खुले बालों में सुंदर लगती हैं शहनाज

May 11th, 2019 12:05 am

सौंदर्य के क्षेत्र में शहनाज हुसैन एक बड़ी शख्सियत हैं। सौंदर्य के भीतर उनके जीवन संघर्ष की एक लंबी गाथा है। हर किसी के लिए प्रेरणा का काम करने वाला उनका जीवन-वृत्त वास्तव में खुद को संवारने की यात्रा सरीखा भी है। शहनाज हुसैन की बेटी नीलोफर करीमबॉय ने अपनी मां को समर्पित करते हुए जो किताब ‘शहनाज हुसैन ः एक खूबसूरत जिंदगी’ में लिखा है, उसे हम यहां शृंखलाबद्ध कर रहे हैं। पेश है छठी किस्त…

-गतांक से आगे…

मैं पीछे हटकर मुस्कुराकर उन्हें देखती हूं, उनके सिर पर लाल बालों का बेमिसाल ताज भी उनकी सल्तनत की बयानगी करता है। कुछ समय पहले तक उन्हें खुद भी कहां मालूम था कि उनकी जिंदगी की किताब में ऐसे मुकाम जुड़ते चले जाएंगे। मैं बिल्कुल सही थी। मॉम हमेशा खुले बालों में ही सुंदर लगती हैं।

एक सितारे का जन्म

अगर जिंदगी में हम खुद को अपने हासिल किए गए मुकाम से आंकें तो हमें इसके दूसरे पहलू को भी देखना होगा, वह पहलू जहां से हमारी जड़ें शुरू हुईं, वह जड़ें जो हमें अपने मूल तक पहुंचाती हैं, जिस पर यह इमारत खड़ी होती है, जहां से हमारा भविष्य बुना जाता है। शहनाज हुसैन, जो शख्सियत आज हमारे रूबरू हैं, उनको जानने-समझने के लिए हमें उनकी वंशावली को समझना होगा। पांच नवंबर का दिन किसी भी सामान्य दिन की ही तरह था। आलीशान राहत मंजिल अपने आंगन में आने वाले नए मेहमान का स्वागत करने के लिए पूरी तरह तैयार थी। जिस बच्चे का जन्म होने वाला था, वह तीन बच्चों में छोटा था-बड़ी बहन मल्लिका, फिर भाई वलीउल्लाह। उनके पिता, नसीरुल्लाह बेग, हैदराबाद के चीफ जस्टिस के बेटे, और उनकी मां, सईदा बेगम हैदराबाद आर्मी के कमांडर-इन-चीफ की बेटी थीं। वे लगातार तीन पीढि़यों से उस पद को संभाले हुए थे। उनका निकाह हैदराबाद के दो प्रमुख खानदानों का मिलन था, जिसे खुद निजाम ने मुमकिन करवाया था। वह अपने चीफ जस्टिस और कमांडर-इन-चीफ के बच्चों को निकाह के बंधन में बंधा देखना चाहते थे। शायद निजाम ने ‘जेनेटिक इंजीनियरिंग’ के आने से पहले ही अपने अवचेतन में हैदराबाद के दो नामी-गिरामी परिवारों के जीन के मिश्रण की कल्पना के बारे में सोचा होगा। दुबली-पतली सईदा बेगम, नौ महीने के गर्भ से थकी, अपने कमरे की खिड़की से राहत मंजिल के दूर तक फैले बागीचे को देख रही थीं, वह आलीशान घर, जहां वह पली-बढ़ी थीं। उसकी यादें उन दिनों में दौड़ रही थीं, जब उनके पिता नवाब उस्मान यारुद्दौला जिंदा थे और वह लड़कियों जैसी उत्सुकता से उनके नौकरों को काम करते देखा करती थीं। उन्होंने लहलहाते मैदान को देखा और खुद को एक बारह साल की बच्ची के रूप में पेड़ों के आसपास भागते हुए और पर्दे में पोलो खेलते हुए। राहत मंजिल का विमेन्स पोलो मैदान उन दिनों अभिजात घर की लड़कियों के बीच बहुत लोकप्रिय था, जो वहां पर्दा करके संकोच से आती थीं। एक बार जब वे अपने घोड़े पर सवार होकर, उसकी लगाम लिए दौड़तीं, तो वे हर मायने में अपने भाइयों के बराबर होतीं।

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