कांग्रेस के अस्तित्व का सवाल

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 55-120 वोट से अमेठी का चुनाव हार गए हैं। बेशक केरल में वायनाड सीट पर उन्होंने 4.31 लाख से ज्यादा वोट लेकर जीत दर्ज की, लेकिन अमेठी का गांधी परिवार के लिए महत्त्व ‘ऐतिहासिक’ रहा है। बीते सभी चुनावों में इस परिवार के लोग जीतते रहे हैं। राहुल के अलावा, ग्वालियर के महाराजा एवं अजेय माने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया पहली बार करीब 1.25 लाख वोट से पराजित हुए हैं। एक और पूर्व राजा एवं मध्य प्रदेश के 10 साल तक मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह को भोपाल सीट पर साध्वी प्रज्ञा ने करीब 3.64 लाख वोट से शिकस्त दी है। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्रियों में शीला दीक्षित, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, अशोक चव्हाण, सुशील कुमार शिंदे, वीरप्पा मोइली, हरीश रावत और मुकुल संगमा आदि भी चुनाव हार गए हैं। बड़े नेताओं में पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह सरीखे भी पराजित हुए हैं। अपने दौर के विख्यात फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा भी अपराजेय नहीं रह सके और करीब 2.84 लाख वोट से चुनाव हार गए। ये कोई सामान्य आंकड़े और चुनाव नतीजे नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं। देश के हिंदी भाषी राज्यों की 225 सीटों में से 201 पर भाजपा-एनडीए विजयी रहे हैं। राहुल गांधी ने जिन 129 स्थलों पर जनसभाएं कीं और रोड शो भी आयोजित किए गए, उनमें से 99 सीट पर भाजपा गठबंधन के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। करीब 175 सीट पर भाजपा-कांग्रेस के बीच सीधे चुनावी मुकाबले हुए। उनमें से 161 सीट पर सत्तारूढ़ गठबंधन जीता। यहां तक कि कांग्रेस के पुराने और अभेद्य गढ़ की 15 में से 9 सीटें भाजपा-एनडीए ने जीतीं। सबसे गौरतलब यह रहा कि 17 राज्यों में 50 फीसदी और उससे अधिक वोट भाजपा के पक्ष में आए। ये तमाम नतीजे किस ओर संकेत कर रहे हैं? दरअसल 2014 में कांग्रेस 44 सीटों पर अटक गई थी। अब 2019 में 52 सीटों तक ही बढ़ पाई है। यह जनादेश भी ऐसा है, जिसके आधार पर लोकसभा में कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष का पद एक बार फिर नहीं मिल पाएगा। कांग्रेस का विस्तार और उसकी स्वीकृति इतनी धीमी और सीमित क्यों हो गई है? इस सवाल पर कांग्रेस को आत्ममंथन और आत्मनिरीक्षण करना ही होगा। विचार करना पड़ेगा कि वंशवाद, जातिवाद, गालीवाद, नकारात्मक और रजवाड़ों की राजनीति कांग्रेस को करनी है या अब उन्हें छोड़ना ही पड़ेगा। यह कांग्रेस के लिए टफ टाइम है। प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी उत्तर प्रदेश में 38 सभाएं और रोड शो किए, लेकिन वे तमाशा साबित हुए। सबसे बड़े राज्य की 80 सीटों में से मात्र सोनिया गांधी की रायबरेली सीट ही बचाई जा सकी। साफ है कि जनता हर स्तर पर, हर मोर्चे पर कांग्रेस को खारिज कर रही है। राहुल गांधी और कांग्रेस ने राफेल विमान सौदे के संदर्भ में ‘चौकीदार चोर है’ अभियान पूरे देश में चलाए रखा और चुनाव के अंत तक वह जारी रहा। सर्वोच्च न्यायालय में माफी मांगने के बावजूद राहुल गांधी यही नारा दोहराते रहे, लेकिन यह सबसे नकारात्मक अभियान साबित हुआ। यह देश प्रधानमंत्री को ‘चोर’ सुनने को तैयार नहीं है। यदि ठोस तथ्य हैं, तो उन्हें सामने रखा जाना चाहिए था, लेकिन राहुल गांधी खाली-पीली चुनौतियां ही देते रहे कि प्रधानमंत्री मोदी उनसे बहस कर लें। अब चुनाव में करारी पराजय के बावजूद कांग्रेस के प्रवक्ता कह रहे हैं कि राफेल पर फिर सवाल उठाए जाएंगे। सबसे बड़ी कमजोरी तो संगठन है। जो युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस, सेवा दल नाम से संगठन होते थे, वे देशभर में मृतप्रायः या लुप्त हैं। दिल्ली में दफ्तर और नेता तो दिखाई देते हैं, लेकिन जमीनी और बूथ स्तर पर संगठन नगण्य है, जबकि भाजपा ने यह चुनाव अपने करीब 11 करोड़ काडर के साथ लड़ा था। 2014 में उसका करीब 2.5 करोड़ काडर था, तो फिर कांग्रेस चुनाव जीतेगी कैसे? कांग्रेस किसान के मुद्दे पर चिल्लाती रही, लेकिन जिन 139 सीटों पर किसान मुद्दे हावी थे, उनमें से 97 सीटें भाजपा गठबंधन ने जीतीं। सवाल है कि कांग्रेस को किसानों, नौजवानों, दलितों, आदिवासियों आदि का समर्थन क्यों नहीं मिला? शुक्र है कि केरल और तमिलनाडु में कांग्रेस को कुछ शानदार जीत हासिल हुई, नहीं तो 50 सीट के भी लाले पड़ सकते थे। ऐसी ध्वस्त करने वाली पराजय के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश अपनी मां सोनिया गांधी के सामने की। यह खबर आई और उसका खंडन भी कर दिया गया। खुद राहुल ने प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक होगी। उसी में सभी मुद्दों पर चर्चा होगी। बहरहाल अब वह समय आ गया है, जब कांग्रेस और उसके बचे-खुचे नेतृत्व को गांधी परिवार के पार जाकर किसी नए नेतृत्व पर मंथन करना होगा। कांग्रेस में अभी ऐसी जमात होनी चाहिए, जो संघर्ष की राजनीति कर पार्टी को ‘अग्निपथ’ पर अग्रसर कर सके।

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