कहीं साहित्य सरोकार विहीन तो नहीं

May 26th, 2019 12:04 am

इस वर्ष पहले धर्मशाला में पुस्तक मेला लगा, अब शिमला में बुक फेयर लगने जा रहा है। भविष्य में भी ऐसे पुस्तक मेले होते रहेंगे, परंतु एक सवाल अकसर खड़ा हो जाता है कि साहित्य को आखिर पाठक क्यों नहीं मिल रहे हैं? इसी प्रश्न को खंगालने का प्रयास हमने इस बार ‘प्रतिबिंब’ में किया है। प्रदेश भर के साहित्यकारों से हमने इसका जवाब ढूंढने की कोशिश की। यहां पेश है इस विषय में शृांखला की पहली कड़ी :

आज के दौर का एक जलता हुआ सवाल है-‘आखिर क्यों साहित्य को नहीं मिल रहे पाठक?’   जिगर के ख़ून से लिखी गईं लेखकों की पुस्तकें क्यों धूल चाट रही हैं? कवि सम्मेलनों, लेखकीय गोष्ठियों से श्रोता क्यों निरंतर कम होते जा रहे हैं? उत्कृष्ट सृजन होने के बावजूद पठन-पाठन की परंपरा का लुप्त होते चले जाना अत्यंत दुःखद स्थिति है। इंटरनेट के इस युग में पत्रिकाएं, पुस्तकें, समाचार पत्र, सब आनलाइन उपलब्ध हैं।

नई पीढ़ी का ‘नेट’ का जुनून, पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण, नकारात्मक सोच, बढ़ते अपराध, मीडिया का बाज़ारवाद की ओर अग्रसर होना, कुल मिलाकर संचार-क्रांति ने साहित्य के समक्ष ढेर सारी चुनौतियां ला धरीं। कला, साहित्य, शास्त्रीय संगीत एवं परंपरागत कलाएं दृश्य-श्रव्य माध्यम में न के बराबर स्थान पा रही हैं। आज़ादी दिलाने में क़लम के अस्त्र की भूमिका अभूतपूर्व रही।

साहित्यकारों के लिखे ओजपूर्ण लेखों, कविताओं, गीतों, नज़्मों को पढ़-सुन कर भारतवासी शीष हथेली पर रख कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। तत्कालीन समाज का आईना रहा है साहित्य। पाठकों के दिलों को गहराई तक छूता रहा है साहित्य। फिर आज पुस्तकों के प्रति उदासीनता क्यों? क्यों पीछे छूटती जा रही हैं पुस्तकें? क्यों हम अपनी संस्कृति, अपनी विरासत के संरक्षण-संवर्द्धन हेतु चिंतित नहीं? मिल्टन ने कहा था-‘अच्छी पुस्तक एक महान् आत्मा का अमूल्य जीवन रस है।’ यह कथन लेखकीय उत्तरदायित्व, उसकी भूमिका की ओर भी इंगित करता है। लेखक को स्वयं को भी टटोलना होगा, अपना आकलन भी करना होगा। क्या उसका हाथ वक्त की नब्ज़ पर है? क्या उसका साहित्य सामाजिक सरोकारों से रहित तो नहीं, क्योंकि ऐसा साहित्य उपयोगी नहीं हो सकता। वह रचना जो व्यक्ति विशेष की न रह कर संपूर्ण मानव जाति की हो जाए, आम जन की वेदना को स्वर दे दे, वही सफल और श्रेष्ठतम रचना है। जज़्बातो-एहसासात, संवेदनाएं, मान्यताएं रहें तो जीवन का अर्थ भी है।

समाज में व्याप्त संवेदनहीनता, मूल्यहीनता, अमानवीयता, भ्रष्ट सामाजिक व्यवस्था पर धारदार प्रहार भी लेखक की सामाजिक चेतना का द्योतक है। अतः लेखक का अपना व्यक्तित्व और सामाजिक चेतना दोनों की झलक उसकी विशिष्ट शैली, उसके कहन में मिले तो उसकी पहचान कभी नहीं खो सकती। उर्दू-हिंदी ग़ज़लें भी जब सामाजिक सरोकारों से जुड़ीं तब उनमें व्यापकता आई। अगर रचना कार्य भाव-प्रवण होगा, उपलब्धिपूर्ण होगा तो पाठक उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। एक सशक्त लेखन से पाठक जुड़ा रहेगा, वह परे हट ही नहीं सकता। प्रतिभाशाली लेखकों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि पाठक पुस्तक पढ़ कर कुछ प्रेरणा भी हासिल करना चाहता है, कुछ ऐसा जो जि़ंदगी की बेबसी और कठिनाइयों को आसान बनाने में उसकी मदद भी करे। क्योंकि अंतर्वेदना, पीड़ा और अंतर्द्वंद्व हर जि़ंदगी में होते हैं, लेखक की भी और पाठक की भी। पुस्तक मेलों में बच्चों को ले जाना और फुरसत के पलों में रीडिंग की ओर प्रवृत्त करना अत्यधिक ज़रूरी है।

Himachal List

Free Classified Advertisements

Property

Land
Buy Land | Sell Land

House | Apartment
Buy / Rent | Sell / Rent

Shop | Office | Factory
Buy / Rent | Sell / Rent

Vehicles

Car | SUV
Buy | Sell

Truck | Bus
Buy | Sell

Two Wheeler
Buy | Sell

Polls

क्या कर्फ्यू में ताजा छूट से हिमाचल पटरी पर लौट आएगा?

View Results

Loading ... Loading ...


Miss Himachal Himachal ki Awaz Dance Himachal Dance Mr. Himachal Epaper Mrs. Himachal Competition Review Astha Divya Himachal TV Divya Himachal Miss Himachal Himachal Ki Awaz