कूर्म अवतार कथा

ब्रह्मा जी उन्हें साथ लेकर वैकुंठ में श्री नारायण के पास पहुंचे और सभी ने अनेक प्रकार से नारायण की स्तुति की और बताया कि प्रभु एक तो हम दैत्यों के द्वारा अत्यंत कष्ट में हैं और इधर महर्षि के श्राप से श्रीहीन भी हो गए हैं। आप शरणागतों के रक्षक हैं, इस महान कष्ट से हमारी रक्षा कीजिए। स्तुति से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने गंभीर वाणी में कहा, तुम लोग समुद्र का मंथन करो, जिससे लक्ष्मी तथा अमृत की प्राप्ति होगी, उसे पीकर तुम अमर हो जाओगे, तब दैत्य तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट न कर सकेंगे…

भगवान विष्णु ने समय-समय पर इस धरती पर कई अवतार लिए हैं। जिनकी कथा वेदों और पुराणों में मिलती है। जब भी भगवान ने इस धरा पर अपना कदम रखा उस दिन को उनकी जयंती के रूप में मनाया जाता है। वैशाख मास की पूर्णिमा पर कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाता है।  धर्म ग्रंथों के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लिया था तथा समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। कूर्मावतार भगवान के प्रसिद्ध दस अवतारों में द्वितीय अवतार है और 24 अवतारों में ग्यारहवा अवतार है।  एक समय की बात है कि महर्षि दुर्वासा देवराज इंद्र से मिलने के लिए स्वर्ग लोक में गए। उस समय देवताओं से पूजित इंद्र ऐरावत हाथी पर आरूढ़ हो कहीं जाने के लिए तैयार थे। उन्हें देख कर महर्षि दुर्वासा का मन प्रसन्न हो गया और उन्होंने विनीत भाव से देवराज को एक पारिजात पुष्पों की माला भेंट की। देवराज ने माला ग्रहण तो कर ली, किंतु उसे स्वयं न पहन कर ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया और स्वयं चलने को उद्यत हुए। हाथी मद से उन्मत्त हो रहा था उसने सुगंधित तथा कभी म्लान न होने वाली उस माला को सूंड से मस्तक पर से खींच कर मसलते हुए फेंक दिया और पैरों से कुचल डाला। यह देखकर ऋषि दुर्वासा अत्यंत क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने श्राप देते हुए कहा, हे मूढ़! तुमने मेरी दी हुई माला का कुछ भी आदर नहीं किया। तुम त्रिभुवन की राजलक्ष्मी से संपन्न होने के कारण मेरा अपमान करते हो, इसलिए जाओ आज से तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो जाएगी और  तुम्हारा यह वैभव भी श्रीहीन हो जाएगा।  इतना कहकर दुर्वासा ऋषि शीघ्र ही वहां से चल दिए। श्राप के प्रभाव से इंद्रादि सभी देवगण एवं तीनों लोक श्रीहीन हो गए। यह दशा देख कर इंद्रादि देवता अत्यंत दुःखी हो गए। महर्षि का श्राप अमोघ था, उन्हें प्रसन्न करने की सभी प्राथनाएं भी विफल हो गईं। तब असहाय, निरुपाय तथा दुःखी देवगण, ऋषि-मुनि आदि सभी प्रजापति ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्मा जी उन्हें साथ लेकर वैकुंठ में श्री नारायण के पास पहुंचे और सभी ने अनेक प्रकार से नारायण की स्तुति की और बताया कि प्रभु एक तो हम दैत्यों के द्वारा अत्यंत कष्ट में हैं और इधर महर्षि के श्राप से श्रीहीन भी हो गए हैं। आप शरणागतों के रक्षक हैं, इस महान कष्ट से हमारी रक्षा कीजिए। स्तुति से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने गंभीर वाणी में कहा, तुम लोग समुद्र का मंथन करो, जिससे लक्ष्मी तथा अमृत की प्राप्ति होगी, उसे पीकर तुम अमर हो जाओगे, तब दैत्य तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट न कर सकेंगे। किंतु यह अत्यंत दुष्कर कार्य है, इसके लिए तुम असुरों को अमृत का प्रलोभन देकर उनके साथ संधि कर लो और दोनों पक्ष मिलकर समुद्र मंथन करो। यह कहकर प्रभु अंतर्ध्यान हो गए। प्रसन्नचित्त इंद्रादि देवों ने असुरराज बलि तथा उनके प्रधान नायकों को अमृत का प्रलोभन देकर सहमत कर लिया। मंथन के लिए मंदराचल का सहारा लिया और वासुकिनाग की रस्सी बनाकर सिर की ओर दैत्यों ने तथा पूंछ की ओर देवताओं ने पकड़ कर समुद्र का मंथन आरंभ कर दिया।  किंतु अथाह सागर में मंदरगिरी डूबता हुआ रसातल में धसने लगा। यह देखकर अचिन्त्य शक्ति संपन्न लीलावतारी भगवान श्रीहरि ने कूर्म रूप धारण कर मंदराचल पर्वत अपनी पीठ पर धारण कर लिया। भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घूमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ। कर्म पुराण में विष्णु ने अपने कच्छपावतार में ऋषियों से जीवन के चार लक्ष्यों (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष) का वर्णन किया था। जब भी धरती पर अधर्म बढ़ा, तब-तब भगवान ने अनेक अवतार लेकर इस धरती को पाप के बोझ से मुक्त किया।

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