कौश के बंधन को नहीं लांघ पाते ग्रामीण

रामपुर बुशहर—चुनाव में अपने पक्ष में वोट डालने के लिए कई प्रकार के हथकड़े अपनाए जाते है। जिसमें उपरी शिमला में कौश का प्रचलन कम नहीं हुआ है। कई दुर्गम क्षेत्र अभी भी ऐसे है जहां पर चुनाव चाहे कोई भी हो लेकिन ग्रामीणों को एक पार्टी के पक्ष में वोट देने के लिए कौश रूपी बंधन का सहारा लिया जाता है। इस बंधन को इसलिए भी काफी सार्थक माना जाता है क्योंकि इससे ग्रामीणों की देवआस्था जुड़ी हुई है। बताते चले कि कौश देवताओं की मुर्तियों को धोकर इकठ्ठा किया गया पानी है। इसी पानी को उपरी शिमला में कौश कहा जाता है। जरूरी नही कि इसे केवल चुनाव में ही प्रयोग किया जाता है। बल्कि इसका प्रयोग किसी भी व्यक्ति को बंधन में बांधने का रहता है। लेकिन विशेष तौर से इसका प्रचलन किसी भी चुनाव चाहे वह पंचायत स्तर का हो या फिर विधानसभा का या फिर लोकसभा चुनाव। सभी में इस तरह के हथकड़े अपनाए जाते है। कौश पीलाने में विशेष तौर से एक बात ये रहती है कि इसमें ये कहकर कौश पिलाता है कि अमुख पार्टी व अमुख उम्मीदवार को अपना वोट देना। जब एक बार ग्रामीण इस कौश को पी लेते है तो वह चाह कर भी अपना वोट किसी दुसरे उम्मीदवार को नही दे सकते। भले ही मतदान पूरी तरह से गुप्त होता है लेकिन इस प्रक्रिया में देवआस्था जुड़ी है। ऐसे में कोई भी व्यक्ति देवता की आस्था को दरकिनार करते हुए अपना वोट दुसरी जगह नही डाल सकता। इस प्रक्रिया को ज्यादातर उन क्षेत्रों मंे अपनाया जाता है जहां पर एक पार्टी का वर्चस्व होता है। दुसरी पार्टी के कार्यकर्ता इस तरह का हथकड़ा अपनाकर वहां से दुसरी पार्टी का वर्चस्व समाप्त करने के लिए इस तरह का कदम उठाने से पीछे नही हटते। जानकारी के मुताबिक चुनाव हो जाने के बाद इस तरह की बात काफी सुनने में आती है कि अमुख गांव के लोग कौश पीकर उस पार्टी के हो गए। इस बात पर भले ही आधुनिकता के समय में कोई विश्वास करें या न करें। लेकिन दूर दराज के क्षेत्रों में इस तरह का प्रचलन नई बात नही है। विशेष तौर से जब चुनाव नजदीक आते है तो इस तरह के हथकड़े काफी जोर पकड़ने लग जाते है। जहां पर भी इस तरह के हथकड़ो का प्रचलन है वहां पर दोनों ही पाटियों के लोग काफी सचेत रहते है। यहां तक कि दोनों पार्टियों के लोगों ने ऐसे गांव में अपने लोगों को रातभर मुस्तैद रखा होता है। ताकि कोई ग्रामीणों को इस आस्था रूपी बंधन में न बांध सके।

कौश पीना मतलब पत्थर की लकीर

मतदाताओं को लुभावने वादे कर या फिर पैसा देकर वोट ऐंठने से जरूरी नही कि मतदाता उसी को वोट देगें। लेकिन जिस भी ग्रामीण ने कौश पी लिया। वह कभी भी दुसरी पार्टी को अपना वोट नहीं दे सकता। ये मान्यता है कि कौश की उल्लघंना करने वाले को देव दोष लगता है। इस डर से कोई ये लकीर मिटाने की कोशिश भी नहीं करता। वहीं जिस व्यक्ति ने कौश पीकर उल्लघंना की उसे देवता के मंदिर में जाकर बकरे की बलि देनी पड़ती है। उसके बाद ही वह इस आस्था के बंधन से आजाद हो सकता है।

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