकिन सफलता का सूचकांक केवल दबाव भरी आहें छोड़ जाता है। स्कूल शिक्षा बोर्ड को दसवीं से बारहवीं के बीच करियर की दौड़ का समाधान खोजना होगा, इसलिए अकादमी स्कूलों के अलावा विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं के केंद्र भी हिमाचल में स्थापित करने होंगे। प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला के अलावा स्कूल शिक्षा बोर्ड तथा तकनीकी विश्वविद्यालय को राज्य स्तरीय परीक्षा परिसरों का निर्माण करते हुए मूलभूत सुविधाओं के साथ-साथ हर तरह की परीक्षाओं का संचालन इस उद्देश्य से करना होगा, ताकि विद्यार्थियों को यूं ही भटकना न पड़े। प्रदेश से सैन्य, अर्द्धसैन्य तथा पुलिस बलों में रोजगार व करियर के अवसर ढूंढ रहे युवाओं के लिए पुलिस महकमा अपने मैदानों के साथ अकादमियों का संचालन कर सकता है, ताकि शिक्षण व शारीरिक प्रशिक्षण ग्रहण करके प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में उतरा जा सके। जाहिर है युवा नीति को रोजगार और रोजगार को करियर प्रसार से जोड़ने के लिए स्कूली शिक्षा के वर्तमान ढर्रे को नए सिरे से सींचने की जरूरत है। मात्र परीक्षा तक शिक्षा का मूल्यांकन अब प्रमाणित नहीं होता, बल्कि करियर के वांछित प्रवेश की तैयारी तक युवा क्षमता, प्रतिभा और दक्षता को मांजने तथा प्रतिस्पर्धी बनाने की जरूरत तक का सफर इससे जुड़ता है।

 

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